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Updated: 21 जनवरी, 2016 06:45 PM
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जरा रोहित वेमुला के सुइसाइड नोट पर गौर कीजिए, "इंसान एक वोट, एक आंकड़ा, कोई वस्तु बन कर रह गया है. कभी भी इंसान को उसकी बुद्धि से नहीं आंका गया."

लगता है मौत के बाद भी रोहित वेमुला महज एक किरदार बन कर रह गया है. रोहित की मौत पर अफसोस और सियासत की तुलना की जाए तो सियासत का ही पलड़ा भारी पड़ेगा.

पॉलिटिकल ऐंगल

हर राजनीतिक पार्टी ने रोहित वेमुला की मौत को अपने अपने हिसाब से तौला - और खुद को एक सेफ साइड में रखते हुए अपने विरोधी को टारगेट किया.

दिल्ली के मुख्यमंत्री और आप नेता अरविंद केजरीवाल ने पहले तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से माफी मांगने की बात कि फिर रोहित के परिवार से मिलने हैदराबाद पहुंचे. केजरीवाल ने वहां केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी को निशाने पर लेते हुए कहा कि अपने पत्र में उन्होंने छात्रों के लिए राष्ट्रविरोधी और जातिगत शब्दों का इस्तेमाल किया. केजरीवाल ने स्मृति ईरानी, बंडारू दत्तात्रेय और यूनिवर्सिटी के वीसी अप्पा राव के कॉल रिकॉर्ड्स की जांच करने की भी मांग की.

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी भी विश्वविद्यालय के छात्रों से मुलाकात कर केंद्र सरकार को दोषी ठहरा चुके हैं.

जब ज्यादा शोर मचा तो स्मृति ईरानी अपने कैबिनेट साथियों के साथ मीडिया के सामने आईं और ढेर सारे तथ्य पेश किये. ईरानी ने सख्त लहजे में कहा कि ये मामला कहीं से भी दलित बनाम गैर दलित नहीं है.

खैर, मामला दलितों का था इसलिए बीएसपी ने भी हमला बोला और असदुद्दीन ओवैसी के कूद पड़ने से मौत की राजनीति में एक नया गठजोड़ निकल आया है.

दलित-मुस्लिम फैक्टर

रोहित की मौत के दो दिन बाद एमआईएम नेता असदुद्दीन ओवैसी ने भी इस घटना को अपने तरीके से पेश किया. यूनिवर्सिटी प्रशासन को जिम्मेदार ठहराते हुए हैदराबाद सांसद ने कहा कि दलित और मुस्लिम परिवारों को बड़े संस्थानों में दाखिल कराने के लिए कितनी कुर्बानियां देनी पड़ती है. ओवैसी को एक दलित छात्र की मौत पर बयान देना था, लेकिन वो मुस्लिमों के नेता हैं इसलिए दोनों को एक साथ जोड़ कर पेश कर दिया. भई, मतलब तो अपनी राजनीति से है - और हक भी बनता है.

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ये फोटो रोहित वेमुला के फेसबुक टाइमलाइन पर शेयर किया गया है

अब मायावती की भी सुन लीजिए, "इससे साफ हो जाता है कि आरएसएस की मानसिकता रखने वाली बीजेपी सरकार और उसके मंत्रियों की सोच दलितों, पिछड़ों और मुस्लिम समाज के करोड़ों लोगों के प्रति नकारात्मक और क्रूर है."

दरअसल, बिहार चुनाव के बाद मायावती सोशल इंजीनियरिंग के नये फॉर्मूले पर काम कर रही हैं. इसे 'दम' यानी दलित-मुस्लिम फैक्टर का नाम दिया जा रहा है. मायावती काफी पहले से इस पर काम कर रही हैं और 2017 के विधानसभा चुनाव में इसी के बूते वापसी की उम्मीद कर रही हैं. इससे पहले मायावती दलितों और ब्राह्मणों को जोड़ कर चुनाव जीत चुकी हैं.

बीजेपी का डर जिस दिशा में मायावती और ओवैसी की राजनीति जा रही है उसी के चलते दोनों के बीच यूपी में गठबंधन की भी चर्चा चलती रहती है.

बीजेपी की भी इस गठबंधन पर नजर है - और वो भी इसके काउंटर के इंतजाम में लगी हुई है.

अब रोहित वेमुला की मौत के बाद बीजेपी के ही छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की बात पर ध्यान दीजिए.

ईटी से बातचीत में एबीवीपी के राष्ट्रीय सचिव श्रीरंग कुलकर्णी कहते हैं, "अंबेडकर स्टूडेंट्स असोसिएशन अफजल गुरु और याकूब मन के लिए सभाओं का आयोजन कर, 'मुजफ्फरनगर बाकी है' जैसी फिल्में दिखाकर और असदुद्दीन ओवैसी तथा तीस्ता सीतलवाड़ जैसे लोगों को कैंपस में बुलाकर मुसलमानों के तुष्टीकरण की कोशिश कर रहा था."

कुलकर्णी आगे कहते हैं, "वामपंथियों और चरमपंथियों ने राष्ट्र विरोधियों का मुकाबला कर रही मोदी सरकार को अस्थिर करने का एजेंडा बनाया है, नहीं तो इस मुद्दे पर ओवैसी के बोलने की क्या वजह है? वो लड़के के परिवार के लिए 5 करोड़ रुपये का मुआवजा भी मांग रहे हैं."

कुलकर्णी का मानना है कि कुछ लोग जानते हैं कि केवल दलित-मुस्लिम गठजोड़ ही चुनावी तस्वीर बदल सकता है. उनका कहना है कि ये एक पॉलिटिकल एजेंडा है, जिसे असम, बंगाल और फिर अगले साल यूपी में होने जा रहे चुनावों के लिए तैयार किया जा रहा है.

रोहित वेमुला केस में केंद्र सरकार का रवैया बीजेपी के कुछ दलित नेताओं को भी ठीक नहीं लग रहा. पूर्व मंत्री और बीजेपी नेता संजय पासवान बीबीसी से बातचीत में कहते हैं, "मैंने कहा है कि प्रधानमंत्री को इस मामले में एक बयान देना चाहिए था जिससे एक बड़ा संदेश जाता, लेकिन उन्होंने कोई बयान नहीं दिया."

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