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Updated: 30 अक्टूबर, 2019 06:24 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
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देवेंद्र फडणवीस ने ऐलान कर दिया है कि वो महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री बनेंगे और सिर्फ बनेंगे ही नहीं - पूरे पांच साल तक बने भी रहेंगे.

मतलब, शिवसेना को बगैर किसी तर्क वितर्क के ढाई साल वाले सीएम का फंडा खत्म समझ लेना चाहिये. मतलब, उद्धव ठाकरे तत्काल प्रभाव से बेटे को तत्काल मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बिठाने का सपना देखना फिलहाल तो छोड़ ही दें. मतलब, आदित्य ठाकरे भी चुपचाप ज्यादा से ज्यादा डिप्टी सीएम की कुर्सी कबूल करते हुए मान जायें क्योंकि ये महज बेहतर नहीं, बल्कि बेस्ट ऑप्शन है.

गठबंधन के नेता देवेंद्र फडणवीस ही हैं

देवेंद्र फडणवीस के बीजेपी विधायक दल का नेता चुना जाना तो महज एक औपचारिक रस्म है - लेकिन तय कार्यक्रम के बावजूद अमित शाह का जाने का इरादा बदल देना गंभीर बात जरूर है. हालांकि, ऐसी गंभीर बातें लंबी नहीं चलने वाली.

फडणवीस की घोषणा ऐसा भी नहीं कि डेढ़ साल पहले कर्नाटक में येदियुरप्पा की महज कुछ घंटे वाली सरकार जैसी है. फडणवीस तो बीजेपी-शिवसेना के चुनाव पूर्व गठबंधन का मुख्यमंत्री चेहरा पहले से ही हैं - और इस तरह गठबंधन के 161 विधायकों के नेता हैं. निर्दलीय विधायकों के समर्थन के बाद तो ये संख्या बढ़ने भी लगी है.

महाराष्ट्र की जनता ने बीजेपी-शिवसेना गठबंधन को वोट दिया है जिसके पहले से ही घोषित नेता देवेंद्र फडणवीस हैं. ये सही है कि महाराष्ट्र के लोगों ने शिवसेना को भी वोट दिया है, लेकिन वो भी तो गठबंधन की ही हिस्सेदार है. शिवसेना के उम्मीदवार आदित्य ठाकरे को भी लोगों के वोट मिले हैं लेकिन घोषित तौर पर मुख्यमंत्री के चेहरे के रूप में नहीं. शिवसेना की ओर से ऐसे दावे जरूर किये जाते रहे कि शिवसैनिक सीएम बनेगा और आरे के पेड़ों को कटवाने वालों को सरकार बनने पर सजा भी मिलेगी - फिर भी लोगों ने शिवसेना को बीजेपी के बराबर वोट नहीं दिया. जैसा बीजेपी के साथ हरियाणा में हुआ.

शिवसेना जितने विधायकों के भरोसे दावा जता रही है, तो एनसीपी के विधायक तो उससे महज दो ही कम हैं. एनसीपी ने तो साफ साफ कह दिया है कि जनादेश विपक्ष में बैठने के लिए है और वो उसका पालन करेगी.

devendra fadnavis with governor koshyariदिवाली की शुभकामनाएं देने के लिए देवेंद्र फडणवीस राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी से मिल चुके हैं

गठबंधन को थोड़ी देर के लिए अलग करके भी देखें तो भी देवेंद्र फणडवीस महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में सबसे ज्यादा सीटें जीतने वाली पार्टी के नेता हैं - और इस नाते मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने का पहला हक तो उनका बनता ही है.

हां, देवेंद्र फडणवीस शिवसेना के मुखपत्र सामना में की गयी टिप्पणियों से नाराज जरूर हैं. यही वजह रही होगी कि फडणवीस ने 50-50 फॉर्मूले को सिरे से ही खारिज कर दिया है. रही बात दोनों पक्षों के एक-दूसरे से दूरी बनाने की तो चालें भी बराबर चली जा रही हैं.

फडणवीस के बायान के बाद शिवसेना ने दोनों दलों की बैठक रद्द कर दी. बैठक में केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावडेकर और शिवसेना के कई सीनियर नेता हिस्सा लेने वाले थे. बैठक में जावडेकर के अलावा बीजेपी नेता भूपेंद्र यादव और शिवसेना की ओर से संजय राउत और सुभाष देसाई के हिस्सा लेने की अपेक्षा थी.

नतीजा ये हुआ कि अमित शाह ने भी महाराष्ट्र का अपना कार्यक्रम रद्द कर दिया. अगर महाराष्ट्र जाकर भी उद्धव ठाकरे से बात और मुलाकात न हो तो कोई मतलब भी नहीं बनता. संपर्क फॉर समर्थन के दौरान तो अमित शाह मातोश्री भी गये थे - लगता है इस बार ठाकरे परिवार की तरफ से वो गर्माहट नहीं दिखी इसलिए दौरा ही टाल दिया.

ध्यान देने वाली एक बात और भी है. दोनों पक्ष हमले जरूर कर रहे हैं लेकिन टारगेट को बचाकर. उसके अगल बगल. शिवसेना सामना के जरिये बीजेपी पर निशाना साध रही है. या फिर प्रवक्ता संजय राउत के जरिये. देवेंद्र फडणवीस भी सीधे सामना पर ही बरस पड़ रहे हैं ये कहते हुए कि सामना की बातें बातचीत को ट्रैक से उतारने वाली लगती हैं.

बीजेपी और शिवसेना नेतृत्व दोनों ही अभी सिर्फ कार्यक्रम रद्द कर रहा है - और रद्द हुआ कार्यक्रम तो कभी भी फिर से बनाया जा सकता है.

बीजेपी हर फ्रंट पर शिवसेना से आगे है

देवेंद्र फडणवीस के 50-50 खारिज करने पर शिवसेना कह रही है कि बीजेपी झूठ बोल रही है - सबके सामने बात हुई थी. जहां तक सबके सामने हुई बात का सवाल है तो एक बार प्रेस कांफ्रेंस में देवेंद्र फडणवीस ने 'सम समान सरकार...' जैसी बात जरूर कही थी. फडणवीस ने जो कुछ समझ कर बोला हो, ऐसा लगता है कि शिवसेना ने अपने हिसाब से उसे ही 50-50 फॉर्मूला बना लिया है - और देवेंद्र फडणवीस कह रहे हैं कि ऐसा कोई फॉर्मूला पहले तय ही नहीं हुआ. शिवसेना के दावे के काउंटर में बीजेपी की ओर से कहा जा रहा है कि ‘सत्ता के समान वितरण को लेकर सहमति बनी थी न कि मुख्यमंत्री पद को लेकर.’

बयानबाजी की इन तमाम उठापटक के बीच महाराष्ट्र बीजेपी के सीनियर नेता चंद्रकांत पाटिल ने कहा है कि राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह और शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे अगली सरकार के गठन के लिये सत्ता साझेदारी के 50-50 फॉर्मूले को अंतिम रूप देंगे.

चंद्रकांत पंडित के यकीन के साथ ये कहने की भी वजह है, शिवसेना के लिए अब भी शाह के पास ढेरों ऑफर हैं - वैसे भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कैबिनेट में शिवसेना को तो एक ही जगह मिली हुई है. हो सकता है शिवसेना के जिद पकड़ने में नजर कैबिनेट पर ही टिकी हुई हो.

बीजेपी को शिवसेना के बगैर भी चुनाव लड़कर महाराष्ट्र में सरकार बना लेने का अनुभव है. देवेंद्र फडणवीस को भी वैसे ही पांच साल सरकार चला लेने का अनुभव है. ये भी 2014 की ही बात है. बेशक शिवसेना चाहे तो खुद भी सरकार बनाने की कोशिश कर सकती है और संभव है कि कामयाब भी हो जाये - लेकिन शिवसेना की अगुवाई वाले सरकार बनाने की संभावना से कहीं ज्यादा कारगर और आजमाया हुआ नुस्खा बीजेपी के पास है.

जब तक फाइनल नहीं होता, महाराष्ट्र में सरकार बनने की तमाम संभावनाएं हैं और उसी हिसाब से समीकरण भी हैं -

1. बीजेपी फिर से NCP का समर्थन ले : 2014 विधानसभा चुनाव के ठीक बाद बीजेपी को शरद पवार की पार्टी एनसीपी ने सपोर्ट देने की बात कही थी. बाद में शिवसेना से बीजेपी का तालमेल हो जाने के बाद एनसीपी पिक्‍चर से आउट हो गयी. बीजेपी के लिए ये मुश्किल काम नहीं है. अगर शिवसेना से तात्कालिक तौर पर पल्ला झाड़ना चाहे तो बीजेपी पुराने तरीके से सरकार बना सकती है.

2. शिवसेना NCP का सपोर्ट ले : शिवसेना ऐसा सिर्फ एनसीपी के बूते नहीं कर सकती है. उसे निर्दलीयों और छोटी पार्टियों का साथ लेना होगा, लेकिन वे सभी बीजेपी में दिलचस्पी दिखा रहे हैं. कांग्रेस जरूर शिवसेना को विकल्प बनने का ऑफर दे रही है, लेकिन उसे अभी तक शिवसेना के रूख की जानकारी नहीं है - ऐसा कांग्रेस नेताओं का दावा है.

छोटी पार्टियों के नेता आगे बढ़ कर बीजेपी का सपोर्ट कर रहे हैं. देवेंद्र फडणवीस एक-एक कर ऐसी मुलाकातों की तस्वीर ट्विटर पर शेयर भी कर रहे हैं. बीजेपी को अब तक जनसूर्या पार्टी के विधायक विनय कोरे, युवा स्वाभिमानी पार्टी के रवि राणा, मीरा-भाएंदर से गीता जैन, बारसी से राजेंद्र राउत, उरान से महेश बाल्दी, गोंदिया से विनोद अग्रवाल जैसे नेता अपने समर्थन का ऐलान कर चुके हैं.

बीजेपी नेता संजय काकड़े का दावा है कि शिवसेना के 56 में से 45 विधायक उनके संपर्क में हैं - और वे सरकार में शामिल होने के लिए बीजेपी के साथ आने के लिए तैयार हैं. भले ही बीजेपी की ओर से ये शिवसेना के खिलाफ काउंटर प्रेशर पॉलिटिक्स का हिस्सा हो, लेकिन ये बात तो उद्धव ठाकरे भी जानते ही होंगे कि विधायक बार बार जनता के बीच जाने और चुनाव लड़ने से घबराने लगे हैं.

अगर शिवसेना नेतृत्व बीजेपी के आगे जिद पर अड़ा रहता है और कोई प्लान बी भी नहीं है - फिर तो पार्टी को बचाये रखना भी बहुत मुश्किल काम होगा. सबको मालूम है आज के दौर में बीजेपी के लिए ये सब बायें हाथ का खेल है.

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लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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