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Updated: 21 दिसम्बर, 2021 03:05 PM
देवेश त्रिपाठी
देवेश त्रिपाठी
  @devesh.r.tripathi
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स्वर्ण मंदिर (Golden Temple) में गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी के प्रयास में एक युवक की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई. फिर कपूरथला में निशान साहिब के साथ बेअदबी की घटना में एक युवक को पुलिस के कब्जे से छीनकर मौत के घाट उतार दिया गया. पंजाब में सिखों के पवित्र ग्रंथ गुरु ग्रंथ साहिब और प्रतीकों से बेअदबी की घटना निंदनीय है. लेकिन, अमृतसर के स्वर्ण मंदिर और कपूरथला में हुए बेअदबी के मामलों में शामिल युवकों की भीड़ द्वारा हत्या यानी मॉब लिंचिंग पर एक अजीब सा सन्नाटा पसरा हुआ है.

हर राजनीतिक दल, नेताओं, संगठनों ने बेअदबी के इस मामले पर निंदा के साथ ही सामाजिक सद्भाव बिगाड़ने की किसी भी तरह की साजिश को लेकर गहन जांच की मांग की है. लेकिन, इन तमाम लोगों में से किसी ने भी स्वर्ण मंदिर और कपूरथला में हुए बेअदबी के कारण मारे गए युवकों की हत्या करने वालों पर चुप्पी साध रखी है. पंजाब में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं, तो आम जनता की भावना से जुड़े इस बेअदबी मामले पर सियासी दलों की ओर से नपी-तुली प्रतिक्रियाएं ही सामने आ रही हैं. आसान शब्दों में कहा जाए, तो ये भारतीय राजनीति के 'दो चेहरों' को सामने लाता है. जो बेअदबी की निंदा करते हैं, लेकिन लिंचिंग की नहीं.

 Sacrilege Mob Lynchingपंजाब में चुनाव की वजह से बेअदबी मामले पर सभी राजनीतिक दलों की ओर से नपी-तुली प्रतिक्रियाएं ही सामने आ रही हैं.

धर्म के नाम पर राजनीति के 'दो चेहरे'

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ यानी आरएसएस ने बेअदबी के इस मामले की निंदा की है. ये वही हिंदूवादी संगठन है, जिसने मॉब लिंचिंग की घटनाओं को अंजाम देने वाले गोरक्षकों को हिंदूविरोधी तक कह दिया था. आसान शब्दों में कहा जाए, तो धर्म की रक्षा के नाम पर कट्टरवादी सोच के लोगों द्वारा की गई हत्या को आरएसएस की ओर से कभी न्यायोचित नहीं ठहराया गया है. लेकिन, इस मामले पर परोक्ष रूप से ही सही, संघ की ओर से मॉब लिंचिंग को भी सही ठहराने की कोशिश कर दी गई है. 

लेकिन, क्या किसी सिख संगठन की ओर से इस मामले पर ऐसी कोई प्रतिक्रिया सामने आई है, जिसमें बेअदबी की घटना में शामिल युवकों की हत्या करने वाली भीड़ को सिखविरोधी कहा गया हो. खैर, आरएसएस ने क्या किया और क्या कहा, यहां इस बात पर बहस नहीं है. लेकिन, कम से कम इतना साफ होना ही चाहिए कि सिख संगठनों को मॉब लिंचिंग की इस घटना की खुलकर निंदा करने से कौन रोक रहा है?

पंजाब के मलेरकोटला में एक रैली को संबोधित करते हुए नवजोत सिंह सिद्धू बेअदबी करने वालों को कड़ी सजा दिए जाने की वकालत करते दिखे. नवजोत सिंह सिद्धू ने कुरान शरीफ, भगवत गीता, गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी पर लोगों के सामने फांसी देनी की बात कही. जबकि, पंजाब में बेअदबी के किसी भी तरह के मामले में पहले से ही कारावास की सजा का प्रावधान है. ये एक तरह से लोगों को धर्म के नाम पर भड़काने की कोशिश का ही मामला कहा जाएगा. 

पंजाब में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं. हर सियासी दल की कोशिश है कि किसी भी तरह से सिख मतदाताओं को अपने पक्ष में लामबंद कर लिया जाए. इसके लिए ये तमाम सियासी दल मॉब लिंचिंग की इन घटनाओं पर बोलने की जगह बेअदबी को हवा देने में लगे हुए हैं, जो कहीं न कहीं समाज के लिए घातक है.

इसी महीने दिल्ली में फरहान और उसके दोस्तों ने मिलकर एक हिंदू लड़के की हत्या कर दी थी. बताया गया कि मामला प्रेम प्रसंग का था. ऐसे ही कई मॉब लिंचिंग के मामले सामने आ चुके हैं. लेकिन, इस मामले को पहले से जारी आपसी रंजिश का मामला बता दिया गया. आसान शब्दों में कहा जाए, तो तकरीबन हर धर्म के कट्टरपंथियों द्वारा मॉब लिंचिंग की घटनाओं को अंजाम दिया जाता है. लेकिन, हर धर्म के लोगों को अपने यहां होने वाली मॉब लिंचिंग के खिलाफ स्टैंड लेते नहीं देखा जाता है.

अगर पंजाब में अभी इन मॉब लिंचिंग की घटनाओं पर कड़ी प्रतिक्रिया नहीं दी गई या उचित कानूनी कार्रवाई नहीं की गई, तो इससे लोगों की धार्मिक कट्टरता को और बढ़ावा ही मिलेगा. भविष्य में ऐसी घटनाओं के बढ़ने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है. फिर तो पंजाब ही नहीं, पूरे देश में ईशनिंदा के आरोपों के साथ लोगों को निशाना बनाया जा सकता है. मॉब लिंचिंग कर न्याय करने का तरीका लोगों में अराजकता को चरम पर पहुंचा देगा.

कानून को हाथ में लेने का अधिकार किसी को नहीं

सोचकर देखिए कि अगर पंजाब के अमृतसर स्थित स्वर्ण मंदिर और कपूरथला में हुई बेअदबी की घटना पर की गई मॉब लिंचिंग को हिंदू समाज की ओर से अंजाम दिया गया होता, तो क्या होता? राजनीतिक दलों से लेकर बुद्धिजीवियों तक के बीच इन मॉब लिंचिंग की घटनाओं को पूरे बहुसंख्यक हिंदू समाज के माथे पर थोप दिया गया होता. कुछ कट्टरपंथी लोगों की वजह से पूरे हिंदू समाज को कठघरे में खड़ा करने के लिए सोशल मीडिया से लेकर हर संभव मंच से कथित मानवाधिकारों की लड़ाई लड़ने वाले कुछ खास लोगों की ओर से देशभर में वैचारिक तौर पर लोगों के दिमाग में हिंदुओं के प्रति जहर भरा जाने लगता.

लेकिन, पंजाब में हुई मॉब लिंचिंग की घटनाओं पर सीएम चरणजीत सिंह चन्नी की सरकार के गृह मंत्री सुखजिंदर रंधावा कहते नजर आते हैं कि 'लोगों ने भावनाओं में आकर यह कदम उठाया है.' क्या लोगों को गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी पर मॉब लिंचिंग करने का अधिकार पंजाब सरकार और कानून की ओर से दिया गया है? जवाब है नहीं. हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई या किसी भी अन्य धर्म से जुड़ी किताबों के बेअदबी के मामले में पंजाब में आजीवन कारावास की सजा पहले से ही निर्धारित है. फिर लोगों को भड़कने की जरूरत क्या है?

कुछ दिनों पहले ही दिल्ली के सिंघु बॉर्डर पर भी एक दलित शख्स की बर्बर तरीके से हत्या कर दी गई थी. बेअदबी के आरोपी उक्त दलित शख्स के हाथ काटकर उसे किसान आंदोलन के पास लगी बैरिकेडिंग पर लटका दिया गया था. जघन्य तरीके से की गई मॉब लिंचिंग के उस मामले में भी बेअदबी को आधार बनाया गया था. हालांकि, मामले के आरोपी निहंग सिखों को गिरफ्तार कर लिया गया था. लेकिन, निहंग सिखों की ओर से मामले की जांच के लिए बनाई गई कमेटी को धमकी भी दी गई थी कि अगर किसी और निहंग सिख को इस मामले में गिरफ्तार किया गया, तो जेल में बंद निहंगों को भी आजाद करा लिया जाएगा.

वहीं, स्वर्ण मंदिर और कपूरथला में हुई घटनाओं की बात करें, तो दोनों ही जगह आम लोगों ने मॉब लिंचिंग के जरिये हत्याओं को अंजाम दिया. यहां सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर लोग कानून मानेंगे नहीं, तो इसका मतलब ही क्या रह जाता है? अगर कोई शख्स जानबूझकर मॉब लिंचिंग का अपराध करता है, तो उसके खिलाफ कानून को अपना काम करना चाहिए. राजनेताओं को लोगों के बचाव में नहीं उतरना चाहिए. बेअदबी या ऐसी किसी भी घटना पर लोगों को कानून पर भरोसा रखना चाहिए. इस तरह मॉब लिंचिंग के जरिये कानून को हाथ में लेने का अधिकार किसी को नहीं है.

लेखक

देवेश त्रिपाठी देवेश त्रिपाठी @devesh.r.tripathi

लेखक इंडिया टुडे डिजिटल में पत्रकार हैं. राजनीतिक और समसामयिक मुद्दों पर लिखने का शौक है.

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