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Updated: 19 सितम्बर, 2016 10:39 PM
आशुतोष शुक्ला
आशुतोष शुक्ला
  @ashutosh.shukla.90
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उरी में हुए आतंकी हमले के बाद एक बार फिर देश में रोष का माहौल है. सोशल मीडिया पर ऐसे लोगों की कमी नहीं जो पाकिस्तान को सबक सिखाने की बात कर रहे है और युद्ध को अंतिम समाधान के रूप में देखते हैं. पाकिस्तान जिसका वजूद ही हिंदुस्तान से नफरत पर टिका हो उसकी सोच में बदलाव लाना मुश्किल है.

पाकिस्तान के जन्म का मूल सिद्धांत ही भारत से नफरत है और पाकिस्तान ने एक देश के तौर पर इसे बदलने की कोशिश नहीं की. क्योंकि इससे उसके अस्तित्व पर ही सवाल खड़ा हो जाता. अब सवाल ये है कि क्या पाकिस्तान की सोच में बदलाव लाया जा सकता है और क्या पाकिस्तान से युद्ध ही एकमात्र रास्ता है?

पाकिस्तान एक सोच का नतीजा थी और वो थी हिंदुस्तान से नफरत और इस नफरत के साथ एक डर भी था कि एक दिन हिंदुस्तान उसपर कब्जा कर उसे अपने में मिला लेगा. यह डर बांग्लादेश के निर्माण के साथ ही और अधिक मजबूत होता चला गया. यही डर था कि पाकिस्तान ने परमाणु शक्ति बनने की तरफ कदम बढ़ाना शुरू कर दिया और अपनी गरीबी को दरकिनार करते हुए फौजी तौर पर खुद को सशक्त करने लगा. पाकिस्तान के इसी डर ने उसे अमेरिका और चीन के आगे घुटने टेकने पर मजबूर किया.

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पाकिस्तानी हुक्मरानों, सेना और ISI ने पिछले 60 वर्षों में इसी डर और नफरत का पाठ पाकिस्तान की जनता को भी पढ़ाया. अब यह सोच एक विचारधारा का रूप ले चुकी है जिसके सहारे पाकिस्तान जीता है. 1971 की जंग के बाद एक बात और साफ हो गई कि पाकिस्तान सीधे तौर पर हिंदुस्तान का मुकाबला नहीं कर सकता. नफरत की उसी सोच का फायदा उठाते हुए पाकिस्तान ने अपने यहां आंतकवादियों की फौज तैयार करनी शुरू कर दी जो भारत को नुकसान पहुंचा सके. ये आजतक जारी है.

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 कैसे होगा पाकिस्तान का इलाज..

अगर युद्ध समस्या का समाधान होता तो 1965 और 1971 के युद्ध (बांग्लादेश के निर्माण) के बाद समस्या खत्म हो चुकी होती लेकिन हुआ इसके उलट. पाकिस्तान और उसकी नफरत और तेजी से उभरी. उसका डर और तेजी से बढ़ा. उसके लिए आसान हो गया अपनी जनता को बलगराना. इसी का नतीजा था पाक प्रायोजित आतंकवाद जोकि युद्ध से ज्यादा खतरनाक है. युद्ध में आपको पता होता है कि आपका विरोधी कौन है लेकिन ना तो यहां विरोधी का पता है और ना उसकी स्थिति. साथ ही अब वह दौर नहीं रहा कि आप पाकिस्तान से युद्ध कर सकें. वो एक परमाणु समपन्न देश होने के साथ ही एक मजबूत सैन्य ताकत भी है.

पाकिस्तान के पास मिसाइलों और जहाजों का एक बड़ा बेड़ा है. हथियारों से ज्यादा खतरनाक है उसकी वो नफरत जो उसे किसी भी हद तक जाने से नहीं रोकेगी. हो सकता है कि युद्ध के बाद पाकिस्तान कुछ वर्षों तक शांत रहे लेकिन उसकी वो नफरत और तेजी से बढ़ेगी. यही समस्या के जड़ में है. सवाल है कि फिर समाधान क्या?

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सबसे पहले भारत को स्वंय को मजबूत करना होगा. आतंकवाद पर एक कड़ी नीति बनानी होगी. आतंकवादियों की मदद करने वालों को कड़ा संदेश देना होगा क्योंकि इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि आतंकियों की मदद करने वाले आपके और हमारे बीच के लोग है. साथ ही देश में जनजागृति लानी होगी कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं और ना ही इसके सहारे वो अपना मकसद पूरा कर सकते है बल्कि इसके उलट इससे उनका ही नुकसान होगा. देश के भीतर उपज रही अलगाववाद की आग को शांत करना होगा. देश के भीतर लोगों में यह भरोसा पैदा करना होगा कि 'सबका साथ सबका विकास' बिना भेदभाव के होगा.

इतना करने मात्र से हम पाकिस्तान को पंगू कर देंगेय सीमा को अबाध्य बनाना होगा. जितना पैसा हम पाकिस्तान के साथ युद्ध करने में खर्चा करेंगे उससे बहुत कम पैसों में यह काम मुमकिन है. हमें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पाकिस्तान को अलग-थलग करना होगा.

साथ ही चीन और अमेरिका जैसे देश पर दवाब डालना होगा कि वो पाकिस्तान को आर्थिक सहायता बंद करे. हमें उन देशों से नजदीकियां बढ़ानी होगी जो पाकिस्तान को मदद करते है. और जो अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण कदम है वह है पाकिस्तान की उस नफरत को खत्म करना जिसके सहारे वह जीता है. यह एक लंबी प्रकिया हो सकती है लेकिन यकिन मानिए यही एकमात्र समाधान है.

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लेखक

आशुतोष शुक्ला आशुतोष शुक्ला @ashutosh.shukla.90

लेखक आजतक में प्रोड्यूसर हैं

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