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सियासत

 |  6-मिनट में पढ़ें  |   07-12-2018
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पश्चिम बंगाल में बीजपी की पहली रथयात्रा की तारीख वही रखी गयी थी जो विधानसभा चुनाव के आखिरी दौर की वोटिंग की रही - 7 दिसंबर. रथयात्रा तो नहीं निकल पायी लेकिन जो बात अमित शाह को कूच बिहार पहुंच कर कहनी थी - वो तो बीजेपी अध्यक्ष ने कह ही डाली.बीजेपी की रथयात्रा पर हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने जो रोक लगायी थी उसे डिवीजन बेंच ने रद्द कर दिया. कोर्ट ने राज्य सरकार को इस बात के लिए फटकार भी लगायी कि बीजेपी की दरख्वास्त को दबाये रखा गया. हाईकोर्ट ने बीजेपी के तीन नेताओं को अधिकारियों के साथ 12 दिसंबर तक मीटिंग कर 14 दिसंबर तक रिपोर्ट भी तलब की है.

अमित शाह की रिमोट रैली

तृणमूल कांग्रेस के राज में पश्चिम बंगाल में रथयात्रा निकालने की अनुमति नहीं मिलने बीजेपी की बौखलाहट और अध्यक्ष अमित शाह का बिफर उठना तो बनता ही है. मगर मानना पड़ेगा अमित शाह की सियासत को. जो भी वो कूच बिहार की रैली में बोलते वे सारी बातें शाह ने प्रेस कांफ्रेंस बुला कर कर डाली. खास बात ये रही कि बीजेपी के कार्यकर्ता भी पहुंचे और भीड़ भी जुटी - बस नेता मौके से नदारद रहे. ऐसा इसलिए क्योंकि नेताओं की मौजूदगी में रथयात्रा का जो कार्यक्रम होता उससे अदालत की अवमानना होती. बीजेपी नेताओं ने सब कुछ ऐसे प्लान किया कि रैली भी हो गयी और तकनीकी तौर पर कुछ भी नहीं हुआ.  

amit shahबीजेपी अध्यक्ष ने तो बैठे बैठे बंगाल में रैली कर डाली

ममता बनर्जी के तेवर की काट में अमित शाह ने भी वैसा ही रुख अख्तियार किया - 'मैं ममता जी को सलाह देता हूं... ऐसी यात्राओं को रोकेंगी तो बंगाल की जनता का आपके प्रति गुस्सा बढ़ेगा... ये तीनों यात्रा निश्चित तौर पर होगी. मैं ही जाऊंगा यात्रा शुरू करने. हम इसके लिए ईंट से ईंट बजा देंगे...' अमित शाह का अपने हर शब्द पर काफी जोर रहा, जैसे कह रहे हों - सुन रही हैं न मुख्यमंत्री ममता बनर्जी. अमित शाह बोले, 'ममता भाजपा की रथ यात्रा से डरी हुई हैं... अभी यात्रा की तारीखें बढ़ाई गईं हैं, उन्हें रद्द नहीं किया गया... यात्रा बंगाल के हर हिस्से से होकर गुजरेगी... ममता को जितना जोर लगाना है, लगा लें...'

लगे हाथ अमित शाह ने पश्चिम बंगाल में महिलाओं की स्थिति, भ्रष्टाचार और कानून व्यवस्था जैसे तमाम मुद्दों पर नाम ले ले कर कड़ी टिप्पणी की - और अच्छे दिन वाले अंदाज में समझाया कि पश्चिम बंगाल में फिर से 'परिवर्तन' आने वाला है.

फर्ज कीजिए रथयात्रा अपने तय कार्यक्रम से हुई होती तो अमित शाह इससे ज्यादा भला क्या कहते. हां, मौके पर पहुंचे होते तो स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं से आमने सामने बैठ कर या किसी हॉल में सामने बैठाकर कुछ और बातें कर लेते. हो सकता है किसी का चेहरा देख कर कोई खास सवाल पूछते या उसकी खासियत के हिसाब से कोई नया काम असाइन करते - वैसे ये सब तो फोन और वीडियो कॉलिंग से भी हो ही जाएगा. देखा जाये तो अमित शाह को रथयात्रा रोके जाने से कम ही नुकसान हुआ बनिस्बत ममता बनर्जी और उनकी तृणमूल कांग्रेस के.

'परिवर्तन' फिर से, लेकिन क्यों?

ममता के ही स्लोगन को हथियार बनाते हुए अमित शाह ने कहा - 'अब बंगाल की जनता परिवर्तन के लिए तैयार है.' लेफ्ट गठबंधन के शासन की खामियां गिनाते कभी ममता बनर्जी भी पश्चिम बंगाल के लोगों को 'परिवर्तन' की प्रेरणा दिया करती थीं.

mamata banerjee'परिवर्तन' फिर से...

फिर अमित शाह ने समझाया कि पश्चिम बंगाल में परिवर्तन क्यों जरूरी है. अमित शाह ने कहा, 'जितनी हिंसा ममता बनर्जी के कार्यकाल में हुई है उतनी हिंसा तो कम्युनिस्ट शासनकाल में भी नहीं हुई थी...'

अमित शाह का इल्जाम है कि पश्चिम बंगाल के पंचायत चुनावों में बीजेपी के 20 कार्यकर्ताओं की हत्या कर दी गई. शाह का आरोप है कि देश में होने वाली सौ राजनीतिक हत्याओं में एक चौथाई पश्चिम बंगाल में होती है.

बीजेपी अध्यक्ष का सवाल रहा, 'सभी हत्याओं में टीएमसी के कार्यकर्ता नामजद हैं... क्या राज्य सरकार बताएगी कि इसमें क्या प्रगति हुई है?' अमित शाह का आरोप है कि ममता बनर्जी की पुलिस और टीएमसी के कार्यकर्ता राजनीतिक हत्याओं को शह दे रहे हैं.

अमित शाह का कहना है कि रथयात्रा के लिए राज्य सरकार से आठ बार अनुमति मांगी गयी थी. तृणमूल सरकार ने पश्चिम बंगाल में सांप्रदायिक तनाव फैलने की आशंका जताते हुए रथयात्रा की अनुमति देने से मना कर दिया था. जब ममता सरकार ने रथयात्रा की अनुमति नहीं दी तो बीजेपी ने कलकत्ता हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. हाई कोर्ट पहुंची बीजेपी को पहले तो निराशा हाथ लगी लेकिन बाद में काफी राहत भी मिली. बीजेपी के कोर्ट जाने से तृणमूल सरकार को फटकार तो मिली लेकिन ममता बनर्जी को फायदा भी हुआ. कूच बिहार का इलाका असम से लगा हुआ है. बीजेपी ने जानबूझ कर रथयात्रा के लिए ये जगह खोजी थी. ये वो इलाका है जहां ममता की पार्टी कुछ कमजोर पड़ती है. बीजेपी रथयात्रा के जरिये अपना एजेंडा आगे बढ़ाती और तृणमूल कांग्रेस को इसका नुकसान होता.

कोर्ट को भी लगा कि ये राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई है और इसमें लोग पिस रहे हैं. कोर्ट का सवाल था कि बीजेपी की अर्जी को डेढ़ महीने तक क्यों दबाये रखा गया - अगर ऐसा होने लगे तो जनता कहां जाएगी. मुद्दे की बात ये भी थी कि दो दिसंबर को ही उसी इलाके में सीताराम येचुरी ने रैली की, लेकिन ममता सरकार को उसमेें कोई दिक्कत नहीं हुई.

बीजेपी ने जो कार्यक्रम बनाया था उसके अनुसार 7 दिसंबर को कूच बिहार से, 9 दिसंबर को दक्षिण 24 परगना जिले से और 14 दिसंबर को बीरभूम जिले में तारापीठ मंदिर से रथयात्रा निकलने वाली थी. रथयात्रा के दौरान ही ‘लोकतंत्र बचाओ रैली’ होने वाली थी.

रथयात्रा पश्चिम बंगाल की 24 जिलों से गुजरते हुए 40 दिन में सभी 294 विधानसभाओं को कवर करती. देखा जाये तो हर लोक सभा क्षेत्र के लिए एक दिन का वक्त तय किया गया था.

रथयात्रा के दौरान ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की एक रैली भी सिलिगुड़ी में 16 दिसंबर को प्रस्तावित थी - लेकिन अब ये सारे कार्यक्रम हाईकोर्ट की हिदायत के अनुसार तय होंगे. हाई कोर्ट ने सूबे की पुलिस से बीजेपी के जिलाध्यक्षों के कार्यक्रम को देख कर रिपोर्ट तलब की है.

इन सब के साथ एक दिलचस्प बात ये हुई है कि रथयात्रा के बाद तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ताओं का कार्यक्रम भी अपनेआप स्थगित हो गया. टीएमसी कार्यकर्ताओं ने रथयात्रा के रास्तों पर कीर्तन करने का कार्यक्रम रखा था. रथयात्रा के रास्तों को पवित्र करने का ये उनका तरीका था.

रथयात्रा बीजेपी का प्रिय और आजमाया हुआ हथियार है. लालकृष्ण आडवाणी आज भले ही मार्गदर्शक मंडल में बैठ कर तमाशा देख रहे हों, लेकिन जिस चबूतरे पर चढ़ कर बीजेपी पूरा हिंदुस्तान देख रही है, उसकी नींव आडवाणी ने ही 1991 में रखी थी. तब आडवाणी का रथ बिहार में ही रोक लिया गया था - फर्ज कीजिये, अयोध्या पहुंच जाता तो क्या हाल होता?

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