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Updated: 25 फरवरी, 2020 03:43 PM
बिलाल एम जाफ़री
बिलाल एम जाफ़री
  @bilal.jafri.7
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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का भारत आना (Donald Trump India Visit 2020) भर था. नागरिकता संशोधन कानून (Citizenship Amendment Act) के विरोध प्रदर्शनों (Anti CAA Protest) को हवा मिल गई. राजधानी दिल्ली में फिर एक बार विरोध प्रदर्शनों ने दंगे (Delhi riots violence) का रूप लेना शुरू कर दिया है. विवाद की शुरुआत उस वक़्त हुई जब पूर्वी दिल्ली के जाफराबाद (Jafarabad) में कानून के खिलाफ सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे एंटी सीएए प्रोटेस्टर्स के सामने वो लोग आए जो सरकार के इस कानून का समर्थन कर रहे थे. दोनों ही पक्षों के आमने सामने आने के बाद हालत बेकाबू हुए और टकराव की स्थिति बनी. जैसे जैसे समय बीता नारेबाजी ने उग्र रूप लिया. नतीजा ने निकला कि पुलिस की मौजूदगी में दोनों ही पक्षों ने एक दूसरे पर पथराव किया. गोली चली. घरों में लूटपाट हुई. वाहनों, घरों, दुकानों को आग के हवाले किया. लोगों को घेरकर मारा गया. नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में दिल्ली के मौजपुर, जाफराबाद, सीलमपुर, गौतमपुरी, भजनपुरा, चांद बाग, मुस्तफाबाद, वजीराबाद और शिव विहार जैसे हिस्सों में मचे ताजे बवाल में अब तक दिल्ली पुलिस के हेड कॉन्स्टेबल समेत 7 लोगों की मौत हो गई है और तकरीबन 100 लोग घायल हुए हैं. आगे स्थिति और वीभत्स न हो इसलिए प्रशासन भी हरकत में आया है और अगले एक महीने तक इन सभी इलाकों में स्कूलों को बंद करके परीक्षाओं को स्थगित कर धारा 144 लगा दी गई है. हिंसा के बाद केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह (Amit Shah) ने दिल्ली के उपराज्यपाल अनिल बैजल, मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल (Arvind Kejriwal) समेत सभी पार्टियों के प्रतिनिधि की एक बैठक बुलाई है जिसमें सभी ने इस बात पर बल दिया कि दंगाइयों के विरुद्ध सख्त से सख्त एक्शन लिया जाना चाहिये और शांति स्थापित करनी चाहिए.

Delhi Violence, Donald Trump, Delhi Police, CAA Protest , AAP  नागरिकता संशोधन कानून के समर्थकों और पुलिस पर पथराव करती कानून के विरोध में सड़कों पर उत्पात मचाती भीड़

पूर्वी दिल्ली के मौजपुर, जाफराबाद, सीलमपुर, गौतमपुरी, भजनपुरा, चांद बाग, मुस्तफाबाद, वजीराबाद और शिव विहार में नागरिकता संशोधन कानून के विरोध प्रदर्शनों के उग्र रूप लेने के बाद जिस बात की आशंका जताई जा रही थी वही हुआ है. ध्यान रहे कि पहले टकराव एंटी सीएए प्रोटेस्टर्स और पुलिस के बीच था आम लोगों ने इससे दूरी बनाई हुई थी लेकिन अब ऐसा नहीं है. हालात जो बदले हैं और जैसे स्थिति बद से बदतर हुई है उसकी एक बड़ी वजह अब आम नागरिकों का इसमें शामिल होना माना जा रहा है.

दिल्ली में मचे बवाल के बाद एक बार फिर से राजनीति तेज हो गई है. आरोप प्रत्यारोप जारी हैं विपक्ष जहां एक तरफ इन बिगड़े हालात के लिए आम आदमी पार्टी और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को जिम्मेदार ठहरा रहा है कि ये दंगा पूर्व आप नेता और वर्तमान में भाजपा से जुड़े कपिल मिश्रा के उस भाषण के बाद भड़का जहां उन्होंने पुलिस की मौजूदगी में न सिर्फ उग्र भाषण दिया बल्कि ये तक कहा कि यदि पुलिस शाहीनबाग और जाफराबाद में बंद सड़कों को नहीं खोलती तो फिर सड़कों पर आया जाएगा.

वहीं एक वर्ग वो भी है जो दिल्ली में फैली इस अराजकता के लिए एआईएमआईएम नेता वारिस पठान के उस भाषण को भी जिम्मेदार मान रहा है जो अभी हाल ही में उन्होंने कर्नाटक की राजधानी बैंगलोर में दिया था. ध्यान रहे कि बैंगलोर में नागरिकता संशोधन कानून के विरोध में पार्टी सुप्रीमो असदउद्दीन ओवैसी ने एक रैली का आयोजन किया था जिसने बोलते हुए पार्टी के नेता वारिस पठान ने ऐसा बहुत कुछ कह दिया जिसके नतीजे के रूप में हम दिल्ली को जलते हुए और लोगों को मरते हुए देख सकते हैं.

दिल्ली में हुई इस हिंसा ने इतना विभत्स रूप क्यों लिया इसकी एक बड़ी वजह उन तमाम सोशल मीडिया हैंडल्स को माना जा सकता है जो लगातार भड़काऊ तस्वीरें, वीडियो इत्यादि शेयर कर रहे हैं और तनाव की आग में खर डालने का काम कर रहे हैं.

ये देखना अपने आप में दुर्भाग्यपूर्ण है कि सोशल मीडिया पर एक अलग ही तरह का एजेंडा चलाया जा रहा है. मामला सामने आने के बाद लोग अपनी सुचिता और सुविधा के हिसाब से इस हिंसा को परिभाषित कर रहे हैं जिसका नतीजा ये निकल रहा है कि हिंसा की ये आग थमने के बजाए लगातार बढ़ती जा रही है और दिल्ली के साथ साथ पूरे देश को प्रभावित कर रही है.

जिक्र मामले पर एजेंडा चलाने का हुआ है तो फ़िलहाल सोशल मीडिया इसमें सबसे तेज नजर आ रहा है.

मामले ने फिर एक बार दिल्ली पुलिस को सवालों के घेरे में लाकर खड़ा कर दिया है. सोशल मीडिया पर ऐसे तमाम वीडियो हैं जिनमें साफ़ तौर से देखा जा सकता है कि दिल्ली पुलिस दंगाइयों को संरक्षण दे रही है और जो कुछ भी अराजकता फैल रही है उसकी एक बड़ी वजह दिल्ली पुलिस का रवैया है.

दिल्ली में हुई हिंसा के इस ताजे मामले में ऐसे भी तमाम वीडियो आये हैं जिनमें हम एक्शन के बाद पकड़े गए लोगों को बीच सड़क पर पुलिस द्वारा टॉर्चर करते हुए देख रहे हैं.

मामले में दिल्ली पुलिस के हेड कांस्टेबल रतन लाल की मौत भी एक बड़े मुद्दे की तरह बहार आ रही है जिसपर भी राजनीति तेज हो गई है. सोशल मीडिया पर ऐसी तमाम प्रोफाइल हैं जिन्होंने अपनी डीपी में दिल्ली पुलिस के हेड कांस्टेबल रतन लाल की तस्वीर लगाई है और मांग की जा रही है कि उसकी हत्या में जिम्मेदार लोगों को सख्त से सख्त सजा दी जाए.

नागरिकता के नाम पर दोनों ही पक्षों की अराजकता का ये मामला इतना पेचीदा है कि अभी इसपर कुछ कहना जल्दबाजी है. लेकिन जिस तरह अब ये मामला पुलिस बनाम कानून के विरोधी न होकर कानून के विरोधी बनाम कानून के समर्थक हुआ है खौफ्नाम स्थिति पैदा हो गई है. अब जबकि इतना सब हो चुका है इस बात को आसानी से समझा जा सकता है कि चिंगारी लग चुकी है और अभी ये आग और फैलेगी और क्या दोषी क्या निर्दोष सभी इसकी चपेट में आएंगे.

ऐसा नहीं है कि इससे बचा नहीं जा सकता मगर बचने के लिए हमें सवाल अपने आप से करना होगा. हमें ये देखना होगा कि कहीं इस आग में एक चिंगारी हमारी तो नहीं है.

तमाम सवाल है जिनका जवाब खुद जनता को देना चाहिए और इस बात का फैसला करना चाहिए कि क्या यही वो भारत है जिसकी कल्पना हमारे पुरखों ने की थी? होने को इस सवाल के जवाब तमाम हो सकते हैं मगर एक ईमानदारी भरा जवाब शायद न है. ये सावधान रहने और अफवाहों से बचने का वक़्त है अगर अफवाहों से बचने के लिए हमने अपनी इन्द्रियों पर नियंत्रण कर लिया तो निश्चित तौर पर सब सही हो जाएगा वरना ये आग लग चुकी है आगे और फैलेगी और इसकी चपेट में निर्दोष और उनके परिवार आएंगे. 

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लेखक

बिलाल एम जाफ़री बिलाल एम जाफ़री @bilal.jafri.7

लेखक इंडिया टुडे डिजिटल में पत्रकार हैं.

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