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Updated: 02 जून, 2022 09:23 PM
देवेश त्रिपाठी
देवेश त्रिपाठी
  @devesh.r.tripathi
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कश्मीरी हिंदू रजनी बाला की मौत पर अभी लोगों के आंसू सूखे भी नही थे कि आतंकियों ने कश्मीर में एक बैंक मैनेजर हिंदू विजय कुमार की गोलियों से भूनकर हत्या कर दी. भारतीय सेना की अब तक की गई कार्रवाई को देखकर संभव है कि जल्द ही इन आतंकियों को भी जहन्नुम के रास्ते पर भेज दिया जाएगा. लेकिन, 'जन्नत' जाने के लिए कश्मीरी हिंदुओं को चुन-चुनकर निशाना बना रहे इन आतंकियों के खिलाफ केंद्र सरकार का रवैया गैर-जिम्मेदाराना ही नजर आता है. क्योंकि, सुरक्षा बलों द्वारा ठिकाने लगाये गए आतंकियों को अभी भी लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद जैसे आतंकी संगठनों से जुड़े विदेशी आतंकी ही बताया जाता है. जबकि, कश्मीर में धार्मिक पहचान के आधार पर लोगों को निशाना बना रहे आतंकी कहीं और से नहीं, बल्कि कश्मीर घाटी के ही बाशिंदे हैं. और, कश्मीरी आतंकियों को 'पाकिस्तानी' बताना सरकार का निकम्मापन है.

Labelling Kashmiri Muslim terrorists as Pakistani terroristsकश्मीर में मजहबी उन्मादियों की भीड़ को कश्मीरियत और मानवतावाद का पाठ पढ़ाने की कई कोशिशें की जा चुकी हैं.

कश्मीर पर कब तक परोसा जाएगा 'अर्धसत्य'?

कश्मीरी हिंदुओं की हो रही हत्याओं और पलायन अब तो कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी भी अमन कायम करने के लिए तुरंत कदम उठाने की मांग करने लगे हैं. इसके बावजूद केंद्र सरकार आतंकियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने से बच रही है. एक सीधा सवाल है कि कश्मीर में 'आजादी' के पोस्टर ब्वॉय बनाये गए आतंकी बुरहान वानी के जनाजे में हजारों की भीड़ क्यों इकट्ठा हुई? देश के कथित मानवाधिकारों के पैरोकार कहेंगे कि ये 'कश्मीरियत' के नाम पर इकट्ठा हुई भीड़ थी. लेकिन, ये वो 'अर्धसत्य' है, जो इस पूरे देश को गंगा-जमुनी तहजीब की घुट्टी के तौर पर पिलाया जा रहा है.

क्या इस बात से इनकार किया जा सकता है कि बुरहान वानी एक कश्मीरी आतंकी था? कट्टरपंथियों द्वारा ब्रेनवॉश. क्या 90 के दशक में कश्मीरी हिंदुओं की हत्या करने वाले आतंकी यासीन मलिक और बिट्टा कराटे जैसे लोग पाकिस्तान से आए थे? खुद को अलगाववादी नेता कहने वाले कश्मीरी मुस्लिम नेता क्या अपनी जहरीली तकरीरों से कश्मीरी युवाओं का ब्रेनवॉश नहीं कर रहे हैं? आखिर सरकार ये मानने से इनकार क्यों कर रही है कि मजहबी उन्माद कश्मीर में चरम पर पहुंच चुका है. और, अब इसका इलाज करना जरूरी हो चुका है. क्योंकि, अगर ऐसा नहीं होता, तो कश्मीरी पंडितों की इस तरह से टारगेट किलिंग को अंजाम नहीं दिया जाता.

बीते कई दशकों से लेकर अब तक कश्मीर में मजहबी उन्मादियों की भीड़ को कश्मीरियत और मानवतावाद का पाठ पढ़ाने की कई कोशिशें की जा चुकी हैं. लेकिन, ये सब कुछ फेल हो चुका है. अफगानिस्तान में अमेरिकी हस्तक्षेप से लंबे समय तक शांति बनी रही. और, तालिबान के खात्मे तक का दावा कर दिया गया. लेकिन, 20 साल बाद इस्लामिक कट्टरपंथ का चेहरा तालिबान फिर से उठ खड़ा हुआ. ठीक उसी तरह कश्मीर में भी इस्लामिक कट्टरपंथी उन्मादी भीड़ कभी खत्म नहीं होने वाली है. इस्लामिक आतंकवाद एक ऐसा रक्तबीज है, जिसे खत्म करने के लिए कड़े फैसले लेने ही होंगे.

क्योंकि, कश्मीर के मुस्लिम समुदाय से ही आने वाले तमाम युवा अब आतंकी बन रहे हैं. क्योंकि, सीमा पार कर पाकिस्तान से घुसपैठ कर आने वाले आतंकियों के बारे में अब शायद ही लंबे समय से कोई खबर सामने आई होंगी. और, अगर ऐसी कोई कोशिश होती भी है. तो, सुरक्षा बलों द्वारा उन आतंकियों को वहीं ठिकाने लगा दिया जाता है. वैसे, सारे सवालों के जवाब जानने के बावजूद केंद्र सरकार अगर इस बात से डर रही है कि उनके खिलाफ कार्रवाई से देश का सांप्रदायिक माहौल बिगड़ जाएगा, तो ये उसका निकम्मापन है.

कितने मौके देगी मोदी सरकार?

2018 में केंद्र सरकार ने एक पहल करते हुए फैसला लिया था कि रमजान के महीने में आतंकियों के खिलाफ कोई ऑपरेशन नहीं चलाया जाएगा. लेकिन, रमजान का महीना खत्म होने के तक 50 आतंकी हमले और 20 ग्रेनेड अटैक में 41 लोगों की मौत हुई थी. आसान शब्दों में कहा जाए, तो यह सरकार की ओर से सकारात्मक कदम था. लेकिन, इसने साबित कर दिया था कि नकारात्मक लोगों के बीच सकारात्मक कदमों की कोई जगह नहीं होती है. 2016 में हिज्बुल मुजाहिदीन कमांडर बुरहान वानी की मौत के बाद कश्मीर सुलग उठा था. जिसमें 32 लोगों की मौत हुई है. ये सभी बुरहान वानी के पक्ष में आवाज उठाने वाले लोग ही थे. और, इनमें से कोई भी पाकिस्तान से सीमा पार कर नहीं आया था. हर साल बुरहान वानी की बरसी पर जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा कड़ी करनी पड़ती है.

आतंकियों को 'इंसान' क्यों मान रही है सरकार?

जो आतंकी कश्मीर में हिंदुओं को निशाना बना रहे हैं. उनको आखिर सरकार इंसान क्यों मान रही है. आतंकियों के शव उनके परिजनों को सौंपे जाते रहे हैं, लेकिन एक प्रस्‍ताव पहले भी रखा गया था कि ऐसा न किया जाए. वैसे भी भारत में एक सर्वमान्य फिलॉसफी है कि आतंक का कोई धर्म नहीं होता है. और, जब आतंक का कोई धर्म नहीं होता है, तो इन आतंकियों का जनाजा निकालने का कोई औचित्य नजर नहीं आता है. हां, अगर कोई मानवाधिकार कार्यकर्ता इन मजहबी उन्मादियों पर कार्रवाई करने पर मानवाधिकारों की बात करता दिखे, तो उसे कश्मीरी हिंदुओं की हत्याओं की लिस्ट पकड़ा दीजिए. और, उसे इस पर बोलने के लिए बाध्य किया जाना चाहिए. ताकि, लोगों को पता चल सके कि आखिर में इन कथित मानवाधिकारवादियों का असल उद्देश्य क्या है?

जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटने के बाद माना जा रहा था कि घाटी में हालात बदलेंगे. क्योंकि, वहां तेजी से विकास कार्य और अन्य अवसर पैदा किए जाने का काम शुरू किया गया है. लेकिन, हाल की घटनाओं को देखकर कहना गलत नहीं होगा कि अब पानी सिर से ऊपर निकल चुका है. और, समय आ गया है कि सरकार अब भारतीय सेना और सुरक्षा बलों को आतंकियों के नरसंहार का आदेश दे. क्योंकि, आतंकियों का कोई धर्म नहीं होता है. और, इससे देश में किसी भी हाल में सांप्रदायिक माहौल नहीं बिगड़ेगा. क्योंकि, भारतीय मुस्लिम समाज इन आतंकियों के साथ खुद को जोड़ कर नहीं देखता है. भारत का मुसलमान पूरी तरह से भारतीय है. और, वह इन आतंकियों की पुरजोर मुखालफत करता रहा है.

लेखक

देवेश त्रिपाठी देवेश त्रिपाठी @devesh.r.tripathi

लेखक इंडिया टुडे डिजिटल में पत्रकार हैं. राजनीतिक और समसामयिक मुद्दों पर लिखने का शौक है.

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