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Updated: 21 दिसम्बर, 2018 11:40 AM
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कर्ज माफी एक ऐसा विषय है जिसे लेकर राजनैतिक पार्टियां लोगों के वोट बटोरती हैं. ये बेहद संजीदा है क्योंकि इससे किसानों की जिंदगियां और भारत की अर्थव्यवस्था दोनों ही जुड़ी हुई हैं. 2018 के आखिरी विधानसभा चुनावों में जीत के बाद कांग्रेस सरकार ने तीन राज्यों में कर्ज माफी कर दी है और किसानों के 2 लाख तक के कर्ज माफ कर दिए हैं. हालांकि, इसमें शर्तें लागू वाला कॉलम भी है, लेकिन फिर भी इस घोषणा से लगभग हर तरफ कांग्रेस और राहुल गांधी की वाहवाही हो रही है. होनी भी चाहिए अगर कोई पार्टी सफल तरह से किसानों के लिए कुछ काम कर रही है तो, लेकिन इसमें एक बात सोचने वाली है कि क्या वाकई जिस आदेश पर साइन करके किसानों को राहत देने का वादा किया गया है वो अमल भी हो पाएगा या नहीं?

डेक्कन क्रॉनिकल की एक रिपोर्ट के मुताबिक कर्नाटक की नव-गठित सरकार ने किसानों से जो वादा किया था न तो वो पूरा हुआ और न ही किसानों की आत्महत्या का सिलसिला कम हुआ. रिपोर्ट के मुताबिक करीब 250 किसानों ने पिछले 6 महीने में आत्महत्या की है. हालांकि, एग्रिकल्चर डिपार्टमेंट के सूत्रों का कहना है कि ये बता पाना मुश्किल है कि ये आत्महत्याएं कर्ज के कारण हुई हैं या किसी और कारण से, लेकिन असलियत तो ये है कि कांग्रेस और जेडी(एस) की सरकार किसानों की आत्महत्या रोक पाने में असमर्थ है. आत्महत्याओं का सिलसिला दक्षिणी कर्नाटक में ज्यादा है.

कर्नाटक के वादे और उसका असर-

कर्नाटक में इलेक्शन के पहले जेडी(एस) ने बहुत रैलियां की थीं. जिनमें किसानों की आत्महत्या को एक अहम मुद्दा बनाया गया था. सिद्दारमैया सरकार पर हमला करते हुए कहा जा रहा था कि सरकार किसानों की आत्महत्या रोकने में नाकाम है और सत्ता में आने के 24 घंटे के अंदर किसानों के लिए काम किया जाएगा.

कर्नाटक, कांग्रेस, जेडीएस, किसान, कर्ज माफीकर्नाटक में गन्ना किसानों के लिए रैली करते कुमारस्वामी

हालांकि, कांग्रेस की मदद से अब जेडी(एस) सत्ता में तो आ गई, लेकिन राष्ट्रीय बैंकों ने किसानों के कर्जे को लेकर अभी भी पैसा नहीं निकाला है. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक जहां 44 लाख किसानों को फायदा पहुंचना था वहीं सिर्फ 800 को फायदा पहुंचा है और एक के बाद एक किसान आत्महत्या कर रहे हैं. अब इसको लेकर क्या कहा जाएगा?

रिपोर्ट्स की मानें तो बैंक अभी भी इसका इंतजार कर रहे हैं कि सरकार की तरफ से लिखित आदेश देने की देरी के कारण ये हो रहा है. कर्नाटक गन्ना उत्पादन असोसिएशन के प्रेसिडेंट कुरुबुर शांताकुमार का कहना है कि कोई भी बैंक सिर्फ कही हुई बात पर ही पैसा नहीं देगा उसे लिखित नोटिस देना होगा. ऐसे में सरकार की देरी उन किसानों की आशाओं पर पानी फेर रही है जो ये सोचकर बैठे थे कि उनका लोन माफ हो जाएगा.

किस प्रोसेस से चल रहा है काम?

कुछ रिपोर्ट्स दावा करती हैं कि 27000 किसानों को फायदा पहुंचा है, कुछ कहती हैं कि सिर्फ 800 का ही कर्ज माफ अभी तक हो सका है, लेकिन ये दोनों ही आंकड़े उस जादुई आंकड़े से बहुत दूर हैं जिनका वादा सरकार ने किया था.

बानदेप्पा काशेमपुर (कोऑपरेशन मिनिस्टर) ने संसद में उस स्कीम के बारे में जानकारी दी जिसके चलते किसानों का लोन माफ किया जा रहा है. उनके हिसाब से सरकार एक ग्रीन लिस्ट बनाती है जो दो डेटाबेस के आधार पर होती है. एक तो किसानों द्वारा दिया गया डेटा और दूसरा बैंकों द्वारा दिया गया डेटा. इस आधार पर ग्रीन लिस्ट तैयार होती है. बानदेप्पा के अनुसार इस पूरी प्रक्रिया में किसानों को फायदा पहुंचाने में दिक्कत हो रही है क्योंकि दूसरी ग्रीन लिस्ट नहीं बन पाई है. ये फंड की कमी के कारण नहीं हो रहा है.

रिपोर्ट में ये भी लिखा गया है कि अभी सरकार के पास किसानों की तरफ से पूरे आवेदन ही नहीं आए हैं.

मुद्दा चाहें जो भी हो इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि ऑन पेपर हर वादा पूरा होता हुआ दिख रहा है, लेकिन असलियत वही जानते हैं जो किसान इस वादे के पूरा होने का इंतजार कर रहे हैं. लोन माफ करने की लिमिट 2 लाख बताई गई थी लेकिन अभी तो माफ हो रहा है वो 50 हज़ार तक का लोन है. कर्नाटक सरकार को अभी 48000 करोड़ रुपए का लोन माफ करना है और इसकी शुरुआत अभी भी इतनी धीमी गति से चल रही है कि किसानों की आत्महत्या कम होने का नाम ही नहीं ले रहीं.

अब तीन और राज्यों में भी उसी तरह के आदेश आ गए हैं जो कर्नाटक में थे और इस तरह की बातें की जा रही हैं कि कांग्रेस ने किसानों के लिए बेहद अच्छा काम किया है. पर क्या वाकई में ऐसा हुआ है? अगर कांग्रेस अपने वादे को पूरा कर पाती है तब तो ये सरकार बेहद काम की है और वाकई अन्नदाताओं का कुछ भला होगा, लेकिन अगर नहीं कर पाती है तो फिर ये भी एक खोखले चुनावे वादे की तरह रह जाएगा.

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