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Updated: 17 जून, 2021 04:00 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
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लोक जनशक्ति पार्टी (LJP Split) की विरासत पर राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई में हर पक्ष के हिस्से में कुछ न कुछ आ रहा था जिसकी कोई न कोई भूमिका रही, सिवा चिराग पासवान (Chirag Paswan) के - लेकिन राष्ट्रीय अध्यक्ष होने के अधिकारों के साथ चिराग पासवान ने जिस तरह से बाउंसबैक किया है, मंजर काफी हद तक बदल चुका है.

बिहार की राजनीति में चाचा-भतीजे की ये लड़ाई उत्तर प्रदेश के अखिलेश यादव और शिवपाल यादव जैसी लगती जरूर है, लेकिन 'बेटे को ही विरासत' दिये जाने के पक्षधर लालू प्रसाद यादव की ही तरह राम विलास पासवान ने बहुत पहले ही चिराग पासवान को औपरारिक तौर पर अपना उत्तराधिकारी घोषित करते हुए लोक जनशक्ति पार्टी की कमान भी सौंप दी थी - और अब चिराग पासवान उन अधिकारों का इस्तेमाल करते हुए ही आगे बढ़ रहे हैं.

ये सही है कि तात्कालिक तौर पर लोक सभा स्पीकर ओम बिड़ला ने पशुपति कुमार पारस (Pashupati Kumar Paras) को सदन में एलजेपी का नेता मान लिया है, लेकिन उसकी सिर्फ तात्कालिक अहमियत भर है. आखिरी फैसला तो अदालत में होगा और चुनाव आयोग के रूख के बाद चीजें तय होंगी और जो भी होगा लोक जनशक्ति पार्टी के संविधान के मुताबिक ही हो सकेगा.

बतौर राष्ट्रीय अध्यक्ष चिराग पासवान ने स्पीकर को पत्र लिख कर कहा है कि वो अपने फैसले पर फिर से विचार करते हुए पशुपति कुमार पारस को हटा कर उनको ही संसदीय दल का नेता बनायें. चिराग पासवान ने स्पीकर को मिली अर्जी को पार्टी नियमों के विरुद्ध बताया है और कहा है कि एलजेपी के नियमों के मुताबिक राष्ट्रीय अध्यक्ष ही संसदीय दल का नेता चुन सकता है?

वस्तुस्थिति ये है कि चिराग पासवान सहित एलजेपी के पास कुल 6 सांसद हैं - और पांचों के एकजुट हो जाने से चिराग पासवान अकेले पड़ गये हैं. चार सांसदों ने पशुपति कुमार पारस को अपना नेता मान लिया है और स्पीकर ने उसे लोक सभा में भी मान्यता दे दी है.

ये सब ऐसे दौर में हुआ है जब कई नेता मोदी कैबिनेट 2.0 में बदलाव का बेसब्री से इंतजार कर रहे हैं और चिराग पासवान भी अपने पिता की रही कैबिनेट पर दावा ठोकने की तैयारी में रहे, तभी विधानसभा चुनावों का बदला लेने के मकसद से कुछ जेडीयू नेताओं ने तीर चलायी और वो निशाने पर जा लगी. जब बीजेपी नेताओं को मालूम हुआ तो वे भी हरकत में आ गये - और जो कुछ सामने नजर आ रहा है वो परदे के पीछे की उसी राजनीति का नतीजा है.

पूरे घटनाक्रम को लेकर कुछ सवाल हैं जिनके जवाबों में ही लोक जनशक्ति पार्टी और चिराग पासवान का भविष्य छिपा है - और हां, ये तो बस ट्रेलर है पिक्चर तो पूरी बाकी है.

चिराग के खिलाफ बगावत का किस्सा काफी दिलचस्प है

एलजेपी में जो जंग छिड़ी है उसके तार जेडीयू से इसलिए भी जुड़ रहे हैं क्योंकि इसकी नींव वहीं पड़ी है. ये नींव पड़ने की वजह भी जेडीयू के भीतर चल रही एक मिलती जुलती जंग है. जेडीयू के भीतर फिलहाल वो जंग शीत युद्ध के रूप में ही है, लेकिन भविष्य में वो कौन सा मोड़ लेगी अभी नहीं कहा जा सकता क्योंकि जेडीयू, एलजेपी की तरह कोई पारिवारिक पार्टी नहीं है.

जेडीयू की भीतरी जंग आरसीपी सिंह को अध्यक्ष बनाये जाने से भी पहले की है और उसी में प्रशांत किशोर भी फंस गये और एक दिन उनको बाहर का रास्ता दिखा दिया गया. आरसीपी सिंह की तरह जेडीयू में और भी नेता अध्यक्ष पद के दावेदार रहे, लेकिन जब वे चूक गये तो नीतीश कुमार का विश्वास बनाये रखने के लिए अपनी तरफ से कुछ न कुछ करते रहते हैं.

नीतीश कुमार से करीबी फिर से कायम करने के लिए ही तो जीतनराम मांझी भी अघोषित प्रवक्ता बन जाते हैं. एक तरीके से मांझी वही बातें करते हैं जो नीतीश कुमार नहीं बोल पाते. ऐसी ही होड़ में शामिल ललन सिंह उर्फ राजीव रंजन का नाम पूरे एलजेपी एपिसोड में जोर शोर से उछला है.

chirag paswan, pashupati kumar parasपशुपति कुमार पारस को भी अब बीजेपी के हिसाब से वैसे ही चलना होगा जैसे अब तक चिराग पासवान चलते रहे

नीतीश कुमार के राजनीतिक विरोधियों का मानना है कि नीतीश कुमार ने ललन सिंह को ये टास्क सौंप कर चिराग पासवान से विधानसभा चुनावों में जेडीयू को डैमेज करने का बदला लिया है, लेकिन ये भी चर्चा है कि ललन सिंह ने अपने लेवल पर ही तोड़ फोड़ का ताना बाना बुना ताकि नीतीश कुमार के करीबियों में हावी आरसीपी सिंह पर थोड़ा लीड ले सकें.

अब ये समझने की भी जरूरत है कि क्या अचानक से एलजेपी के सारे सांसद चिराग पासवान के खिलाफ बगावत के लिए राजी हो गये?

सवाल ये भी है कि क्या पशुपति कुमार पारस अचानक इतने ताकतवर हो गये कि बाकियों ने उनको यूं ही नेता मान लिया?

चिराग पासवान के खिलाफ नाराजगी तो पहले से रही ही, बाहरी तत्वों ने तो बस आग को भड़काया भर है, लेकिन वो भी इतना आसान न था. ऐसे नेता बगावत का रास्ता तभी अख्तियार करते हैं या सत्ता पक्ष के दबाव में तभी आते हैं जब कोई लालच हो या किसी न किसी कमजोरी के चलते वो मजबूर हो जायें.

बिहार में जेडीयू और केंद्र की सत्ता में बीजेपी के होने की वजह से ये कवायद कई मोड़ से गुजरते हुए यहां तक पहुंची है - और इसमें भी राजनीति के साम-दाम और दंड जैसे हथियारों का खुल कर इस्तेमाल हुआ है. कुछ मीडिया रिपोर्ट और सूत्रों से बातचीत के आधार पर जो कहानी तैयार हो रही है वो परदे के पीछे की राजनीति के खेल का किस्सा सुना रही है.

1. पशुपति कुमार पारस

पशुपति कुमार पारस को ये तो मालूम था कि नीतीश कुमार और उनकी टीम की जब तक चलेगी चिराग पासवान तो केंद्र में मंत्री बनने से रहे, लेकिन समझाये जाने पर वो भी ये बात जल्दी ही समझ गये कि अगर मोदी सरकार में नीतीश कुमार की नहीं सुनी गयी तो मंत्री पद पर दावा तो चिराग पासवान का ही मजबूत रहेगा. बगावत करके पशुपति कुमार पारस ने अपने लिए जमीन तैयार कर ली.

2. महबूब अली कैसर

ऐसी चर्चा है कि सांसद महबूब अली कैसर को भी मंत्री पद का लालच दिया गया था, कहा गया कि वो बिहार से अल्पसंख्यक कोटे में मंत्री बनाये जा सकते हैं. अभी तक नीतीश कुमार ने मोदी कैबिनेट में अपना हिस्सा छोड़ रखा है क्योंकि बीजेपी नेतृत्व ने साफ कर दिया था कि सहयोगी दलों के लिए वो एक से ज्यादा मंत्री पद देने की स्थिति में नहीं है.

3. वीणा देवी

लोक जनशक्ति पार्टी सांसद वीणा देवी के पति दिनेश सिंह जेडीयू से ही एमएलसी हैं - और वीणा देवी के तैयार होने में उनके पति की बड़ी भूमिका मानी जा रही है. बताते हैं, ऐसा करके वो नीतीश कुमार की मदद से फिर से विधान परिषद में लौटने का रास्ता साफ कर रहे थे.

4. चंदन सिंह

बाहुबली नेता सूरजभान के भाई हैं. नये घटनाक्रम में सूरजभान को ही पशुपति कुमार पारस ने एलजेपी का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया है. सूरजभान के खिलाफ मामलों का हवाला देते हुए ही उनको और चंदन सिंह को बगावत के लिए राजी किया गया था, ऐसा सूत्रों का दावा है.

5. प्रिंस राज

प्रिंस राज लोक जनशक्ति पार्टी के संस्थापक रामविलास पासवान के भाई रामचंद्र पासवान के बेटे हैं. पशुपति कुमार पारस की कहानी भी शिवपाल यादव जैसी ही है - और अपनी ही कहानी सुनाकर चिराग के चाचा ने अपने दूसरे सांसद भतीजे को उनके खिलाफ भड़काया. शिवपाल यादव, उत्तर प्रदेश के मुलायम सिंह यादव के भाई हैं, जिनको पांच साल पहले अखिलेश यादव ने किनारे कर दिया था. बाद में वो अपनी पार्टी भी बना लिये.

जब ये सभी सांसद निजी वजहों से तैयार हो गये तो मामला स्पीकर के पास ले जाना तय हुआ. स्पीकर से मुलाकात कर पशुपति कुमार पारस को अपने लिये अलग मान्यता देने की मांग करनी थी, ताकि अगले कदम के तौर पर जेडीयू में शामिल हुआ जा सके.

लोक जनशक्ति पार्टी में जो कुछ हो रहा था उसकी चिराग पासवान को भनक थी या नहीं या फिर वो चुपचाप अपने वार के लिए सही वक्त का इंतजार कर रहे थे, लेकिन बीजेपी पल पल की खबर ले रही थी - तभी तो जैसे ही पशुपति कुमार पारस के स्पीकर के पास पहुंचने से पहले रास्ते में ही बिहार बीजेपी प्रभारी भूपेंद्र यादव और प्रदेश अध्यक्ष संजय जायसवाल ने सबको रोक लिया - और उसके बाद तो होना वही था जो बीजेपी को मंजूर रहा.

पशुपति कुमार पारस नेता कैसे बन गये?

मान लेते हैं कि जेडीयू नेता ललन सिंह ने अपने मिशन एलजेपी की पहल खुद की हो, लेकिन नीतीश कुमार को विश्वास में लिये बगैर इतना आगे कदम बढ़ाना मुमकिन भी तो नहीं लगता - क्योंकि जेडीयू की तरफ से सिर्फ एलजेपी को तोड़ने की ही कोशिश नहीं थी - बल्कि सबको जेडीयू में शामिल कर लेने की भी तैयारी थी.

भला बीजेपी ये सब कैसे होने देती? अगर ऐसा होता तो नीतीश कुमार का दबदबा भी तो बढ़ जाता जिसे बीजेपी ने चिराग पासवान की मदद से ही विधानसभा चुनाव के जरिये बड़ी मशक्कत से हासिल किया है.

फिलहाल लोक सभा में बीजेपी के पास 17 और जेडीयू के 16 सांसद हैं. अगर पांच एलजेपी के जेडीयू में शामिल हो जाते तो नीतीश कुमार 21 सांसदों के साथ नये खेल शुरू कर देते. मामला सिर्फ नीतीश कुमार का ही नहीं था, करीब सात फीसदी पासवान वोट बैंक की भी तो चिंता रही होगी. अगर ऐसा न होता तो जेडीयू की ही तरह कांग्रेस और आरजेडी क्यों उछल रही होती.

बहरहाल, ये तो अब साफ साफ समझ आ रहा है कि पटना से दिल्ली दरबार पहुंचते ही बीजेपी ने ये मामला लपक लिया और सारा खेल ही पलट दिया. फिर आगे का रास्ता वैसे ही बनाया गया जैसा बीजेपी चाह रही थी. फिर न तो एलजेपी टूटी और न ही चिराग पासवान को पार्टी से निकाला गया. पशुपति कुमार पारस की तरफ से भी यही कहा जा रहा है कि वो पार्टी को बचाये हुए हैं, न कि तोड़ने की कोशिश कर रहे थे.

बाद के असर को देखें तो जैसे पशुपति कुमार पारस ने मीटिंग बुलाकर चिराग पासवान को किनारे कर दिया था. चिराग पासवान ने भी कार्यकारिणी की वर्चुअल मीटिंग बुलायी और पांचों सांसदों को पार्टी से बेदखल कर दिया. जैसे पहले पशुपति कुमार पारस समर्थकों ने एलजेपी कार्यालय से चिराग पासवान का कटआउट हटा कर पशुपति कुमार पारस का लगा दिया था, चिराग समर्थकों ने पारस का पोस्टर हटाकर फिर से कार्यालय पर कब्जा कर लिया - हिसाब बराबर हो गया. अब पूरे बिहार में चिराग पासवान के समर्थकों का पार्टी पर कब्जा हो चुका है.

एलजेपी के टूट जाने का मतलब होता कि पासवान वोट बैंक बिखर जाता - आखिर उसी की बदौलत ही तो बीजेपी ने बिहार में चिराग पासवान की मदद से अपना प्रभाव बढ़ाया है. आगे की बात और है, लेकिन अभी तक तो नीतीश कुमार नाम के ही मुख्यमंत्री लगते हैं क्योंकि बीजेपी से पूछे बगैर बहुत सारे फैसले लेने की उनको छूट नहीं है.

वर्चस्व की इस लड़ाई में आखिर चिराग पासवान कहां खड़े हैं? पटना में सीनियर पत्रकार अरविंद शर्मा कहते हैं, 'बेशक लोजपा का एकमात्र विधायक पार्टी छोड़ कर नीतीश कुमार की पार्टी का हो चुका है. चिराग पासवान ने सभी सांसदों को निकाल कर सिर्फ अकेले सांसद बन कर रह गये हैं - लेकिन रामविलास पासवान जो कोर वोट बैंक छोड़ गये हैं वो अब भी चिराग पासवान के साथ खड़ा नजर आ रहा है - और आगे भी वो वोट बैंक ही उनकी ताकत बना रहने वाला है.'

चिराग पासवान सत्ता की राजनीति में भले ही हाशिये पर जा पहुंचे हों, कम से कम अभी तो ऐसा ही नजर आ रहा है, लेकिन चुनावी राजनीति में अब भी उनकी अहमियत पहले की ही तरह बरकरार है - और सबसे बड़ी वजह यही है कि बीजेपी भी कोई जोखिम उठाने को तैयार नहीं है.

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लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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