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Updated: 23 फरवरी, 2019 08:57 PM
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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने आम चुनाव की प्रक्रिया पूरी होने तक राम मंदिर का मुद्दा होल्ड करने की बात कही थी. संघ से पहले इस बात का ऐलान विश्व हिंदू परिषद की ओर से किया गया था. इन घोषणओं के बाद भी ऐसा नहीं है कि राम मंदिर की मुहिम थम गयी थी.

14 फरवरी को पुलवामा अटैक के बाद संघ ने अपनी रणनीति बदली है और उसमें राम मंदिर निर्माण की जगह राष्ट्रवाद ले रहा है. ऐसा लगता है संघ कश्मीर समस्या को केंद्र में रख कर मोदी सरकार की अहमियत लोगों को समझाएगा. वैसे तो महबूबा सरकार गिराने के बाद जम्मू-कश्मीर पहुंचे बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने ही इस बात के साफ संकेत दे दिये थे.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद में अपने भाषण में देर तक यही समझाने की कोशिश की थी कि केंद्र में मजबूत सरकार क्यों जरूरी है. चुनावों में संघ के कार्यकर्ता अब यही बात घर घर जाकर समझाने वाले हैं.

मंदिर मुद्दा पीछे छोड़ने की वजह

टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट से लगता है कि संघ ने राम मंदिर मुद्दा सिर्फ कहने भर को होल्ड किया था. रिपोर्ट के मुताबिक इसी फरवरी से राम मंदिर को मुद्दा बनाकर संघ ने मुहिम की शुरुआत कर दी थी ताकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सत्ता में वापसी की राह आसान बनायी जा सके. इससे ऐसा लगता है कि संघ ने राम मंदिर मुद्दा होल्ड इस रूप में किया था कि सरकार को कठघरे में नहीं खड़ा किया जाय.

जनवरी में आए आज तक के सर्वे में एक सवाल पूछा गया था - 'क्या अयोध्या की विवादित जगह पर सरकार को राम मंदिर बनाना चाहिए?'

सर्वे में शामिल 69 फीसदी लोग राम मंदिर निर्माण के पक्ष में देखे गये जबकि 22 फीसदी लोगों ने इसके खिलाफ अपनी राय दी. 9 फीसदी लोग ऐसे भी रहे जिनकी मंदिर निर्माण में कोई दिलचस्पी नहीं देखने को मिली.

अभी आये टाइम्स मेगा पोल में एक सवाल था - 'लोकसभा चुनाव में सबसे बड़ा मुद्दा क्या होगा?'

जवाब में 21.82 फीसदी लोगों ने किसानों की स्थिति को मुद्दा बताया है जबकि '10.16 फीसदी लोग राम मंदिर' को अब भी चुनावी मुद्दा मान रहे हैं. इन्हीं में 35.72 फीसदी ऐसे हैं जो राम मंदिर के निर्माण में कोई प्रगति न होना मोदी सरकार की सबसे बड़ी नाकामी मानते हैं.

मान कर चलना चाहिये कि संघ ने अपना आंतरिक सर्वे भी कराया होगा और उसी के आधार पर राम मंदिर पर अपनी रणनीति की समीक्षा की होगी. पुलवामा हमले के बाद संघ नयी रणनीति पर काम करने लगा है.

नयी मुहिम में संघ का जोर केंद्र में मजबूत सरकार पर है जो कश्मीर के हालात से अच्छे से निपट सके. इसके तहत संघ कार्यकर्ता घर घर जाकर लोगों को समझाएंगे कि कश्मीर समस्या को लेकर मोदी सरकार की वापसी क्यों जरूरी है. कार्यकर्ताओं से कहा गया है कि वे संघ समर्थकों के घर तो जायें ही, उन घरों पर भी दस्तक देना न भूलें जो तटस्थ हैं.

mohan bhagwat, narendra modiक्या आगे जवाब देना मुश्किल नहीं होगा?

सवाल है कि जो सरकार पांच साल में कश्मीर समस्या का कोई हल नहीं निकाल सकी, सत्ता में लौट कर कौन सी जादू की छड़ी उसके हाथ में होगी?

कश्मीर एक्सपेरिमेंट तो फेल ही रहा

बेशक कश्मीर समस्या ऐसी है कि कोई उसे बहुत जल्दी सुलझाने की सोचे, लेकिन ऐसे हालात भी नहीं होने चाहिये कि लगातार स्थिति खराब बनी रहे. जम्मू-कश्मीर में पीडीपी के साथ बीजेपी के सरकार बनाने का आइडिया तो अच्छा रहा, लेकिन ये एक्सपेरिमेंट पूरी तरह फेल रहा. देर करके दो बार साझा सरकार बनने के बावजूद स्थिति नहीं सुधरी और बीजेपी ने समर्थन वापस लेकर सरकार गिरा दी. बाद में भी सरकार बनाने की कई कोशिशें हुईं लेकिन बात नहीं बन पायी.

जम्मू कश्मीर में साझा सरकार बनने के बाद कुछ दिनों तक तो स्थिति वैसी ही बनी रही जैसी ऑटो मोड में पहले से चली आ रही थी, लेकिन जुलाई 2016 में हिज्बुल कमांडर बुरहान वानी के एक मुठभेड़ में मारे जाने के बाद हालात बदतर होते गये. तब से अब तक पांच बड़े आतंकी हमले हो चुके हैं जिनमें सुरक्षा बलों को निशाना बनाया गया है और भारी नुकसान हुआ है.

1. उरी के आर्मी कैंप पर हमले में 20 जवान शहीद - 18 सितंबर 2016

2. नगरोटा में सेना की 16वीं कोर पर हमले में 7 जवान शहीद - 29 नवंबर 2016

3. पुलवामा में हुए हमले में सुरक्षा बलों के 8 जवान शहीद - 26 अगस्त 2017

4. जम्मू सुंजवान आर्मी कैंप पर आतंकी हमले में 6 जवान शहीद - 10-11 फरवरी 2018

5. पुलवामा के अवंतिपोरा में सीआरपीएफ काफिले पर हुए हमले में 40 जवान शहीद - 14 फरवरी 2019

घाटी में रोजाना की पत्थरबाजी के साथ साथ उरी और अब पुलवामा हमले जैसी दो बड़ी घटनाएं हो चुकी हैं. पुलवामा की घटना ने तो ऐसी चिंताजनक स्थिति सामने ला दी है, पता चला कि जम्मू-कश्मीर में ही अब आत्मघाती जिहादी भी तैयार होने लगे हैं. बुरहान वानी मारे जाने के बाद ऑपरेशन ऑल आउट में उसके साथियों के खात्मे के बाद घाटी में शांति की उम्मीद की जा रही थी. बारामूला को आंतकवाद मुक्त घोषित किया जाना भी एक अच्छी खबर रही, लेकिन पुलवामा में सीआरपीएफ के काफिले पर आत्मघाती हमले के बाद स्थिति में सुधार की उम्मीद फीकी लगने लगी है.

अब तो जम्मू-कश्मीर के अलगाववादियों से सुरक्षा कवर भी वापस लिया जा चुका है - लेकिन क्या ये पहले संभव नहीं था. जब आज तक के स्टिंग ऑपरेशन के बाद NIA की जांच में मालूम हुआ कि पत्थरबाजों और पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी के बीच ये अलगाववादी ही माध्यम बन रहे हैं, क्या तभी सुरक्षा कवर वापस नहीं लिया जा सकता था? ये काम पुलवामा अटैक से पहले भी तो हो सकता था.

पाकिस्तान जाने वाली नदियों का पानी रोकना, पाकिस्तानी सामान पर कस्टम ड्यूटी बढ़ाना और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जो कूटनीतिक प्रयास अभी हो रहे हैं वो तो पहले भी हो सकते थे. बहुत पहले न सही, उरी अटैक के बाद तो होना ही चाहिये था. उरी के बदले में सर्जिकल स्ट्राइक के बाद अब एक और सर्जिकल स्ट्राइक की संभावना जतायी जा रही है. अगर उरी के बाद ही सरकार की ओर से तत्परता होती तो शायद ही पुलवामा जैसा आतंकवादी हमला हुआ होता.

क्या ऐसा नहीं है कि संघ को मंदिर निर्माण पर कोई जवाब नहीं सूझ रहा था इसलिए उस पर आक्रामकता छोड़ दी. संघ और बीजेपी नेताओं ने अयोध्या में मंदिर निर्माण के नाम पर माहौल बनाने की कोशिश तो पूरी की थी, लेकिन चुनावों में जब ये पूछा जाता कि जब मोदी सरकार के पांच साल में कुछ नहीं हुआ तो आगे की क्या गारंटी है?

अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने इराक युद्ध में टास्क पूरा करने के लिए दूसरी पारी की अपील के साथ चुनावों में उतरे थे - और अमेरिकी लोगों ने मंजूरी दे दी थी. देखना होगा राम मंदिर की जगह संघ का राष्ट्रवाद के नाम पर कश्मीर समस्या, आतंकवाद और पाकिस्तान को मुद्दा बनाना कितना असरदार होता है?

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