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Updated: 21 अप्रिल, 2019 07:22 PM
अनुज मौर्या
अनुज मौर्या
  @anujmaurya87
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ईस्टर का दिन श्रीलंका के ईसाईयों के लिए खुशियां नहीं, बल्कि गम लेकर आया. रविवार का दिन शुरू हो हुआ खुशियों के साथ, लेकिन देखते ही देखते हर ओर मातम छा गया. इसकी वजह थी एक के बाद एक हुए 8 बम धमाके, जिनमें से शुरुआती 6 धमाके तीन चर्च और तीन पांच सितारा होटलों में हुए. इस आतंकी हमले में कुल 187 लोगों की मौत हो गई और 400 से भी अधिक लोग घायल हो गए. यूं तो इस हमले की जिम्मेदारी किसी भी आतंकी संगठन ने नहीं ली है, लेकिन नेशनल तौहीद जमात आतंकी संगठन पर संदेह की सुई घूम चुकी है.

दरअसल, करीब 10 दिन पहले ही विदेशी खुफिया एजेंसियों ने श्रीलंका को इस बावत चेतावनी दे दी थी कि नेशनल तौहीद जमात श्रीलंका में हमला करने वाला है. अभी तक नेशनल तौहीद जमात ने भी हमले की जिम्मेदारी नहीं ली है, लेकिन माना जा रहा है कि ये काम उसी का है. यूं लग रहा है कि श्रीलंका की सरकार ने विदेशी खुफिया एजेंसियों की चेतावनी को गंभीरता से नहीं लिया, तभी तो एक के बाद एक 8 बम धमाके हो गए. लेकिन क्या आप नेशनल तौहीद जमात है के बारे में जानते हैं? चलिए एक नजर इसके इतिहास पर डालें.

नेशनल तौहीद जमात, श्रीलंका, आतंकी हमला10 दिन पहले ही विदेशी खुफिया एजेंसियों ने श्रीलंका को चेतावनी दे दी थी कि नेशनल तौहीद जमात हमला करने वाला है.

नेशनल तौहीद जमात

यह श्रीलंका का एक कट्टरपंथी मुस्लिमों का संगठन है, जो पिछले ही साल तब सुर्खियों में छाया था, जब उसने भगवान बौद्ध की कुछ मूर्तियां तोड़ी थीं. इसे तौहीद-ए-जमात भी कहा जाता है. यह संगठन 2014 में दुनिया के सामने आया जब इस संगठन के सेक्रेटरी अब्दुल रैजिक ने बौद्ध धर्म के खिलाफ आपत्तिजनक बयान दिए. उनके बयानों की वजह से ही उन्हें 2016 में हिंसा भड़काने के आरोप में गिरफ्तार किया गया.

2014 में पीस लविंग मुस्लिम्स इन श्रीलंका यानी PLMMSL ने इस संगठन पर प्रतिबंध भी लगवाना चाहा. इसके लिए उन्होंने संयुक्त राष्ट्र, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार, श्रीलंका के राष्ट्रपति और अन्य कई राजनयिकों को पत्र तक लिखा. तर्क दिया गया था कि नेशनल तौहीद जमात देश में असहिष्णुता फैलाने के साथ-साथ इस्लामिक आंदोलनों पर दबाव भी बना रहा है. आपको बताते चलें कि नेशनल तौहीद जमात पर वहाबी विचारधारा का प्रचार-प्रसार करने का भी आरोप लगा. आपको बता दें कि वहाब अल्लाह के नामों में से एक नाम है. इसके साथ किसी भी प्रकार का गठजोड़ या गठबंधन करना अल्लाह का अपमान करने जैसा माना जाता है.

ऐसा नहीं है कि श्रीलंका में पहली बार ईसाई समुदाय के खिलाफ हिंसा हुई है, ऐसे कई मामले पहले भी देखे जा चुके हैं. श्रीलंका की एक संस्था NCEASL ( National Christian Evangelical Alliance of Sri Lanka) के मुताबिक, पिछले साल यानी 2018 में ईसाई लोगों के खिलाफ नफरत, धमकी और हिंसा के कुल 86 मामले दर्ज किए गए थे. आपको बता दें कि श्रीलंका की कुल आबादी 2.2 करोड़ है. इसमें 70 फीसदी बौद्ध धर्म के लोग हैं, 12.5 फीसदी हिंदू हैं, करीब 10 फीसदी मुस्लिम हैं और महज 7.5 फीसदी ईसाई धर्म के लोग हैं. अल्पसंख्यक होने की वजह से ईसाई धर्म के लोगों पर अक्सर ही हमले होते रहते हैं.

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