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Updated: 19 नवम्बर, 2020 11:20 PM
मशाहिद अब्बास
मशाहिद अब्बास
  @masahid.abbas
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देश की सबसे पुरानी पार्टी इन दिनों सबसे बुरे दौर में जा पहुंची है. लगातार दो लोकसभा चुनावों में उसे करारी शिकस्त हासिल हुई है, ऐसे में सवाल खड़े होते हैं कि आखिर कांग्रेस (Congress) को वापसी करने के लिए कैसी योजनाओं की ज़रूरत है. कैसे पार्टी को वापिस उसी चट्टान पर पहुंचाया जा सकता है, जिस शिखर पर वह कभी थी. पार्टी को कैसे एक मज़बूत चेहरा तैयार करना चाहिए, जैसा चेहरा इंदिरा गांधी (Indira Gandhi) या राजीव गांधी (Rajiv Gandhi) का था. कैसे राहुल गांधी (Rahul Gandhi) की ताकत को कांग्रेस की ताकत में तब्दील किया जा सकता है. कैसे अर्श से फर्श पर आ पहुंची पार्टी को फिर से अर्श की ओर ले जाया जा सकता है. यह सब मुमकिन है अगर कांग्रेस पार्टी अपने पुराने इतिहासों को खंगाल डाले. कांग्रेस पार्टी खुद के इतिहास के पन्नों को पलट ले तो उसे हर उस सवाल का जवाब मिल जाएगा, जिस सवाल का जवाब उसे ढ़ूंढ़ें नहीं मिल रहा है. पंडित जवाहर लाल नेहरु के बाद जो कांग्रेस पार्टी इंदिरा गांधी तक आई थी और इंदिरा गांधी के नेतृव्य से निकलकर जो कांग्रेस पार्टी आज है उसमें बड़ा फर्क है. साल 1975 में जब इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगाया था और उसके बाद पूरे देश में जो माहौल कांग्रेस के खिलाफ तैयार हुआ था वह माहौल आज के माहौल से भी बुरा था, कांग्रेस पार्टी के लिए. यानी सीधे शब्दों में कहूं तो देश का माहौल आज कांग्रेस के खिलाफ नहीं है बल्कि नरेन्द्र मोदी के पक्ष में है.

Indira Gandhi, Birthday, Congress, Rahul Gandhi, Sonia Gandhi, Lok Sabha Electionअब वो वक़्त आ गया है जब राहुल को इंदिरा से राजनीति की प्रेरणा लेनी चाहिए

देश के लोग प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को एक मजबूत नेता मानते हैं. जबकि कांग्रेस पार्टी की कमजोरी यही है कि वह एक मजबूत चेहरा तैयार नहीं कर पा रही है. साल 1971 के लोकसभा चुनाव के परिणाम पर नज़र डालिए. 518 लोकसभा सीटों में से 352 सीटें कांग्रेस पार्टी की झोली में थी. इसी चुनाव में इंदिरा गांधी पर आरोप लगता है कि उन्होंने धांधली से चुनाव जीता है. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी पर लगे आरोंपो को सही माना और उनका निर्वाचन रद कर दिया.

विपक्ष ने हंगामा खड़ा कर दिया तो इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल की घोषणा कर दी. लगभग दो साल पूरा देश आपातकाल में रहा. क्या-क्या हुआ सब आप जानते हैं. साल 1977 में फिर से आम चुनाव हुआ. कांग्रेस पार्टी 352 से सीधे 153 सीटों पर आ गिरी. खुद इंदिरा गांधी, संजय गांधी तक चुनाव हार गए. जनता पार्टी ने सरकार बनाई, लेकिन सरकार चलाने में वह विफल रहे. वर्ष 1980 में फिर से आम चुनावों की घोषणा हो गई. आपातकाल को लोग अभी भी नहीं भूले थे.

कांग्रेस के खिलाफ माहौल अभी भी था, लेकिन इंदिरा गांधी ऐसे ही मजबूत नेता नहीं मानी जाती थी. साल 1977 में चुनाव हारने के बाद से ही वह चुनाव की तैयारी में जुट गई थी और कई ऐसे फैसले ले लिए थे जो फैसला शायद आज की कांग्रेस पार्टी लेने की हिम्मत भी न जुटा पाएगी. साल 1978 की शुरूआत थी, कांग्रेस पार्टी के सर्वोच्च के नेता इंदिरा गांधी के नेतृव्य पर सवाल दाग रहे थे.

इंदिरा गांधी ने पार्टी का दोफाड़ करने से भी गुरेज़ नहीं किया और सिर्फ उन्हीं सांसदों को अपने साथ लिया जो उनके नेतृव्य में आगे बढ़ना चाहते थे. मात्र 54 सांसदों का साथ लेकर इंदिरा गांधी ने अलग कांग्रेस पार्टी का गठन कर दिया. 100 सांसदों को इंदिरा ने एक ही झटके में खुद से अलग कर डाला था. एक नए जोश, नई पार्टी और कई नारों के साथ इंदिरा गांधी ने वर्ष 1980 के आम चुनाव में प्रवेश किया था.

उस वक्त की जनता पार्टी की सरकार में रुपया लगातार गिरता जा रहा था, देश के कई क्षेत्रों में हड़ताल पर हड़ताल हो रहा था, वेतन वृद्धि की मांगे हो रही थी, अर्थव्यवस्था विकलांग अवस्था में जा रही थी. इंदिरा की ऩई कांग्रेस पार्टी ने नारा दिया ‘आधी रोटी खाएंगे, इंदिरा को बुलाएंगे’ एक और नारा जो उस चुनाव में छाया रहा ‘चुनिए उन्हें जो सरकार चला सकते हैं’ ये दोनों नारे इंदिरा गांधी के कद को खुद बखुद बढ़ाने का काम कर रहे थे.

इसी के साथ ही इंदिरा गांधी ने जातीय वोट बैंकों पर भी निशाना साधा और नारा दिया ‘इंदिरा तेरे अभाव में हरिजन मारे जाते हैं’ मुसलमानों को एकजुट करने के लिए आपातकाल के समय हुए नसबंदी को अपनी गलती मानते हुए संजय गांधी ने खुल्लमखुल्ला माफी मांग लिया. नतीजा ये हुआ कि जो कांग्रेस आपातकाल के समय लोगों की निगाहों से उतर गई थी अब वह फिर से लोगों के दिलों को भा गई थी.

वर्ष 1980 के चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने फिर से वापसी की और 353 सीटों पर कब्जा जमाने के साथ इंदिरा गांधी एक मजबूत नेता के तौर पर भी पहचानी जाने लगी. बेहद कम समय में इंदिरा गांधी ने अपने नेतृव्य को साबित करके दिखा दिया था और उन नेताओं के मुंह में ताला जड़ दिया था, जिन नेताओं ने उन्हें राजनीतिक बोझ समझा था.

आज की कांग्रेस का हाल भी वर्ष 1977 जैसा है. पार्टी के अंदरूनी नेता ही समझते हैं कि राहुल गांधी में नेतृव्य की क्षमता ही नहीं है. कांग्रेस पार्टी से उसके खुद के वोटर नाराज़ हैं जैसे आपातकाल के बाद नाराज़ थे. लेकिन आज की कांग्रेस पार्टी में वो इंदिरा वाली मजबूती नहीं दिखाई देती है जो कांग्रेस के दो टुकड़े करके भी अपने आपको और अपने नेतृव्य को साबित करने की क्षमता रखती हो. ऐसा नहीं है कि उस समय इंदिरा गांधी के लिए यह सबकुछ आसान था.

लेकिन इंदिरा गांधी ने एक इच्छाशक्ति के साथ लगन से पार्टी को सत्ता की दहलीज़ तक लाने के लिए ज़मीनी मेहनत की थी. जो आज की कांग्रेस नहीं कर पा रही है. इंदिरा गांधी ने कांग्रेस को दलदल से निकाल कर शिखर पर पहुंचा दिया. ऐसा इसलिए कहा जा सकता है क्योंकि इंदिरा की नई कांग्रेस में महज 54 सांसद ही थे. आज भी कांग्रेस पार्टी 50 के आसपास ही सांसद पा रही है.

पिछले दो लोकसभा चुनावों से, अगर इंदिरा गांधी 54 सांसद से 350 के आंकड़ें तक पहुंच सकती हैं अपने मास्टरस्ट्रोक प्लान से, तो आज की कांग्रेस क्यों नहीं पहुंच सकती है. अगर इंदिरा गांधी अपने नेतृव्य को साबित कर सकती हैं तो राहुल गांधी अपना नेतृव्य क्यों नहीं साबित कर सकते हैं. ये सब मुमकिन है अगर कांग्रेस पार्टी इंदिरा गांधी से सीखने की कोशिश कर ले.

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लेखक

मशाहिद अब्बास मशाहिद अब्बास @masahid.abbas

लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं और समसामयिक मुद्दों पर लिखते हैं

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