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Updated: 24 अगस्त, 2015 05:18 PM
प्रो. सीपी सिंह
प्रो. सीपी सिंह
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राज्य सत्ता अगर किसी व्यक्ति के खिलाफ कोई कानून सम्मत कार्रवाई करे और अगर वह व्यक्ति मुसलमान हुआ तो समझ लिये कि वह कार्रवाई साम्प्रदायिक है, इस्लाम विरोधी है चाहे क्यों न वह व्यक्ति सैकड़ों लोगों की मौत का जिम्मेदार याकूब मेमन हो!

कांग्रेस-वामी आचार संहिता के अनुसार भारत में सेकुलर कहलाने की यही शर्त है.

कुछ और भी शर्तें हैं जैसे आधुनिक समझ रखनेवाले और हर प्रकार की बराबरी के हिमायती मुसलमान नेताओं के बरक्स जहालत, फिरका-वाराना और दकियानूसी विचारों के पोषक नेताओं को कहीं ज्यादा अहमियत देना. जैसे डॉ. अब्दुल कलाम और आरिफ मोहम्मद खान जैसों की जगह ओवैसी और अहमद बुखारी को आगे बढ़ाना. ऐतिहासिक नामों में अकबर की जगह औरंगजेब और मुहम्मद गोरी के गुनगाण करना.

ले दे कर वह सब काम करना जिससे इस्लाम और मुसलमान को आतंकवाद और आतंकी का पर्याय मानने में एक सामान्य हिन्दू को कोई दिक्कत न हो. लेकिन कोई पढ़ा-लिखा व्यक्ति इस दोहरेपन की ओर इशारा करे तो उसे तुरंत कम्युनल या संघी ब्रांड कर दो अगर आपको अपना सेकुलर वाला सर्टिफिकेट बरकरार रखना है.

इस रणनीति के लाभ बड़े गुणकारी हैं. बहुदेववादी बहुमत के मन में अंतिम पैगंबरवादी और एक ही अल्लाह वादी मुसलमानों के प्रति नफरत भरती जाएगी और मुसलमानों के मन में डर और आशंका का तिल पहाड़ बनता जाएगा. फिर इनके बीच की गहरी घाटी में वोटों की फसल लहलहा उठेगी.

जनाब शाहिद सिद्दीकी कहते हैं कि मुसलमानों में भय पैदा करके सेकुलर पार्टियों ने उनसे वोट रूपी जज़िया टैक्स वसूला है. अगर आप इसके खिलाफ हैं तो निश्चित तौर पर कम्युनल हैं.

यहां तक तो ठीक है. लेकिन सिद्दीकी साहेब शायद यह भी मानते होंगे कि मुस्लिम समुदाय ने अपने अंदर आधुनिक मध्यवर्ग को राजनीतिक इज्जत नहीं दी है क्योंकि वह भारतीय संविधान के राज की जगह शरीया के राज या निज़ामे-मुस्तफा का हामी है जिसका समर्थन मध्यवर्गीय मुसलमान नहीं करेगा.

इसलिए मुसलमान मध्यवर्ग को अपने समुदाय में सामाजिक इज्जत बख्शी जाती है, राजनीतिक नेतृत्व नहीं. आईएसआईएस, तालिबान, अल क़ायदा, बोको हरम इसी मानसिकता के चरम उदाहरण हैं.

भारत में हिन्दुओं की बहुदेववादी उदारता के कारण अबतक ऐसा नहीं हुआ है लेकिन इंटरनेट और मोबाइल ने सबको सब कुछ सुलभ करा दिया है. इस कारण कोई आश्चर्य नहीं अगर आनेवाले दशकों में हिन्दुओं में भी वैसे लोगों की एक संगठित जमात पैदा हो जाए जो सामी मतों (ईसाइयत, इस्लाम, मार्क्सवाद) की तर्ज पर यह मानने लगे कि 'ह ही हम, बाकी सब खत्म'.

पश्चिमी दुनिया की जनसंहारी सभ्यता को तार्किक जामा पहनाने वाले चिंतक हटिंगटन यह सब देख-जानकर कितने प्रसन्न हो रहे होंगे कि 'सभ्यताओं के संघर्ष' के उनके सिद्धांत को लागू करने की जमीन वहां भी तैयार हो रही है जहां उसकी संभावना सबसे कम थी यानी हिन्दुस्तान.

लेखक

प्रो. सीपी सिंह प्रो. सीपी सिंह @cpsinghji

लेखक स्कूल ऑफ मास कम्युनिकेशन (गुरु गोविंद सिंह इंद्रप्रस्थ यूनिवर्सिटी) के डीन हैं.

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