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बड़ा आर्टिकल  |  
Updated: 27 जून, 2022 10:03 PM
अनुज शुक्ला
अनुज शुक्ला
  @anuj4media
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शिवसेना के करीब 38 से 42 विधायकों की बगावत के बाद उद्धव ठाकरे की कुर्सी के सभी पाए टूटे नजर आ रहे हैं. दो और नए विधायकों के शिंदे गुट में जाने की खबरें आ रही हैं. संजय राउत डरा-धमकाकर टूटे पाए जोड़ने की कोशिश में हैं. शरद पवार का कुनबा भी अपनी तरफ से प्रयास कर रहा और मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे की पत्नी रश्मि भी बागी विधायकों की पत्नियों से लगातार संपर्क कर रही हैं. रश्मि चाहती हैं विधायकों की पत्नियां- अपने पतियों को वापस पार्टी में आने के लिए 'दबाव' बनाए. उधर, दो दिन पहले उद्धव और शरद पवार की बैठक के बाद कथित शिवसैनिक सड़कों पर अराजकता फैलाने की कोशिश करते देखे जा सकते हैं.

बागी विधायकों के कार्यालयों को निशाना बनाया जा रहा है. संजय राउत तो सरेआम बागी नेताओं को 'देख लेने' की धमकी दे ही रहे हैं. शिवसेना की आक्रामकता के बाद एकनाथ शिंदे ने एनसीपी-कांग्रेस के खिलाफ 'प्लान बी' को अमली जामा पहनाना शुरू कर दिया है. शिंदे की योजना अमल में आई तो उद्धव ठाकरे के पास पिता का सरनेम और मातोश्री के अलावा शायद ही कुछ बचे.

महाराष्ट्र के सियासी गलियारे में चर्चा चल पड़ी है कि बागी नेता शिंदे ने महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) चीफ राज ठाकरे के साथ फोन पर लंबी बातचीत की है. सियासी नजरिए से दोनों नेताओं के बतियाने के मायने सच में बहुत गहरे हैं. हालांकि शिंदे की राज ठाकरे से बातचीत महज हाल जानने भर के लिए बताई जा रही है. पर यह हाल चाल जानने भर का मामला नहीं है. पिछले एक महीने से जारी सिलसिलेवार घटनाओं को देखें तो बातचीत की वजहें और उसका वजन समझना ज्यादा मुश्किल नहीं है.

बगवात के बाद हाल ही में शिवसेना राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक हुई थी. इसमें उद्धव खेमे ने मुख्यमंत्री को बागियों से निपटने के लिए फ्रीहैंड दिया है. कार्यकारिणी में कई प्रस्ताव पास हुए जिसमें से एक बालासाहेब के नाम और उनकी बनाई पार्टी को 'ठाकरे परिवार' के अलावा कोई और इस्तेमाल नहीं कर सकता- शामिल था. यह भी कि शिवसैनिकों (एनसीपी काडर भी है इसमें) की आक्रामकता से दबाव बनाया जाए. शिंदे की असल समस्या यही है और प्लान बी में ही उनकी तमाम परेशानियों का इलाज है.

Shinde speaks to Raj राज ठाकरे, उद्धव और एकनाथ शिंदे.

बागियों को काउंटर करने के लिए विधानसभा उपाध्यक्ष ने सेना के 16 बागी विधायकों को निलंबित करने की याचिका स्वीकार कर ली है. जबकि इससे पहले बागी गुट ने भी एक ऑनलाइन आवेदन दिया था, लेकिन उपाध्यक्ष ने उसे स्वीकार करने से मना कर दिया. उन्होंने विधायकों के जाली हस्ताक्षर होने की आशंका जताई. बागी धड़े ने विधानसभा उपाध्यक्ष की मनमानियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट में संवैधानिक सवाल उठाए और उन्हें मोहलत मिल चुकी है.

एकनाथ शिंदे के प्लान बी में क्या है?

पवार और ठाकरे की मीटिंग के बाद बागी विधायक शिवसेना के निशाने पर हैं. ऐसे में सेना के बागी धड़े ने उद्धव ठाकरे और आघाड़ी सरकार को करारा जवाब देने का मन बनाया है. देखा जाए तो शिंदे का प्लान बी उसी दिशा में है. अभी तक शिंदे की योजना थी कि हिंदुत्व के बहाने बालासाहेब की विरासत का मुद्दा उठाकर पार्टी और उद्धव पर आघाड़ी से बाहर निकलने और भाजपा के साथ सरकार बनाने का दबाव बनाया जाए. लेकिन उद्धव ने साफ कर दिया कि वे किसी भी सूरत में मुख्यमंत्री की अपनी कुर्सी गंवाने को तैयार नहीं हैं.

शिंदे को लगा था कि बगावत के बाद उद्धव को बागियों का फैसला मानने पर विवश होना पड़ेगा. शुरू-शुरू में उद्धव ने बागियों की शर्तों को मानने की बात कही भी, लेकिन बागियों को मुंबई में लौटने को भी कहा. उद्धव भाजपा के साथ अपनी शर्तों पर गठबंधन करना चाहते हैं जो कि संभव नहीं है. क्योंकि उनकी शर्त मुख्यमंत्री की कुर्सी है. ऐसे में उनका मुख्यमंत्री बने रहना सिर्फ आघाड़ी में ही संभव है, भाजपा के साथ 'युति' में नहीं.

शिवसेना में ठाकरे परिवार के भरोसेमंदों और एनसीपी के नेता लगातार बालासाहेब के वाजिब उत्तराधिकारी के रूप में भावुकता के साथ उद्धव का नाम जप रहे हैं. शिंदे खुद को कितना भी समर्पित शिवसैनिक और हिंदुत्ववादी साबित कर लें, मगर यह बड़ा सच है कि बालासाहेब के बेटे के रूप में उद्धव के खिलाफ उनके तरकश में कोई तीर नहीं है. उन्होंने जो शुरुआती दबाव बनाया था, फिलहाल मुख्यमंत्री पर सरकार गंवाने के दुख के अलावा और असर नहीं है. उलटे विधानसभा उपाध्यक्ष और कार्यकर्ताओं की अराजकता के जरिए शिवसेना बागियों के खिलाफ सख्त तेवर अपनाते दिख रही है.

राज ठाकरे-एकनाथ शिंदे की दोस्ती कैसे शिवसेना को परेशान करेगी और यह जरूरी क्यों?

यह खुली बात है कि शिंदे के साथ भाजपा मजबूती से खड़ी है. लेकिन भाजपा शिवसेना में टूट का अपयश अपने माथे लेना नहीं चाहती. पिछले तीन दिनों में जिस तरह से माहौल बना उसके मद्देनजर भी भाजपा की कोशिश है कि शिवसेना में टूट का अपयश शिंदे के माथे भी ना आए. ताकि बालासाहेब की विरासत के बहाने उद्धव ठाकरे, लोकसभा चुनाव में मोदी-शाह की योजना पर पानी ना फेर सकें.

भाजपा और शिंदे ने मिलकर इसकी तरकीब निकाली है. चर्चा है कि शिंदे, बागी विधायकों का मनसे में विलय करना चाहते हैं. पिछले दो दिनों में जिस तरह माहौल बन रहा है- शिंदे के साथ राज ठाकरे का दिखाना भर उद्धव की तमाम योजनाओं को बेकाम कर देगा. राज की आक्रामता, उनकी शैली पर बालासाहेब का जबरदस्त असर है. वे बालासाहेब की तरह ही राजनीति करते हैं और खुद कोई पद लेने की बजाए 'किंगमेकर' बनने में ज्यादा दिलचस्पी दिखाते हैं.

भले ही राज्य की चुनावी राजनीति में मनसे का कोई बड़ा वजूद ना हो, मगर बड़ा सच यही है कि आज की तारीख में राज ठाकरे की टक्कर का भीड़ खींचू नेता महाराष्ट्र में कोई दूसरा नजर नहीं आता. लोग उन्हें खूब पसंद भी करते हैं. और वोट नहीं देने के बावजूद उन्हें सुनने तो पहुंचते ही हैं. माहौल बना तो वोट देने से संकोच नहीं करेंगे. यही वजह है कि महाराष्ट्र के सियासी गलियारे में राज को ही सीनियर ठाकरे का 'योग्य उत्तराधिकारी' बताया जाता है.

शिंदे के साथ राज ठाकरे के आने से कई काम सध जाएंगे. एक तो बागी धड़े को ठाकरे परिवार से योग्य चेहरा मिल जाएगा, जिसकी उन्हें सख्त दरकरार भी है. इससे बालासाहेब की विरासत पर 'ज़ुबानी' दावा कर रहे उद्धव को बड़ा नुकसान होगा. वैसे भी राज, बालासाहेब की विरासत पर राजनीतिक जमीन बनाने के लिए संघर्ष कर ही रहे हैं. व्यक्तिगत सफलता को छोड़ भी दिया जाए तो वे फेल ही साबित कहे जा सकते हैं. सिर्फ एक बार मनसे के 13 विधायक सदन में पहुंचे थे. लेकिन मनसे की स्थिति यह है कि वह ठीक से चुनाव लड़ने की स्थिति में भी नहीं है. कुछ इलाकों को छोड़कर ठोस काडर ही नहीं है. 2019 के लोकसभा चुनाव में मनसे मैदान के बाहर थी.

यह तय है कि शिवसेना के बागी विधायक अगर  आते हैं तो, मनसे की राजनीति शीर्ष पर पहुंच जाएगी. राज को एक भरीपूरी पार्टी मिल जाएगी, जिसका सपना वे कई वर्षों से देख रहे हैं. और इस तरह उद्धव के साथ वे अपना पुराना हिसाब भी बराबर कर सकते हैं. बागी नेता भी अपने मकसद में कामयाब होंगे. शिंदे समेत बागी विधायकों को भाजपा के साथ सरकार बनाने का मौका मिल जाएगा. शिंदे और राज के साथ का मतलब यह भी है कि बालासाहेब की विरासत पर उद्धव का दबदबा लगभग ख़त्म हो जाएगा. वैसे भी आघाड़ी में हिंदुत्व के मुद्दे पर शिवसेना के पास अब अपना मुंह बजाने के अलावा कुछ बचा नहीं है.

shivsena-650_062722031006.jpgमुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे और शरद पवार.

राज के आने का एक मतलब यह भी है कि महाराष्ट्र की जमीन पर उनके खिलाफ शिवसेना और एनसीपी को पीछे हटना पड़ेगा. बागी विधायकों के खिलाफ जिस तरह की अराजकता दिखाई जा रही है- राज ठाकरे के खिलाफ असंभव है. बालासाहेब, शिवसेना और हिंदुत्व को लेकर पार्टी के आम कार्यकर्ताओं के बीच एकनाथ शिंदे की वफादारी को लेकर कोई सवाल नहीं है. शिंदे ने हमेशा ही पार्टी लाइन से हटने को लेकर उद्धव के खिलाफ मोर्चा खोलने में कभी संकोच नहीं दिखाया.

शिवसेना के बागियों को राज ठाकरे का साथ मिलने का और मतलब क्या निकलता है?

बालासाहेब के बाद जब शिवसेना ने पहली बार भाजपा से अलग होने का फैसला लिया था, शिंदे ही थे जिन्होंने उद्धव का विरोध किया. भाजपा-सेना के दोबारा गठबंधन में भी उनकी भूमिका रही है. आघाड़ी में सेना के शामिल होने के फैसले को लेकर भी उन्होंने उद्धव से नाराजगी जताई थी. जहां तक बात शिंदे और राज ठाकरे के संबंधों की है- मनसे चीफ को पता है कि शिंदे विचारधारा को लेकर नेतृत्व के प्रति हमेशा वफादार रहे हैं. दोनों नेताओं ने साथ मिलकर काम भी किया है. दोनों में बेहतर रिश्ता होने की वजहें भी हैं. राज-शिंदे  की अलग-अलग महत्वाकांक्षा एक-दूसरे के पूरक मानी जा सकती हैं. यह भी छिपी बात नहीं कि शिंदे और राज ठाकरे दोनों के कंधे पर मोदी-शाह का हाथ है.

असल में शिवसेना विधायकों की बगावत से कुछ दिन पहले ही राज, हिंदुत्व के मुद्दे पर सक्रिय हुए थे. पहले निर्दलीय सांसद नवनीत राणा और फिर राज की अचानक सक्रियता ने उद्धव की नींद हराम कर दी. राज हूबहू बालठाकरे के अवतार में दिखे. औरंगाबाद में उन्होंने बड़ी रैली की. बालासाहेब की विरासत से पीछे हटाने को लेकर भाई उद्धव ठाकरे को आड़े हाथ भी लिया. उनके आगे आघाड़ी सरकार लगभग विवश थी. शिंदे की फिल्म में अगर राज आ गए तो वह स्थिति फिर बन सकती है. इस तरह शिंदे बागी नेता के रूप में बालासाहेब की पार्टी तोड़ने के अपयश से भी बच जाएंगे.

भाजपा की असल परेशानी शिवसेना नहीं शरद पवार, क्यों चाहिए एक ठाकरे पार्टनर?  

अभी भी शरद पवार भाजपा के सामने चुनौती बने हुए हैं. भाजपा की असल दिक्कत उद्धव ठाकरे नहीं बल्कि शरद पवार ही हैं. पवार का सरकार में होना केंद्र को परेशान कर रहा है. महाराष्ट्र में भाजपा को सामान विचारधारा वाले एक जूनियर पार्टनर की भी सख्त जरूरत है. बागी नेताओं के साथ मनसे कमी पूरा करने में सक्षम है. पिछले कई महीनों से मनसे और भाजपा के बीच पक रही राजनीतिक खिचड़ी चर्चा में है. आने वाले दिनों में मुंबई महानगर पालिका चुनाव में शिवसेना के खिलाफ राज ठाकरे के रूप में तगड़ा सहयोगी भाजपा को ऐतिहासिक सफलता दिला सकता है. मुंबई महानगर पालिका में अभी भी शिवसेना का ही वर्चस्व कायम है.

फिलहाल राज ठाकरे हाल ही में ऑपरेशन कराकर घर पर आराम कर रहे हैं. मस्जिदों से अजान और हनुमान चालीसा विवाद के बाद से मौजूदा सियासी हालात पर उनकी कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है. लेकिन माना जा रहा है कि बालासाहेब ठाकरे का 'योग्य उत्तराधिकारी' राजनीति पर नजर बनाए हुए हैं. शिंदे के साथ उनकी क्या बातचीत हुई और वे क्या फैसला लेते हैं- यह आने वाले दिनों में साफ़ हो सकता है. अब तक भाजपा, उद्धव ठाकरे के लिए एक दरवाजा खोले हुए थी, लेकिन अब वह निरर्थक है.

अगर शिंदे ने प्लान बी पर काम किया तो उद्धव ठाकरे की राजनीति लगभग खात्मे की ओर बढ़ जाएगी.

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लेखक

अनुज शुक्ला अनुज शुक्ला @anuj4media

ना कनिष्ठ ना वरिष्ठ. अवस्थाएं ज्ञान का भ्रम हैं और पत्रकार ज्ञानी नहीं होता. केवल पत्रकार हूं और कहानियां लिखता हूं. ट्विटर हैंडल ये रहा- @AnujKIdunia

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