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Updated: 08 मार्च, 2019 06:45 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
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दिल्ली में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच नूरा कुश्ती काफी लंबी चली. दोनों ही पार्टियों ने गठबंधन को लेकर 'कभी हां कभी ना' वाला खेल खूब खेला. अब जबकि कांग्रेस की ओर से गठबंधन पर दो टूक ना कह दिया गया है, आप नेता आक्रामक हो गये हैं.

कांग्रेस के सामने तात्कालिक चुनौती तो लोक सभा चुनाव है - लेकिन दिल्ली में उसकी नजर 2020 के विधानसभा चुनावों पर है. ठीक वैसे ही जैसे यूपी यूपी में कांग्रेस 2022 के हिसाब से रणनीति बना कर काम कर रही है. दिल्ली में भी कांग्रेस के फैसले में वैसा ही असर दिखता है.

ये आम आदमी पार्टी ही रही जिसने दिसंबर, 2018 में ही दिल्ली सहित पांच राज्यों की सभी 33 सीटों पर लोक सभा चुनाव अकेले लड़ने की घोषणा की थी. आप नेता अरविंद केजरीवाल गठबंधन से इंकार करने पर कांग्रेस पर बीजेपी के साथ गुप्त समझौते का आरोप लगा रहे हैं - आखिर केजरीवाल कांग्रेस के कंधे पर दिल्ली में बंदूक क्यों चला रहे हैं?

कभी हां, कभी ना क्यों?

अभी दिल्ली में गठबंधन की चर्चा चल ही रही थी कि आम आदमी पार्टी ने सात में से छह सीटों पर उम्मीदवारों के नाम की घोषणा कर दी. ऐसा लगा जैसे गठबंधन पर बातचीत खत्म हो गयी. दो दिन बाद ही सीट बंटवारे की खबर आने लगी, मालूम हुआ कि आप ने कांग्रेस पर दबाव बनाने के लिए उम्मीदवारों की घोषणा कर दी थी.

सीट बंटवारे का जो फॉर्मूला सामने आया उसमें आप और कांग्रेस के बीच बराबर तीन सीटें और एक सीट पर साझा उम्मीदवार खड़ा किये जाने की चर्चा रही. साझा उम्मीदवार में नाम भी शत्रुघ्न सिन्हा के तौर पर सामने आने लगा. बीच में यशवंत सिन्हा की भी चर्चा रही. ये दोनों ही बीजेपी के बागी नेता हैं जिन्हें काफी दिनों से विपक्षी खेमे के साथ देखा जा रहा है.

कांग्रेस की दिल्ली यूनिट आप के साथ गठबंधन के पक्ष में कभी नहीं रही है. अजय माकन के इस्तीफे के बाद जब शीला दीक्षित को कमान सौंपी गयी तो समझा गया कि कांग्रेस के रूख में बदलाव आएगा. शीला दीक्षित के आलाकमान के हुक्म की तामील वाले बयानों ने इसे हवा भी दी. हाल ही में जब विपक्षी नेताओं की मीटिंग में राहुल गांधी को दिल्ली के साथ साथ पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश में भी गठबंधन के लिए समझाने की कोशिश की गयी. इस मीटिंग में अरविंद केजरीवाल भी शामिल थे. तब राहुल गांधी ने राज्यों के प्रभारियों से बात करने का आश्वासन दिया था. बातचीत हुई भी - और नतीजा भी सामने आ गया.

कांग्रेस की मनाही के बाद अरविंद केजरीवाल ने नया पैंतरा लिया. ट्विटर पर केजरीवाल ने लिखा, ‘ऐसे वक्त जब पूरा देश मोदी-शाह की जोड़ी को हराना चाहता है तब बीजेपी विरोधी वोटों को बांटकर कांग्रेस उसकी की मदद कर रही है.’

rahul gandhi, arvind kejriwalराजनीति में मिलाने और दिखाने के हाथ अलग अलग होते हैं

अपनी बात को आगे बढ़ाने के लिए केजरीवाल ने अफवाहों का हवाला दिया. बोले, ‘ऐसी अफवाहें हैं कि कांग्रेस का बीजेपी के साथ गुप्त समझौता हो गया है. कांग्रेस-बीजेपी के गठबंधन से लड़ाई के लिए दिल्ली तैयार है. लोग इस अपवित्र गठबंधन को हरा देंगे.’

ये क्या बात हुई? दिल्ली के मुख्यमंत्री केजरीवाल भला अफवाहों को क्यों तवज्जो देने लगे. जो शख्स खुद के खिलाफ पक्की खबरों को भी खारिज कर देता हो उसे अफवाहों के सहारे अपनी बात कहने को कैसे समझा जाना चाहिये? एक तो अफवाह और दूसरे ऐसे गठबंधन की बात जो वास्तव में कभी अफवाह से ज्यादा होना भी मुमकिन नहीं है. अव्वल तो बीजेपी और पीडीपी के साथ को ही कोई पचाने को तैयार नहीं था, कांग्रेस और बीजेपी के बीच किसी समझौते की बात भला किसके गले के नीचे उतरने वाली है? यहां तक तो ठीक है कि कांग्रेस के ऐसा करने से विपक्ष का वोट बंटेगा, लेकिन कांग्रेस और बीजेपी में कोई सहमति भी हो सकती है, ऐसी बातें किसे हजम हो सकती हैं?

सवाल ये उठता है कि कांग्रेस के कंधे पर बंदूक रख कर केजरीवाल जताना क्या चाहते हैं?

अरविंद केजरीवाल से मतभेद शुरू होने के बाद से कुमार विश्वास कोई मौका नहीं चूकते. कवि सम्मेलनों से लेकर ट्विटर तक केजरीवाल हमेशा कुमार विश्वास के निशाने पर होते हैं. कांग्रेस पर केजरीवाल के ताजा आरोपों के बाद कुमार विश्वास ने एक वीडियो शेयर करते हुए कैप्शन लिखा - "तो उन्होंने लगभग मना कर दिया जी."

दिल्ली बीजेपी अध्यक्ष मनोज तिवारी का इस बारे में कहना रहा, 'शीला जी समझदार हैं, केजरीवाल खुद भी डूबते और कांग्रेस को भी डूबा देते.'

दिल्ली में यूपी फॉर्मूले जैसी दलील

दरअसल, दिल्ली में आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के बीच गठबंधन को लेकर वही फॉर्मूला सुझाया गया है जिसके आधार पर यूपी में अखिलेश यावद और मायावती ने समाजवादी पार्टी और बीएसपी का गठबंधन किया है. 2014 में आप और कांग्रेस को मिले वोट मिल कर बीजेपी से ज्यादा हो जाते हैं. 2014 बीजेपी का वोट शेयर करीब 45 फीसदी रहा जबकि आप और कांग्रेस के मिलाकर 49 फीसदी. पांच साल पहले मोदी लहर में बीजेपी ने दिल्ली की सभी सात सीटें जीत ली थी.

1. चांदनी चौक : चांदनी चौक में बीजेपी के डॉ. हर्ष वर्धन को 44.58 फीसदी वोट मिले थे और वो जीत गये. 2014 यहां आप के उम्मीदवार आशुतोष को 30.71 फीसदी वोट मिले और कांग्रेस के कपिल सिब्बल को 17.94 फीसदी. दोनों के वोट जोड़ दिये जाएं तो 48.64 हो जाते हैं जो बीजेपी उम्मीदवार से करीब चार फीसदी ज्यादा है.

2. उत्तर-पूर्व : दिल्ली उत्तर-पूर्व दिल्ली में मनोज तिवारी ने 45.23 फीसदी वोट हासिल कर सीट बीजेपी की झोली में डाल दी, जबकि कांग्रेस के जेपी अग्रवाल और आप के आनंद कुमार हा गये. दोनों को मिलाकर वोट शेयर रहा - 50.60.

3. पूर्वी दिल्ली : पूर्वी दिल्ली से बीजेपी के महेश गिरि ने 47.80 फीसदी वोट पाकर जीत हासिल की जबकि उनके खिलाफ कांग्रेस और आप उम्मीदवारों का वोट शेयर 48.88 फीसदी रहा.

4. नई दिल्ली : नई दिल्ली सीट पर बीजेपी की मीनाक्षी लेखी 46.73 फीसदी वोट पाकर सांसद बनीं और कांग्रेस के अजय माकन और आप के आशीष खेतान को हराया. दोनों के वोट शेयर देखे तो वो 48.46 फीसदी यानी करीब चार फीसदी ज्यादा रहा.

5. उत्तर पश्चिम : दिल्ली उत्तर पश्चिम दिल्ली सीट पर बीजेपी टिकट पर चुनाव लड़े दलित नेता उदित राज को 46.40 फीसदी वोट मिले और उनके खिलाफ आप और कांग्रेस उम्मीदवारों के वोट मिलाकर 49.72 फीसदी शेयर रहा.

6. दक्षिण दिल्ली : दक्षिण दिल्ली लोक सभा सीट पर बीजेपी के रमेश विधूड़ी को 45.15 फीसदी वोट मिले थे. दूसरी तरफ आप और कांग्रेस उम्मीदवारों को मिले वोट जोड़ दें तो वो रहा 46.80 फीसदी.

7. पश्चिमी दिल्ली : सिर्फ पश्चिम दिल्ली लोक सभा सीट ही ऐसी रही जहां बीजेपी उम्मीदवार की हिस्सेदारी विरोधी आप और कांग्रेस दोनों के उम्मीदवारों को मिले वोट से भी ज्यादा रही. पश्चिम दिल्ली में बीजेपी के प्रवेश वर्मा को 48.30 फीसदी वोट मिले थे जबकि आप और कांग्रेस उम्मीदवारों की हिस्सेदारी 42.71 फीसदी रही - जिसमें करीब छह फीसदी का फासला रहा.

कांग्रेस ऐसा क्यों कर रही है

देखा जाये तो दिल्ली में भी कांग्रेस यूपी जैसी ही रणनीति अपना रही है लेकिन फॉर्मूले अलग हैं. यूपी की ही तरह दिल्ली में भी कांग्रेस सिर्फ 2019 के हिसाब से नहीं सोच रही है, बल्कि यूपी की ही तरह उसकी नजर 2020 के विधानसभा चुनावों पर है. जिस तरह राहुल गांधी ने यूपी में प्रियंका गांधी वाड्रा और ज्योतिरादित्य सिंधिया को मोर्चे पर उतारा है, उसी तरह दिल्ली में फिर से शीला दीक्षित को कमान सौंपी गयी है.

वैसे भी शीला दीक्षित से अजय माकन से अलग लाइन लेने की अपेक्षा ही गलत थी. ये शीला दीक्षित ही हैं जिन्हें हराकर अरविंद केजरीवाल दिल्ली में काबिज हुए. हार के बावजूद तब कांग्रेस ने अपने 8 विधायकों के समर्थन से केजरीवाल की सरकार बनवायी थी जो 49 दिन ही चल पायी.

कांग्रेस को लगता है कि चुनावों में केजरीवाल सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर हावी रहेगी. ऐसी हालत में गठबंधन करके भी नुकसान उठाने से बेहतर है अकेले मैदान में उतर का खुद को आजमाना. कांग्रेस के पास बताने के लिए शीला दीक्षित का 15 साल का लंबा शासन है जिसे छह साल पहले केजरीवाल की भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाका छवि के आगे हार का मुंह देखना पड़ा था. उम्र बढ़ने के बावजूद गांधी परिवार के करीब होने के कारण शीला दीक्षित फिर से मोर्चे पर आ डटी हैं - और उनकी मदद के लिए बड़ी सी टीम मुहैया करायी गयी है. तकरीबन वैसे ही जैसे यूपी में प्रियंका वाड्रा और सिंधिया को.

अरविंद केजरीवाल लोक सभा चुनाव में दिल्ली के लिए पूर्ण राज्य की मांग को मुद्दा बनाना चाहते हैं. इसी मांग को लेकर वो अनशन भी करने वाले थे लेकिन पुलवामा हमले के चलते स्थगित कर दिया. लगता तो ऐसा ही है कि दिल्ली के पूर्ण राज्य के मुद्दे पर कांग्रेस को घेरने के लिए केजरीवाल दिल्ली में उसके कंधे पर बंदूक रख कर चला रहे हैं. कांग्रेस को ये भी लगता होगा कि गठबंधन के बाद भी अगर आप सरकार के सत्ता विरोधी लहर से नतीजे खिलाफ गये तो अरविंद केजरीवाल को कांग्रेस के सिर पर ठीकरा फोड़ते देर नहीं लगेगी.

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लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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