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Updated: 27 फरवरी, 2020 01:08 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
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Delhi Riots: हालात कितने भी नाजुक या मुश्किल क्यों न हों - सियासत अपनी जगह बना ही लेती है - दिल्ली के साथ भी लगता है ऐसा ही हो रहा है. दिल्ली हिंसा (Delhi violence) को लेकर सबसे तल्ख टिप्पणी अदालत की तरफ से आयी है - सुप्रीम कोर्ट (Supreme court) से भी और दिल्ली हाई कोर्ट (Delhi high court) से भी. दिल्ली हाई कोर्ट का कहना है कि दिल्ली दोबारा 1984 के दंगे जैसे हालात नहीं होने देंगे.

सुप्रीम कोर्ट और दिल्ली हाई कोर्ट दोनों ने ही दिल्ली पुलिस की क्लास लगायी है - और राजनीतिक दलों को भी आगाह किया है कि हिंसा के तरीके पर बहस नहीं होनी चाहिये. समझने वाली बात ये है कि देश की सबसे बड़ी अदालत को भी लगता है कि दिल्ली में हो रही हिंसा के तरीके पर जो बहस हो रही है और उसके पीछे राजनीति है - और दिल्ली हाई कोर्ट को भी दिल्ली में 84 के सिख दंगे जैसे हालात की आशंका हो रही है.

दिल्ली में स्थानीय स्तर पर शुरू हुई राजनीति राष्ट्रीय स्तर पर पहुंच चुकी है जहां सत्ता पक्ष और विपक्ष आमने सामने आ चुका है. आम लोग जिंदगी के तो जूझ ही रहे हैं, पुलिसवालों की भी जान पर बन आयी है - सवाल है कि जब जान और माल दोनों का नुकसान हो रहा है तो ऐसी बहस से फायदा किसे हो रहा है?

हिंसा के तरीके पर बहस क्यों?

सुप्रीम कोर्ट में शाहीन बाग पर सुनवाई चल रही थी तभी दिल्ली की ताजा हिंसा का भी जिक्र आया. शाहीन बाग पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई होली तक टाल दी क्योंकि सुनवाई के लायक माहौल नहीं लगता है.

सुनवाई के दौरान दिल्ली हिंसा पर सुप्रीम कोर्ट ने राजनीतिक दलों को संदेश भी दिया और आगाह भी किया. संदेश ये था कि राजनीतिक दलों को लोगों से शांति बनाये रखने की अपील करनी चाहिये थी - और आगाह किया कि हिंसा का तरीका समाज में बहस का तरीका नहीं है - स्वस्थ बहस होनी चाहिये लेकिन हिंसा नहीं होनी चाहिये.

सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी को नागरिकता संशोधन कानून के पक्ष और विरोध में चल रही बहसों के संदर्भ में देखना होगा. नेताओं के भड़काऊ बयानों से भी जोड़ कर समझना होगा, जिसे दिल्ली हाई कोर्ट ने भी गंभीरता से लिया है.

शाहीन बाग के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मामले की सुनवाई जरूर हो रही है, लेकिन पुलिस के एक्शन लेने पर कोई रोक नहीं है. पुलिस अपना काम करे - और कभी कभी ऐसा भी होता है जब लीक से अलग हटकर भी काम करना पड़ता है.

सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस केएम जोसेफ का कहना रहा - जब भड़काऊ टिप्पणी की गई, तभी एक्शन लेना चाहिए था. ये बात दिल्ली ही नहीं हर मामले में लागू होती है. पुलिस को सिर्फ कानून के अनुसार काम करना चाहिए.

एक्शन न लेने के लिए जस्टिस केएम जोसेफ ने पुलिस के पेशेवर तरीके से काम नहीं करने को लेकर भी फटकार लगायी.

दिल्ली पुलिस के कमिश्नर रहे अजयराज शर्मा का सवाल भी करीब करीब वैसा ही है. बीबीसी से बातचीत में शर्मा पूछते हैं - 'मुझे ये समझ नहीं आ रहा कि पुलिस हरकत में क्यों नहीं आ पाती? क्या उनको रोका गया है? क्या उनके हाथ-पैर बांध दिए गए हैं?'

अजयराज शर्मा बताते हैं, 'हम जब सर्विस में थे तो पहले एक्शन लेते थे और फिर बताते थे कि हालात ऐसे थे कि एक्शन लेना पड़ा. लेकिन अब पहले सरकार से पूछा जाता है कि हम एक्शन ले या ना लें.'

दिल्ली पुलिस के कमिश्नर का कहना है कि स्थिति नियंत्रण में है - और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने भी बोल दिया है कि पुलिस मुस्तैद है. अजीत डोभाल ने दिल्ली के कई इलाकों का दौरान करने के बाद अमित शाह को ग्राउंड रिपोर्ट भी दे दी है.

मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली में सेना तैनात करने की बात की थी, लेकिन केंद्र सरकार को नहीं लगा कि ऐसी कोई जरूरत है. केंद्र सरकार ने दिल्ली को सेना के हवाले तो नहीं किया, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार को मैदान में आकर मोर्चा जरूर संभालना पड़ा. न्यूज एजेंसी ने दिल्ली पुलिस के एक अफसर के हवाले से रिपोर्ट दी है जिसमें बताया गया है कि अजीत डोभाल 25 फरवरी को रात 11 बजे उत्तर-पूर्वी जिले में पहुंचे - और पुलिस अफसरों से बात कर स्थिति समझने की कोशिश की.

अजीत डोभाल का पहला सवाल था - हालात आखिर इतने बिगड़ने की नौबत कैसे आई?

रिपोर्ट के मुताबिक पुलिस अफसरों के पास कोई जवाब ही नहीं था. वे बिलकुल खामोश रह गये. फिर पूरी बातचीत में अफसर हां-हूं बोल कर काम चलाते रहे. बाद में 26 फरवरी को भी डोभाल ने दिल्ली के कई इलाकों का दौरा किया और लोगों से बातचीत कर स्थति को समझने की कोशिश की. जम्मू-कश्मीर को लेकर धारा 370 खत्म किये जाने के बाद भी अजीत डोभाल ने लोगों के बीच जाकर ऐसे ही मुलाकात की थी.

दिल्ली हाई कोर्ट ने तो बीजेपी नेता कपिल मिश्रा के बयान का वीडियो भी भरी अदालत में चलवाया - और दिल्ली पुलिस के कमिश्रनर को भी ऐसा ही करने और फिर उसी के हिसाब से एक्शन लेने का आदेश दिया है.

कपिल के चक्कर में अनुराग और प्रवेश वर्मा भी लपेटे में

एक याचिका पर सुनवाई करते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने दिल्ली पुलिस ये भी पूछा कि कपिल मिश्रा के साथ नजर आ रहा अफसर कौन है? कपिल मिश्रा के साथ साथ अदालत में केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर और बीजेपी सांसद प्रवेश वर्मा का भी वीडियो देखा गया.

कपिल मिश्रा CAA के समर्थन में सड़क पर उतरे थे और कहा था, 'ये यही चाहते हैं कि दिल्ली में आग लगी रहे, इसीलिए इन्होंने रास्ते बंद किये और इसीलिए ये दंगे जैसा माहौल बना रहे हैं. डीसीपी साहब, आप सबके सामने खड़े हैं... मैं आप सबकी ओर से ये बात कह रहा हूं कि ट्रंप के जाने तक तो हम शांति से जा रहे हैं - लेकिन उसके बाद हम आपकी भी नहीं सुनेंगे अगर रास्ते खाली नहीं हुए तो. ठीक है?'

कपिल मिश्रा खुद तो विधानसभा चुनाव हार गये, लेकिन अपनी राजनीति चमकाने के चक्कर में दिल्ली से सांसद प्रवेश वर्मा और केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर को भी कार्रवाई की जद में ला खड़ा किया है. विधानसभा चुनाव के दौरान ये तीनों ही चुनाव आयोग की निगाह में चढ़ें थे लेकिन नतीजे आने के बाद मामला निबट चुका था. कपिल मिश्रा के ताजा बयान के बाद हाई कोर्ट में एक याचिका दायर हुई जिसमें हिंसा भड़काने के लिए जिम्मेदार लोगों पर FIR दर्ज कर गिरफ्तार करने की मांग की गयी है.

सुनवाई के दौरान अदालत बार बार ये जानने में तत्पर दिखी कि आखिर भड़काऊ बयान को लेकर केस क्यों नहीं दर्ज हुआ? कोर्ट ने सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता से पूछा कि क्या उन्होंने वीडियो देखा है - तुषार मेहता का कहना रहा कि वो टीवी नहीं देखते इसलिए वीडियो नहीं देखा है. कोर्ट में मौजूद अपराध शाखा के डीसीपी राजेश देव ने बताया कि वो अनुराग ठाकुर और प्रवेश वर्मा का वीडियो तो देख चुके हैं, लेकिन कपिल मिश्रा वाली वीडियो क्लिप नहीं देखी है.

फिर हाई कोर्ट ने मौके पर ही वीडियो क्लिप चलाने को कहा - और तीनों नेताओं के बयानों वाली वीडियो क्लिप एक एक कर देखी. कोर्ट ने तुषार मेहता को कहा कि वो दिल्ली पुलिस के कमिश्नर को वीडियो देखने को बोलें और उस पर सोच समझ कर एक्शन लेने को कहें - और फिर अदालत को वस्तुस्थिति से अवगत भी कराया जाये.

दिल्ली चुनाव 2020 के दौरान बीजेपी नेता कपिल मिश्रा का एक बयान काफी चर्चित रहा जिसमें उन्होंने वोटिंग के दिन कहा था कि भारत और पाकिस्तान के बीच मुकाबला होने जा रहा है. कपिल मिश्रा अरविंद केजरीवाल पर 2017 से ही हमलावर हैं और दो करोड़ रुपये रिश्वत लेने तक का आरोप लगा चुके हैं.

कपिल मिश्रा दिल्ली सरकार में मंत्री थे, लेकिन 2017 में अरविंद केजरीवाल के खिलाफ बगावत के बाद से ही अपनी जमीन तलाश रहे हैं. 2015 में आप के विधायक रहे कपिल मिश्रा इस बार बीजेपी के टिकट पर चुनाव तो लड़े लेकिन हार गये.

कहां कपिल मिश्रा दिल्ली में बीजेपी की सरकार बनने की उम्मीद में थे और कहां विधायक भी बनने से रह गये. अब उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती दिल्ली की राजनीति में खुद को स्थापित करने की है. कपिल मिश्रा ने इस बात को शिद्दत से महसूस किया होगा कि कैसे भड़काऊ बयान देकर प्रवेश वर्मा अपना कद बढ़ाते जा रहे हैं - जाहिर है कपिल वर्मा को भी वैसी ही उपाय सूझी. वैसे भी वो तो इस फन के पहले से ही माहिर रहे हैं. बीजेपी में आने से पहले कपिल मिश्रा प्रधानमंत्री मोदी पर भी तीखे हमले करते रहे, लेकिन आम आदमी पार्टी में बगावत के बाद से उका रवैया पूरी तरह बदल गया.

कपिल मिश्रा की बयानबाजी मनोज तिवारी को वैसे ही नागवार लगी है जैसे प्रवेश वर्मा की. मनोज तिवारी ने वैसे तो हार की जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफे की पेशकर कर दी थी, लेकिन किसी और वर्चस्व बढ़ता कैसे हजम हो. कपिल मिश्रा की बयानबाजी को लेकर दिल्ली बीजेपी अध्यक्ष मनोज तिवारी और सांसद गौतम गंभीर ने भी नाराजगी जताते हुए एक्शन लिये जाने की बात कही है. नतीजा ये हुआ है कि ऐसा करके दोनों ही बीजेपी के निशाने पर आ गये हैं - क्योंकि बीजेपी के ज्यादातर नेता कपिल मिश्रा के सपोर्ट में खड़े नजर आ रहे हैं. अब जबकि कपिल मिश्रा के चलते अनुराग ठाकुर और प्रवेश वर्मा भी लपेटे में आ चुके हैं - देखना होगा कि बीजेपी के अंदर कैसी लामबंदी होती है?

ये तो अंदर की बात हुई, बीजेपी नेतृत्व पर सोनिया गांधी ने भी हमला बोल दिया है. सोनिया गांधी ने तो दिल्ली हिंसा के लिए गृह मंत्री अमित शाह को जिम्मेदार ठहराते हुए इस्तीफा ही मांग लिया है - लेकिन नतीजा ये हुआ है कि बीजेपी ने भी 1984 के सिख दंगों का नाम लेकर कांग्रेस पर धावा बोल दिया है.

अब क्या कहेंगे कि दिल्ली में 20 से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है और उनमें एक पुलिसकर्मी भी है. आईबी के एक कर्मचारी की लाश मिली है. एक पत्रकार को गोली लगी है और एक डीसीपी अस्पताल में जिंदगी की जंग लड़ रहा है - जिन्हें अपनी राजनीति आगे बढ़ानी है वे अपने अपने मिशन में लगे हुए हैं.

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लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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