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Updated: 19 अगस्त, 2022 07:25 PM
अनुज शुक्ला
अनुज शुक्ला
  @anuj4media
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कांग्रेस होगी आजादी के आंदोलन से निकली पार्टी. मगर अब एक पार्टी के रूप में इसका राजनीतिक औचित्य शायद ख़त्म हो चुका है या सिर्फ घरेलू है. इसका डूब जाना ही बेहतर होगा. और अगर लोकतंत्र में बहुमत- मानवीय चीजों को भी तय करने लगे तो धिक्कार है ऐसे लोकत्रंत्र पर जो घिनौने तरीके से एक 'अंतहीन अन्याय' की आधारशिला रखने में सफल रहा. वह लोकतंत्र भला मानवीय समाज के लिए किन अर्थों में लाभकारी हो सकता है जो एक बेगुनाह प्रेग्नेंट औरत के बलात्कार से खाद पानी पाता हो? बिल्किस बानो केस में हत्या करने, गैंगरेप करने वाले 11 दोषियों को आजादी की 75वीं वर्षगांठ पर रिहा करने के फैसले ने सालों गुलामी के खिलाफ हुए संघर्ष को एक झटके में बेमानी साबित कर चुकी है.

शायद इससे ज्यादा दागदार और काला अध्याय आधुनिक भारत के इतिहास में दूसरा कोई नजर नहीं आएगा. दोषियों को 'क्रांतिनायकों' की तरह पूजा जा रहा है. क्या यह मानवता पर क्रूर अट्टहास नहीं है? यह लगभग वैसे ही है जब बर्बर कबीले युद्दों में औरतों को लूटकर लाते थे. मंडियों में नंगी औरतों की नुमाइश होती थी. खरीद फरोख्त होती थी. सेक्स स्लेव बनाई जाती थीं. बिल्किस बानो को लेकर एक भारतीय के तौर पर शर्मिंदा होने का वक्त है यह. बिल्किस तुमसे आंख मिलाकर बात करने की हिम्मत नहीं है किसी में. 22 साल पहले 20-30 हत्यारों की भीड़ ने तुम्हारा बलात्कार किया था, लेकिन 22 साल बाद दोषियों की रिहाई के नाम पर उससे भी ज्यादा वीभत्स बलात्कार हुआ है तुम्हारा.

bilkis banoप्रियंका गांधी और बिल्किस बानो.

बिल्किस पर जिम्मेदारी से देश का एक भी नागरिक नहीं बच सकता

इस देश का एक भी नागरिक पल्ला नहीं झाड़ सकता. सब जाने अनजाने बिल्किस बानो के गुनहगार हैं. मैं भी हूं. तुमसे यह भी कहने की हिम्मत कैसे जुटाई जाए कि हो सके तो माफ़ कर देना. माफी की गुंजाइश कहां है भला? दोषियों की रिहाई के लिए गुजरात की भाजपा सरकार से भला क्या ही शिकायत करें. कोर्ट और देश की दूसरी तमाम एजेंसियों से भी भला क्यों सवाल किया जाए. उन्होंने वही किया जो वे कर सकते थे. मगर मैंने भी क्या किया बिल्किस? मुझे धर्म के झंडाबरदारों से उतनी शिकायत नहीं जो बात-बात पर लिबास, बोली भाषा और रंग-रूप के बहाने लड़ते रहते हैं. उस लड़ाई में तो वापस लौटकर साथ बैठने और बात करने की वजहें बची रहती हैं. मगर तुम्हारे पास बार-बार लौटकर भी भला कोई क्या ही बात करेगा बिल्किस. धिक्कार तो है.

तीन दिन हो गए. जब भी लोकतंत्र-लोकतंत्र की धुन सुन रहा हूं- लग रहा जैसे किसी ने कानों में गर्म पिघला शीशा उड़ेल दिया हो. बिल्किस- तुम्हारे लिए गुजरात से दिल्ली तक मुझे लोकतंत्र नजर नहीं दिखा कहीं. अभी कुछ दिन पहले लोकतंत्र दिखा था जब ईडी ने सोनिया गांधी को पूछताछ के लिए बुलाया था. राहुल बाबा को भी. 'कांग्रेस खानदान' सड़क पर ही बैठ गया था. दिल्ली समेत समूचे देश ने अभूतपूर्व आंदोलन देखा. गुजरात में कांग्रेस सबसे बड़ा विपक्षी दल है. पिछले चुनाव में लगभग सरकार बनाने की स्थिति में थी. गुजरात में फिर चुनाव होने हैं और भाजपा के खिलाफ मोर्चे पर कांग्रेस ही है.

'महामानव' अरविंद केजरीवाल की पार्टी भी मोर्चा बनाने की कोशिश में है. और इन्हीं के इर्द गिर्द कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक भाजपा विरोधी तमाम दल मोर्चेबंदी करेंगे. मुझे केजरीवाल से भी ज्यादा शिकायत नहीं. दिल्ली में रोहिंग्या की बसावट के मुद्दे पर उनकी राजनीतिक कलई खुल चुकी है. अगर लोकतंत्र था- तो गुजरात में बिल्किस बानो के सवाल, कांग्रेस की प्राथमिकता में रहते. लेकिन नहीं हैं. भाजपा के सामने अगर केजरीवाल भारत को नंबर वन देश बनाने का सपना देख रहे हैं और गुजरात से उन्हें बहुत उम्मीदें हैं तो उनकी भी जिम्मेदारी थी- बिल्किस बानो. लेकिन जिम्मेदारी कहीं दिखी नहीं.

राजनीति का कौन सा जिन्न है जो बिल्किस पर कांग्रेसी 'राजकुमारी' के पांव बेड़ियों में जकड़े है?

तुम कहते हो लोकतंत्र, मगर ताज्जुब है कि चुनावी राज्य गुजरात में बिल्किस बानो किसी के लिए कोई मुद्दा नहीं है. रस्मी प्रतिक्रियाएं जरूर हैं. राहुल बाबा ने भी प्रतिक्रिया दी और प्रियंका ने भी. तीन दिन बाद- 17  अगस्त को. ट्विटर पर. शायद मैं गलत साबित हो जाऊं. जवाहरलाल नेहरू के राजकुमार और राजकुमारी को खबर ही बहुत बाद में मिली होगी. गुजरात में सन्नाटा है. कोरोना महामारी में जान हथेली पर रखकर नागरिकता क़ानून के खिलाफ मुसलमानों की मदद के लिए स्कूटर पर घूमते दिखी थीं. मैं जानना चाहता हूं उस "जिन्न" का नाम जिसने कांग्रेस की राजकुमारी के पांव में बेड़ियां डाल दी हैं. वह दिल्ली से नहीं निकल पा रही हैं बिल्किस के लिए. राहुल गांधी से क्या ही शिकायत की जाए वो शायद लड़ते-लड़ते थक गए हैं और सोनिया तो खैर बीमार ही हैं.

बिल्किस बानो पर कांग्रेस के अल्पसंख्यक मोर्चे ने कहीं-कहीं रस्मी प्रदर्शन के तहत प्रशासन को ज्ञापन सौंपा है. क्या यह अल्पसंख्यक मोर्चे का विषयभर है?

और केजरीवाल जो गुजरात के बच्चों का भविष्य बनाने बार-बार गुजरात का चुनावी तीर्थाटन कर रहे हैं- बिल्किस बानो पर उनकी हलक से जुबान ही गायब हैं. यहां नीतीश, अखिलेश, तेजस्वी, ममता से क्या ही सवाल पूछा जाए. पर उनके बोलने का भी मतलब है. किसी ने नहीं बोला. अगर यह बिल्किस की जगह बिंदिया होती तो क्या तब भी ऐसा माहौल होता और अगर बिंदिया का मामला गुजरात की बजाए कहीं और का होता तो क्या तब भी कुछ ऐसा ही सन्नाटा नजर आता?

मुझे समझ नहीं आ रहा कि वो कौन सी बात है कि भाजपा के 'बलात्कार पुराण' की वजह से कांग्रेस के 'होठ' सिले हुए हैं. कहीं ऐसा तो नहीं कांग्रेस और विपक्ष भी बिल्किस बानो के बलात्कार का सौदा कर गुजरात की सत्ता चाहती है. और जाहिर है कि 80:20 के धार्मिक बंटवारे में उसे 20 तो चाहिए ही चाहिए 80 के बड़े हिस्से पर भी उसकी नजरें हैं. बिल्किस के दोषियों में सवर्ण, पिछड़े, अति पिछड़े, आदिवासी सब हैं. पटेल बिरादरी भी बताई जा रही है. एक सत्ता में बने रहने के लिए दोषियों को महानायक की तरह पूज रहा और दूसरा चुपचाप बैठा है. 20 जाएगा कहां? उसे तो अंजुमन में बार-बार आना है. फिर कुछ बोलकर 80 को क्यों डिस्टर्ब किया जाए. लोकतंत्र में ऐसे सत्ता पक्ष और विपक्ष जानवरों के लिए तो बेहतर है मगर मनुष्यों के समाज के लिए नहीं.

जय सवर्ण, जय ओबीसी, जय आदिवासी, जय दलित. भेड़तंत्र में सब अपने हिस्से का नारा लगा सकते हैं. भेड़तंत्र इसकी इजाजत देता है बिल्किस बानो.

लेखक

अनुज शुक्ला अनुज शुक्ला @anuj4media

ना कनिष्ठ ना वरिष्ठ. अवस्थाएं ज्ञान का भ्रम हैं और पत्रकार ज्ञानी नहीं होता. केवल पत्रकार हूं और कहानियां लिखता हूं. ट्विटर हैंडल ये रहा- @AnujKIdunia

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