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Updated: 20 फरवरी, 2019 08:42 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
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पुलवामा हमले के बाद पाकिस्तान के खिलाफ भारत के कूटनीतिक प्रयास रंग लाने लगे हैं. एक महत्वपूर्ण बात ये भी है कि इसी दौरान सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस भारत आये हुए हैं और वो भी अपने पाकिस्तान दौरे के ठीक बाद. इस दौरान कम से कम तीन बातों पर मुख्य तौर पर फोकस करना जरूरी है. एक, दुनिया को ये बताना कि पाकिस्तान को लेकर नजरिये में बदलाव की क्यों जरूरत है और किस तरह वो आतंकवाद को बढ़ावा देने से बाज नहीं आ रहा है. दो, मसूद अजहर पर संयुक्त राष्ट्र में दुनिया को साथ लेकर चीन को भी अपने रूख में बदलाव के लिए मजबूर करना - और तीन, कुलभूषण जाधव केस में भी कानूनी लड़ाई के साथ साथ पाकिस्तान को कूटनीतिक फोरम पर उसकी धुंधली सैन्य आच्छादित न्याय व्यवस्था की हकीकत पेश करना जरूरी है.

ये भारत के कूटनीतिक प्रयासों का ही नतीजा है कि संयुक्त राष्ट्र में फ्रांस मसूद अजहर पर प्रस्ताव लाने को राजी हो चुका है और इजरायल की तरफ से भारत को ऐसी मदद की बात कही गयी है जिसकी कोई सीमा नहीं हो सकती.

अगर भारतीय राजनयिकों की टीम पाकिस्तान को जैश सरगना मसूद अजहर और कुलभूषण जाधव के मामले में शिकस्त दे देती है तो आधी जंग तो यूं ही जीती जा सकती है.

भारत-पाक संबंध और क्राउन प्रिंस

सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ऐसे वक्त विदेश दौरे पर निकले हैं जब पुलवामा को लेकर भारत-पाक तनाव चरम पर है. भारत की कूटनीतिक गतिविधियों को देखते हुए पाकिस्तान ने क्राउन प्रिंस के स्वागत में पलक पांवड़े बिछा रखे थे. पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान खुद गाड़ी चलाकर उन्हें एयरपोर्ट से प्रधानमंत्री निवास ले गये - और उनकी सुरक्षा व्यवस्था की कमान भी अपने हाथों में रखे हुए थे.

क्राउन प्रिंस को पहले पाकिस्तान से सीधे दिल्ली आना था लेकिन भारत की आपत्ति के बाद वो दो दिन के दौर के बाद सऊदी अरब लौट गये और फिर रियाद से नई दिल्ली पहुंचे. मेहमान की अगवानी और आव भगत भारत के मूल भाव में है और क्राउन प्रिंस को भी ये मिल रहा है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी प्रोटोकॉल तोड़ते हुए क्राउन प्रिंस को लेने एयरपोर्ट लेने पहुंचे थे, ये बात कूटनीतिक लिहाज से काफी अहम है. फिर भी क्राउन प्रिंस ने पाकिस्तान के साथ वैसा ही व्यवहार किया है जैसा पहले अमेरिका या अब तक चीन कर रहा है. ये ठीक है कि क्राउन प्रिंस को अपने मुल्क के हितों की फिक्र ज्यादा होगी, लेकिन पाकिस्तान के प्रति उनका रवैया बाकी देशों जैसा तो अब तक नहीं ही दिखा है.

हालांकि विपक्षी पार्टी कांग्रेस को प्रधानमंत्री मोदी और क्राउन प्रिंस का गले मिलना अच्छा नहीं लगा है. कांग्रेस प्रवक्ता ने सऊदी अरब द्वारा पाकिस्तान को दी गयी मदद के संदर्भ में ये बात कही है.

पिछले कुछ साल में इमरान खान को एक नया नाम मिला - तालिबान खान. पाकिस्तान के कट्टरपंथी धड़ों के समर्थन के कारण इमरान खान को ये नाम मिला और चुनावों में भी इसकी खासी चर्चा रही. दरअसल, 2103 में जब अमेरिकी हमले में तालिबान कमांडर वली उर्रहमान मारा गया तो इमरान खान ने उसे शांति का समर्थक बताया था.

तालिबान का मसला ऐसा है जिस पर पाकिस्तान के साथ सऊदी अरब और UAE साथ होते हैं. अफगानिस्तान में तालिबान सरकार को मान्यता भी पूरी दुनिया में सिर्फ इन तीनों से ही दी थी. प्रधानमंत्री बनने के बाद इमरान खान का भी दो ही तरफ ज्यादा दिलचस्पी दिखी थी - अरब जगत और चीन. सऊदी अरब और पाकिस्तान की करीबी होने की बड़ी वजह दोनों का इस्लामिक मुल्क होना भी है.

narendra modi, crown princeक्राउन प्रिंस को भी पाकिस्तान का सच समझाना होगा

फिलहाल तो बेहतर यही होगा कि क्राउन प्रिंस को भी वो बातें गंभीरता पूर्वक बतायी जाएं जो पूरी दुनिया से साझा की जा रही हैं. सबसे जरूरी ये है कि क्राउन प्रिंस को भी सच और झूठ, सही और गलत का फर्क समझाया जाये - और ये भी बताया जाये कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई भारत कैसे लड़ता है और पाकिस्तान कैसा दिखावा कर रहा है.

अच्छी बात ये है कि भारत आने के बाद क्राउन प्रिंस का रूख सकारात्मक लगने लगा है. क्राउन प्रिंस के साथ मुलाकात के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस में कहा, "मुझे खुशी है कि सऊदी अरब और हम इस संबंध में साझा विचार रखते हैं। हम इस बात पर भी सहमत हैं कि काउंटर टेररिज्म, समुद्री सुरक्षा और साइबर सिक्योरिटी के क्षेत्र में दोनों देशों के बीच संबंध और मजबूत होंगे."

सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान का भी कहना है कि वो आतंकवाद के मसले पर भारत के साथ हर तरह के सहयोग के लिए तैयार हैं - और इसमें खुफिया जानकारियां देने से लेकर दूसरी मदद भी शामिल है. क्राउन प्रिंस ने ये भी कहा कि 2016 में प्रधानमंत्री मोदी के सऊदी अरब दौरे के बाद दोनों मुल्कों के रिश्ते आगे बढ़े हैं.

मसूद पर संयुक्त राष्ट्र में भारत के प्रयास

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रंप ने पुलवामा हमले को भयानक स्थिति माना है. अमेरिका ने हमले के लिए जो भी जिम्मेदार है उसे सजा देने के लिए मजबूत सपोर्ट देने की बात कही है. हाल ही में चीन ने भी संयुक्त राष्ट्र में मसूद अजहर को लेकर अपने स्टैंड में तब्दीली के संकेत दिये थे. ये चीन ही है जिसकी वजह से 2001 में जैश-ए-मोहम्मद पर पाबंदी के बावजूद उसके सरगना मसूद अजहर को अब तक अंतर्राष्ट्रीय आतंकियों की सूची में नहीं डाला जा सका है.

kulbhushan jadhavजाधव को परिवार से मिलाने के नाम पर खानापूर्ति हुई थी...

भारत के सपोर्ट में अमेरिका से कहीं आगे बढ़ते हुए इजरायल ने ऐसी मदद की घोषणा की है जिसकी कोई सीमा नहीं हो सकती. देश के दुश्मनों के खिलाफ सख्त एक्शन के लिए अमेरिका और इजरायल दोनों ही जाने जाते हैं और भारत में भी उसी तरह की कार्रवाई की मांग जोर पकड़ रही है.

मसूद अजहर को वैश्विक आतंकवादियों की सूची में शामिल कराने के लिए फ्रांस की ओर से प्रस्ताव लाये जाने की भी संभावना बढ़ी है जिसमें ब्रिटेन का भी समर्थन हो सकता है.

भारत के लिए कूटनीतिक लिहाज से ये बेहतरीन मौका है और इसे सिर्फ मसूद अजहर पर भी केंद्रित न रखते हुए, भारत को चाहिये कि इस अंतर्राष्ट्रीय जनमत से कुलभूषण जाधव केस से जुड़ी बातें भी साझा करे.

जाधव केस में भी पाक को घेरना जरूरी है

पाकिस्तान में न्यायिक व्यवस्था किस हालत में है नवाज शरीफ का केस सबसे बड़ा नमूना है. जब पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के वकीलों को अपना पक्ष ठीक से रखने का मौका नहीं दिया गया तो कुलभूषण जाधव केस में क्या हो सकता है?

भारत को पाकिस्तान की सेना के साये वाली न्यायिक व्यवस्था के बारे में भी दुनिया को बताना चाहिये. चुनावों के दौरान ही एक जज की ओर से ऐसी बातें आयी थीं कि किसी भी सूरत में वोटिंग होने तक नवाज शरीफ को जेल से निकलने नहीं देना है.

क्या ऐसे माहौल में पाकिस्तान में कुलभूषण जाधव केस में इंसाफ हो सकता है? दूर दूर तक कोई संभावना नहीं नजर आ रही है. भारत का पूरा जोर कुलभूषण जाधव की रिहाई पर ही होना चाहिये, न कि सजा में किसी तरह की नरमी को लेकर.

जाधव केस में ICJ में कानूनी पक्ष तो रखने ही होंगे, जाधव को इंसाफ दिलाने के लिए कूटनीतिक रणनीति पर भी उसी हिसाब से काम करना होगा. देखा गया है कि अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय ने ऐसे कई मामलों में फैसले की समीक्षा करने को कहा है. अगर ऐसा हुआ तो कुछ नहीं होने वाला. वैसे पाकिस्तान तो यही चाहेगा. भारत विएना संधि का हवाला दे रहा है और पाकिस्तान ये कहते हुए अपील को दरकिनार कर रहा है कि जासूसों के मामले में विएना संधि लागू नहीं होती.

पाकिस्तान ने जज की बीमारी के बहाने भी सुनवाई टालने की कोशिश की है. भारत को पाकिस्तान की मंशा कदम कदम पर भांपनी होगी क्योंकि वो किसी भी तरह इस वक्त जाधव केस को टलवाने की कोशिश करेगा.

पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता मोहम्मद फैसल का निजी ट्विटर हैंडल सस्पेंड कर दिया गया है. ट्विटर ने ये कार्रवाई उनकी पोस्ट पर भारत की आपत्ति के बाद किया है. पाकिस्तान विदेश मंत्रालय का हैंडल काम कर रहा है, हालांकि, उस पर भी मोहम्मद फैसल का ही नाम है.

एकबारगी ये बात मामूली लग सकती है, लेकिन जंग तभी जीती जाती है जब छोटी छोटी बातों पर भी ऐसे ही ध्यान दिया जाये. आधी जीत के लिए अच्छी शुरुआत और ऐसी ही छोटी बातों पर गौर करने की आवश्यकता होती है और उससे आगे के लिए मसूद अजहर और कुलभूषण जाधव केस में पाकिस्तान ी पोल खोल सबसे जरूरी है.

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लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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