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सियासत

 |  4-मिनट में पढ़ें  |   11-06-2018
अनुज मौर्या
अनुज मौर्या
  @anujmaurya87
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कहते हैं कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है. कुछ ऐसा ही इशारा दिया है अखिलेश यादव ने भी. उन्होंने साफ कर दिया है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में वह भाजपा को कैसे हराने वाले हैं. यूं तो अखिलेश यादव उत्तर प्रदेश के मैनपुरी के गांव जौराई में पूर्व प्रधान हाकिम की मूर्ति का अनावरण करने पहुंचे थे, लेकिन उन्होंने 2019 के लोकसभा चुनाव के अपने प्लान से भी पर्दा उठा दिया. अखिलेश यादव ने जो कहा है उससे इतना तो साफ हो गया है कि अब तक जो सियासी लड़ाई 'जीत' के लिए लड़ी जाती थी, उसे इस बार अखिलेश यादव भाजपा की 'हार' के लिए लड़ेंगे. 2019 के लोकसभा चुनाव में वह भाजपा को हराने के लिए हर तरह का त्याग और बलिदान करने को तैयार हैं.

लोकसभा चुनाव 2019, अखिलेश यादव, मायावती, भाजपा, उत्तर प्रदेश

भाजपा के हर प्रत्याशी की हार देखना चाहते हैं अखिलेश

अखिलेश यादव ने कहा है कि बसपा के साथ उनका गठबंधन आगे भी जारी रहेगा. अगर लोकसभा चुनाव में भाजपा को हराने के लिए दो-चार सीटों का बलिदान भी करना पड़ा तो वह पीछे नहीं हटेंगे. उन्होंने साफ-साफ कहा है कि वह भाजपा के हर प्रत्याशी को लोकसभा चुनाव में हारता हुआ देखना चाहते हैं और इसके लिए वह किसी के भी साथ गठबंधन करने को तैयार हैं.

हाल ही में यूपी के कैराना और नूरपुर में उपचुनाव हुए थे, जिसमें भाजपा हार गई. इस पर अखिलेश यादव ने योगी आदित्यनाथ पर निशाना साधते हुए कहा है- 'जहां भी योगी चुनाव प्रचार के लिए गए, वहां भाजपा हार गई, जबकि हम तो कैराना और नूरपुर गए भी नहीं फिर भी जीत गए. यह जीत भाजपा के खिलाफ कड़ा संदेश है.'

ये अखिलेश का डर बोल रहा है या कॉन्फिडेंस?

जिस तरह से अखिलेश यादव ने बेधड़क सीटों का बलिदान करने की बात कही, उससे उनका कॉन्फिडेंस खूब दिख रहा है, लेकिन समझने वाली बात ये है कि इसके पीछे एक बड़ा डर है. डर है हार का. डर है कि भाजपा फिर न जीत जाए. अगर ऐसा नहीं होता तो वह ये नहीं बोलते कि भाजपा को हराने के लिए वह किसी के भी साथ गठबंधन को तैयार हैं. यानी अगर उन्हें कांग्रेस, रालोद या फिर किसी अन्य के साथ भी गठबंधन करने की जरूरत पड़ी तो करेंगे, लेकिन भाजपा को हर हाल में हराना चाहते हैं.

अपना आधार तो नहीं खो रही समाजवादी पार्टी?

जब भी कोई राजनीतिक पार्टी बनती है तो उसकी अपनी एक विचारधार होती है. हर पार्टी की एक अलग सोच होती है. सत्ता हासिल करने के लिए तो सियासी पार्टियां अक्सर ही गठबंधन करती रही हैं, लेकिन ऐसा पहली बार है कि एक पार्टी यानी भाजपा को हराने के लिए विपक्षी पार्टियां एकजुट हो रही हैं. अब जिस तरह अखिलेश ने किसी के भी साथ गठबंधन करने की बात कह दी है तो क्या इससे समाजवादी पार्टी की अपनी विचारधारा प्रभावित नहीं होगी? खैर, यहां बात पार्टी का आधार खोने से अधिक यूपी में अपनी जमीन बचाने की है. अखिलेश यादव को डर है कि अगर लोकसभा चुनाव में भाजपा जीत गई तो आने वाला समय उनके लिए काफी कठिन हो सकता है.

मायावती के बयान से तो डरकर ऐसा नहीं बोल रहे अखिलेश?

यूपी की लोकसभा सीट कैराना पर हुए उपचुनाव से पहले ही मायावती ने यह बात साफ कर दी थी कि अगर उन्हें 2019 के लोकसभा चुनाव में सम्मानजनक सीटें नहीं मिलेंगी, तो उनकी पार्टी अकेले ही चुनाव लड़ेगी. इस बयान को राजनीतिक तौर पर एक बड़े बयान की तरह देखा जा रहा था और उसका असर अब दिखने भी लगा है. अखिलेश यादव यह बात अच्छे से समझते हैं कि अगर भाजपा के खिलाफ विपक्षी पार्टियां अकेले-अकेले चुनाव लड़ेंगी तो कोई भी शायद ही जीत पाए. यही वजह है कि वह सीटों का बलिदान तक करने को तैयार हो गए हैं. यानी मायावती को सम्मानजनक सीटें मिलना तय है.

जिस तरह कर्नाटक विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और भाजपा की लड़ाई में फायदा जेडीएस को हुआ है, उसी तरह लोकसभा चुनाव के दौरान यूपी में भाजपा और सपा जैसी दो बड़ी पार्टियों की लड़ाई में फायदा बसपा को होना तय है. जिस तरह कर्नाटक में सत्ता में आने के लिए कांग्रेस ने मुख्यमंत्री सीट तक जेडीएस को ऑफर कर दी, कुछ उसी राह पर अखिलेश यादव भी चलते नजर आ रहे हैं. अखिलेश भी सीटों का बलिदान करने को तैयार हैं, सिर्फ और सिर्फ भाजपा को हराने के लिए. ये चुनाव अखिलेश यादव अपनी जीत के लिए नहीं, बल्कि भाजपा की हार के लिए लड़ रहे हैं.

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