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सियासत

 |  5-मिनट में पढ़ें  |   08-07-2018
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जब भी बीजेपी कमजोर होने लगती है तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मोर्चा संभाल लेते हैं. यूपी बीजेपी का हाल इतना गंभीर हो चुका है कि मोदी अब हर महीने दौरा करने वाले हैं. प्रधानमंत्री मोदी से पहले तैयारियों का जायजा लेने और आगे की रणनीति के हिसाब से जिम्मेदारियां देने अमित शाह मिर्जापुर, वाराणसी सहित यूपी के कई इलाकों के दौरे पर थे. जब भी मौका रहा मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी एक पैर पर खड़े नजर आये.

शाह ने यूपी बीजेपी के नेताओं और कार्यकर्ताओें के सामने आम चुनाव में 80 में से 74 सीटें जीतने का लक्ष्य तय किया है. साथ ही, शाह ने 51 फीसदी वोट हासिल करने का टारगेट भी दे दिया - क्योंकि इसके बगैर मायावती और अखिलेश यादव के महागठबंधन को परास्त नहीं किया जा सकता. ये सारी बातें बताने के साथ ही हर मीटिंग में अमित शाह का मतभेद खत्म करने पर खास जोर रहा. यही वो मोर्चा है जहां बीजेपी चूक रही नजर आती है.

...लेकिन मतभेद मिटे तो कैसे?

बीजेपी के लिए विपक्षी एकता से भी कहीं ज्यादा बड़ा खतरा अंदरूनी गुटबाजी है. बीजेपी अध्यक्ष कितना भी समझायें कि कार्यकर्ता आपसी मतभेद भुलाकर काम करें - लेकिन इसका सबसे बड़ा नमूना खुद अमित शाह की मीटिंग में ही देखा गया.

amit shahघर की लड़ाई कैसे जीतेंगे?

मिर्जापुर के बाद अमित शाह ने प्रधानमंत्री मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में भी बीजेपी की मीटिंग बुलायी थी. मीटिंग में बातें तो बहुत हुईं लेकिन चर्चा में सबसे ऊपर रहा यूपी बीजेपी प्रभारी ओम माथुर की गैर मौजूदगी. ओम माथुर बीजेपी के उपाध्यक्ष हैं और पिछले चार साल से यूपी के प्रभारी हैं. 2017 का विधानसभा चुनाव भी ओम माथुर की ही देखरेख में संपन्न हुआ था.

तो क्या ओम माथुर बीजेपी आलाकमान से खफा हैं? सीधे सीधे तो नहीं लेकिन घुमा फिरा कर कहा जरूर जा सकता है.

दरअसल, ओम माथुर की नाराजगी आलाकमान से नहीं, बल्कि सुनील बंसल से बतायी जा रही है. सुनील बंसल बीजेपी में संगठन मंत्री और विधानसभा चुनावों में भी वो अमित शाह के आंख, नाक और कान माने जाते थे. टिकट बंटवारे में उनकी राय शाह की राज समझी जाती थी. जब तक सुनील बंसल की हामी नहीं मिलती तब तक उम्मीदवारों का ब्लड प्रेशर बढ़ा रहता था - नॉर्मल तभी हो पाता जब बंसल की ओर से इशारा होता.

ओम माथुर राजस्थान के रहने वाले हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बहुत ही भरोसेमंद बताये जाते हैं. पिछले कई महीनों से माथुर की यूपी की बैठकों से गैरमौजूदगी अक्सर चर्चा में रह रही है.

मीडिया में सूत्रों के हवाले से आ रही खबरों से मालूम होता है कि ओम माथुर को सुनील बंसल के कामकाज का तौर तरीका बिलकुल नहीं सुहा रहा है. ओम माथुर को लगता है कि वो नाम भर के ही सूबे के प्रभारी रह गये हैं, सरकार और संगठन में जो भी फैसले हो रहे हैं उनकी रजामंदी तक जरूरी नहीं समझी जाती. हालत ये है कि कई महीने से ओम माथुर को शाह, योगी और एनडीए साथियों के साथ हुई बैठकों से भी दूरी बनाते देखा गया है.

किसी एक का पत्ता कटा तो वो कौन होगा?

हाल फिलहाल इस बात की भी खूब चर्चा हो रही है कि ओम माथुर और सुनील बंसल में से किसी एक या दोनों को यूपी की जिम्मेदारियों से मुक्त किया जा सकता है. हालांकि, ऐसे मामलों का ट्रैक रिकॉर्ड तो यही बताता है कि जाना तो ओम माथुर को ही पड़ेगा और सुनील बंसल बने रहेंगे. शर्त लगी तो प्रधानमंत्री मोदी को सुनील बंसल के नाम पर अमित शाह जीत की गारंटी दे देंगे. विधानसभा चुनाव से पहले जब गुजरात में सत्ता परिवर्तन हुआ तो आनंदी बेन पटेल और अमित शाह के दो दो उम्मीदवार मैदान में खड़े हो गये. आनंदी बेन तब नितिन शाह को मुख्यमंत्री बनते देखना चाहती थीं.

प्रधानमंत्री मोदी ने ही आनंदी बेन को मुख्यमंत्री रहते राजनीति में लाया था और दिल्ली जाने को हुआ तो कुर्सी भी उन्हीं को सौंपी. आनंदी बेन को अमित शाह पसंद नहीं करते थे इसलिए जातीय समीकरणों के बावजूद वो नितिन पटेल को रास्ते से हटाने का उपाय खोज रहे थे. आखिर में शाह ने अपने पसंदीदा विजय रुपाणी को कुर्सी पर इस शर्त पर बिठाया कि वो चुनावों में जीत की गारंटी हैं. मगर, देर न लगी चुनावों में तो शाह को पता चल ही गया कि मोदी खुद कमान नहीं संभालते तो 99 के भी लाले पड़ जाते. एक और मिसाल हिमाचल प्रदेश से है. प्रेम कुमार धूमल ने प्रधानमंत्री मोदी के करीबी होने के नाते ही खुद को सीएम कैंडिडेट घोषित कराया था - लेकिन शाह के सियासी चाल में फंस गये और कुर्सी तो दूर चुनाव तक हार गये.

ओम माथुर को भी शाह से टकराने का खामियाजा पहले से ही सोच लेना होगा. बीजेपी में मोदी का करीबी होना ही काफी नहीं, शाह के गुड बुक में रहना भी जरूरी है. अगर किसी को मतलब नहीं समझ में आ रहा तो स्मृति ईरानी और वसुंधरा राजे से कभी उनकी 'मन की बात' सुनने की कोशिश करनी चाहिये.

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