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Updated: 29 अगस्त, 2017 11:43 PM
अशोक उपाध्याय
अशोक उपाध्याय
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बाबा राम को दोषी घोषित करने के फैसले के बाद हुई हिंसा में तीस से ज्यादा लोगों की मौत ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया. घटना के एक दिन के बाद खुद पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने तल्खी दिखाते हुए हरियाणा के मुख्यमंत्री को लताड़ लगाई. कोर्ट ने सीएम खट्टर को वोट बैंक की राजनीति करने और 'राजनीतिक रूप से आत्मसमर्पण' कर देने के कारण खुब खरी-खरी सुनाई.

हाईकोर्ट एक जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी. कोर्ट ने माना कि पंचकुला के डिप्टी कमिश्नर को 'बलि का बकरा' बनाया गया है. इसके साथ ही कोर्ट ने राज्य सरकार की विफलता की गहरी जांच करने को भी कहा.

अदालत ने मुख्यमंत्री की जमकर आलोचना की. मुख्यमंत्री ने आरोप लगाया था कि- हिंसा के पीछे असामाजिक तत्वों का हाथ है. कोर्ट ने कहा, "अगर मुख्यमंत्री को हिंसा के पीछे असामाजिक तत्वों का हाथ होने के बारे में एक दिन में ही पता चल गया, तो आखिर क्यों आप पिछले सात दिनों से इलाके में उनकी इंट्री को रोक नहीं पाए?"

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उच्च न्यायालय ने राज्य के महाधिवक्ता बलदेव राज महाजन को कड़ी फटकार लगाते हुए डेरा सच्चा सौदा की रक्षा के लिए खट्टर को सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराया. "आप [राज्य सरकार] हमें गुमराह करते आ रहे हैं. प्रशासनिक और राजनीतिक निर्णयों के बीच जमीन-आसमान का अंतर है. राजनीतिक फैसलों के कारण ही प्रशासनिक निर्णय प्रभावित हुए. आपने एक डीसीपी को निलंबित कर दिया है. लेकिन क्या वह अकेले ही इस सब के लिए जिम्मेदार था? क्या आप हमें ये बताने की कोशिश कर रहे हैं?"

हालांकि पंचकुला के निलंबित डीसीपी अशोक कुमार कोई पहले व्यक्ति नहीं हैं जिसे राज्यों की बुरी हालत के लिए बलि का बकरा बनाया गया हो. और अगर जवाबदेही तय की जाए तो सबसे पहले नंबर बड़े मंत्रियों का आना चाहिए. भारत ने पिछले 13 दिनों में ऐसे कम से कम दो उदाहरण देखे हैं.

गोरखपुर के बाबा राघव दास मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ. राजीव मिश्रा को उत्तर-प्रदेश सरकार ने 48 घंटे के अंदर 30 बच्चों की मौत के घटना के बाद निलंबित कर दिया. ये मौतें कथित तौर पर ऑक्सीजन की कमी के कारण हुई थीं. और ऑक्सीजन की कमी हॉस्पीटल में इसलिए हुई क्योंकि सप्लायर का बकाया पैसा चुकता नहीं किया जा रहा था. हालांकि राज्य सरकार ने इस आरोप को सिरे से खारिज कर दिया था.

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एक तरफ जहां राज्य सरकार कह रही थी कि किसी भी मौत की वजह ऑक्सीजन की कमी नहीं थी. वहीं दूसरी तरफ उन्होंने ये बात जरुर मानी की 10-11 अगस्त की रात में अस्पताल में ऑक्सीजन की कमी हो गई थी.

हालांकि सबूत बताते हैं कि न केवल अस्पताल प्रशासन ने बल्कि मंत्रियों और खुद सीएम ने भी ऑक्सीजन की कम आपूर्ति वाले रिमांइडर को लगातार नजरअंदाज किया था. लेकिन मेडिकल कॉलेज के कुछ अधिकारियों को छोड़कर किसी और की नौकरी नहीं गई.

इन अधिकारियों ने चूक हुई होगी लेकिन उनके राजनीतिक आकाओं का क्या? अगर बिना किसी जांच के सरकार इन अधिकारियों की गलती मान सकती है तो आखिर वही मापदंड उन मंत्रियों या मुख्यमंत्री पर लागू क्यों नहीं हो सकता है?

इससे तो ऐसा ही लगता है कि बड़े शिकार को बचाने के लिए उन्हें बलि का बकरा बनाया गया है.

उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर के नजदीक उत्कल एक्स्प्रेस के दुर्घटनाग्रस्त होने के तीन दिन बाद ही उत्तरप्रदेश के ही औरेया में एक और ट्रेन हादसा हो गया. उत्कल एक्सप्रेस हादसे में 22 लोगों की मौत हो गई और 150 से ज्यादा लोग घायल हो गए थे. वहीं औरेया ट्रेन हादसे में आजमगढ़-दिल्ली कैफियत एक्सप्रेस के नौ कोच पटरी से उतर गए जिसमें 70 से अधिक लोग घायल हो गए.

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चार दिन के अंदर दो ट्रेन दुर्घटनाओं के बाद रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष अशोक मित्तल ने नैतिकता के आधार पर इस्तीफा दे दिया. इसे तुरंत स्वीकार भी कर लिया गया था. वहीं रेल मंत्री सुरेश प्रभु ने भी दुर्घटनाओं की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफे की पेशकश की थी. लेकिन प्रधान मंत्री ने उनसे इंतजार करने को कह दिया.

मंत्री जी का क्या होगा ये जल्द ही होने वाले कैबिनेट फेरबदल से सामने आएगा. और अगर सूत्रों की मानें तो उन्हें कोई दूसरा पोर्टफोलियो पकड़ाया जा सकता है. यहां भी सरकार को रेलवे बोर्ड के अध्यक्ष के रुप में एक बलि का बकरा मिल गया.

13 दिनों में घटे इन तीन घटनाओं में 100 से अधिक लोगों की मौत हुई. और ये तीनों ही घटनाएं मानव निर्मित आपदाएं थी. लेकिन किसी भी मंत्री या मुख्यमंत्री ने नैतिक जिम्मेदारी नहीं ली. और न ही इस्तीफा दिया. सभी तीन मामलों में कुछ अधिकारियों को "बलि का बकरा" बनाया गया.

हालांकि ऐसा नहीं है कि मनमोहन सिंह की अध्यक्षता वाली पिछली सरकार इनसे बेहतर थी. ये और बात है कि पिछली यूपीए सरकार के दौरान जब ऐसी त्रासदी हुई, भाजपा ने मंत्रियों से इस्तीफे की मांग की. वर्तमान सरकार कम से कम इतना कर सकती है कि जो मांग वो यूपीए सरकार के दौरान करते थे उसे खुद पर लागू कर लें.

अगर ये ऐसा नहीं कर सकते तो इन्हें खुद को "पार्टी विद अ डिफरेंस" कहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है.

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लेखक

अशोक उपाध्याय अशोक उपाध्याय @ashok.upadhyay.12

लेखक इंडिया टुडे चैनल में एडिटर हैं.

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