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Updated: 10 जून, 2018 05:55 PM
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'पांच करोड़ गरीब परिवार, 5 करोड़ गरीब परिवारों को कोई योजना छुए, भाइयों-बहनों तो उससे बड़ी कोई योजना नहीं हो सकती' यही वो शब्द थे जिनका जिक्र प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उत्तरप्रदेश के बलिया में, सरकार की सबसे महत्वकांशी योजना उज्ज्वला के शुभारंभ करते हुए किया था. आज तक़रीबन दो बरस बाद इस योजना से आम गरीब हिंदुस्तानी आवाम के हालात कितने सुधरे इसके दावे सरकारी आंकड़ों के जरिये किये जा रहे हैं.

इस योजना की वेबसाइट पर उपलब्ध जानकारी के अनुसार यह स्कीम देश के 29 सूबों के 715 जिलों के साथ सात केंद्रशासित प्रदेशों को कवर कर रही है. वेबसाइट की ही जानकारी के अनुसार इस योजना के तहत 30 मई 2018 तक 4,10,30,010 बीपीएल परिवारों को गैस कनेक्शन जारी किये जा चुके हैं. राजनैतिक रूप से कई जानकार इसकी भूमिका देश के सबसे बड़े प्रदेश उत्तरप्रदेश में भाजपा की सरकार बनने में भी मानते हैं.

भाजपा, प्रधानमंत्री, नरेंद्र मोदी, उज्ज्वला, पीयूष गोयल सिलेंडर खरीदने की जद्दोजहद में भारत का आम आदमी

सफलता को लेकर पुरजोर सरकारी दावे, लेकिन विसंगतियों पर कोई योजना नहीं :

इस योजना की सफलता को लेकर सरकार की अपनी सोच और तमाम दावे हैं. लेकिन कई मीडिया रिपोर्ट्स इस योजना की विसंगतियों से मुख़ातिब कराती हैं. जानकारों के अनुसार उज्ज्वला योजना में गैस कनेक्शन तो बांटे गये लेकिन लाभार्थियों द्वारा दोबारा गैस सिलेंडर नहीं खरीदे जा रहे हैं.

पेट्रोलियम मंत्रालय की प्लानिंग और एनालिसिस सेल के अनुसार देश में जंहा गैस कनेक्शन बिक्री की ग्रोथ रेट 16.8 प्रतिशत है वहीं गैस सिलेंडर बिक्री की ग्रोथ महज 9.8 फीसदी ही है. यानी की गैस कनेक्शन में तो इजाफ़ा हुआ है लेकिन गैस सिलेंडर की बिक्री उस हिसाब से नहीं हुई.

कम गैस सिलेंडर बिक्री पर सरकार के तर्क गलत :

हाल ही में इंडिया टुडे के एक कार्यक्रम में मौजूदा वित्त मंत्री पीयूष गोयल से जब कम गैस सिलेंडर बिक्री पर सवाल पूछा गया तो उनका तर्क था कि गैस सिलेंडर बिक्री इसलिए कम है क्योंकि शहरी क्षेत्रों के मुकाबले ग्रामीण इलाकों में गैस खपत कम है. साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि ग्रामीण क्षेत्रों की आवश्यकता भी शहरी इलाकों के मुकाबले कम है.

ये सही है कि ग्रामीण इलाकों वाले प्रदेशों में गैस कनेक्शन के मुकाबले दोबारा सिलेंडर भराने का प्रतिशत लगभग आधा ही है लेकिन ये प्रतिशत आधा इसलिए नहीं है क्योंकि उनकी आवश्यकता कम है या उनकी जरूरत कम है, ये कम इसलिए है क्योंकि उज्ज्वला योजना के लाभार्थियों को गैस सिलेंडर पर जो सब्सिडी मिलनी चहिए वो नहीं मिल रही जिसके चलते जिस दाम पर दूसरा सिलेंडर इन लाभार्थियो को मिल रहा है वो इनकी खरीद क्षमता से ज्यादा है.

उज्ज्वला योजना में क्यों नहीं मिल रही है गैस सब्सिडी और क्यों पूरे दामों पर सिलेंडर खरीदने में असमर्थ है लाभार्थी :

उज्ज्वला योजना में गैस किट (चूल्हा, सिलेंडर, रेगुलेटर और पाइप) को 3100 रूपये की बजाय सरकार ने 1500 रूपये में दिया. 1600 रूपये की इस पर सब्सिडी दी गयी. लेकिन कई ग्रामीण इलाको वाले प्रदेशों में लोग यह पैसा देने में भी असमर्थ थे. सरकार ने इसका भी तरीका निकाला. ऐसे लोग जो यह रकम नहीं दे पा रहे थे, उन सभी को सरकार ने गैस कंपनियों से बिना ब्याज के लोन दिलवाया. इन सभी लाभार्थियों को लोन देकर उसकी किश्तें बांध दी गई. ब्याज रहित लोन की मूल रकम वसूलने के लिए गैस कंपनियों ने भी अपना तरीका इजाद किया.

गैस सिलेंडर पर जो सब्सिडी मिलती है उसको इन कंपनियों ने लोन की किश्त में तब्दील कर दिया. उदाहरण के लिए 741 रुपए के सिलेंडर पर अगर 250 रुपए की सब्सिडी मिलती है तो उज्ज्वला योजना के लाभार्थी को सिलेंडर के लिए पूरे रुपए ही देने पड़ेंगे. सिलेंडर के लिए पूरे रुपए देने पर उज्ज्वला योजना लाभार्थी की कर्ज राशि में से सिलेंडर सब्सिडी की जितनी राशि कम कर दी जायेगी. यानी कि उज्ज्वला योजना में गैस कनेक्शन लेने वाला लाभार्थी को तब तक सब्सिडी नहीं मिलेगी जब तक उससे गैस कंपनिया गैस किट के 1500 रुपए वसूल नहीं लेती.

कुल मिलाकर इस योजना के अंतर्गत लोन लेने वाले उपभोक्ता को 6-7 गैस सिलेंडर लेने के बाद ही सरकारी सब्सिडी पर गैस सिलेंडर मिल पायेगा. लेकिन फिर एक और दिक्कत इस योजना में आयी. ग्रामीण इलाकों में रहने वाले उज्ज्वला योजना लाभार्थी को दूसरा सिलेंडर खरीदने के लिए जो रकम देनी थी वो उसकी कमाई का एक बड़ा हिस्सा है.

आईआईएम अहमदाबाद की रिपोर्ट के अनुसार, ग्रामीण इलाकों वाले राज्यों में मासिक प्रति व्यक्ति आय क्रमशः यूपी में 2161, बिहार में 1733, एमपी में 2460, राजस्थान में 3919 और बंगाल में 3509 रूपये है. ये वो तमाम राज्य हैं जहां इस योजना के तहत ज्यादा सिलेंडर बांटे गए हैं. ऐसे में इन राज्यों में उज्ज्वला योजना के लाभार्थियों को जो कीमत बिना सब्सिडी वाले गैस सिलेंडर के लिए अदा करनी वो उनकी मासिक आय का ही लगभग एक तिहाई हो जाता है. अपने मासिक खर्च के जरिये बुनयादी जरूरतों के लिए जूझते इन उज्ज्वला योजना के लाभार्थी के लिए दूसरा गैस सिलेंडर खरीदना संभव नहीं है.

बहरहाल अपने चार साल के जश्न में सरकार उज्ज्वला योजना के जरिये देश की गरीब महिलाओं को धुआं मुक्त होने का प्रचार तो जोरों-शोरों से कर रही है, लेकिन जितने दावे सफलता को लेकर है अगर उतने ही प्रयास विसगंतियो को लेकर भी किये जाये तो इस योजना के लाभार्थी सिलेंडर भी खरीद पाएंगे और उज्ज्वला गैस की रौशनी भी उनके घर के आंगन में जलती रहेगी.

कंटेंट - गर्वित बंसल इंटर्न इंडिया टुडे

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