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Updated: 16 मई, 2019 11:08 PM
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विपक्षी खेमे से प्रधानमंत्री पद का एक और दावेदार कम हो गया है. शरद पवार, एचडी देवगौड़ा और एन. चंद्रबाबू नायडू के साथ इसमें एक और नाम जुड़ गया है - राहुल गांधी. पहले इस कतार में नीतीश कुमार भी हुआ करते थे, मुमकिन है 23 मई के बाद वो फिर से खड़े हों और दावा ठोक दें - लेकिन अभी तो ऐसी कोई बात नहीं है. अभी राजनाथ सिंह की तरह नीतीश कुमार के भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ही श्योर हैं. बाकी वे नेता हैं जिन्होंने खुद कहा है कि प्रधानमंत्री पद को लेकर उनकी कोई दिलचस्पी नहीं है.

राहुल गांधी के रेस से हट जाने के बाद अब हवा में जो नाम तैर रहे हैं, वे हैं - ममता बनर्जी और मायावती. दावेदार तो अरविंद केजरीवाल भी हैं, लेकिन न तो खुद उन्होंने कभी दावा किया है और न ही किसी नेता ने उनके नाम का सपोर्ट किया है. ममता बनर्जी ने भी कभी खुल कर नहीं कहा है कि वो प्रधानमंत्री बनना चाहती हैं. ममता बनर्जी की राय अब तक यही रही है कि चुनाव नतीजे के बाद प्रधानमंत्री पद पर मिल बैठकर आम राय बने. मायावती की जरूर अलग अलग तरीके से संकेत देने की कोशिश रही है कि सबसे बड़ी दावेदार वही हैं - और इसके लिए बीएसपी नेता ने बीजेपी के लिए भी हाथ मिलाने का रास्ता बंद नहीं किया है.

कांग्रेस की घोषणा ने अपनी ओर से विपक्ष की मुश्किल खत्म जरूर कर दी है, लेकिन बहुत देर हो चुकी है. वैसे कांग्रेस के इस कदम की असली वजह क्या हो सकती है - क्या कांग्रेस को विपक्षी खेमे से अलग हो जाने का डर था?

प्रधानमंत्री की कुर्सी पर राहुल गांधी की दावेदारी

प्रधानमंत्री बनने को लेकर राहुल गांधी के दो बयान महत्वपूर्ण रहे हैं - एक जो राहुल गांधी ने कर्नाटक चुनाव के दौरान दिया था और दूसरा जो एक सवाल के जवाब में कहा था. कर्नाटक चुनाव के दौरान राहुल गांधी ने कहा था कि अगर कांग्रेस केंद्र में सरकार बनाने की स्थिति में पहुंचती है तो वो प्रधानमंत्री बनने को तैयार हैं. बाद में महिला पत्रकारों के साथ बातचीत में जब एक सवाल पूछा गया तो राहुल गांधी ने साफ साफ कहा था कि ममता बनर्जी या मायावती के प्रधानमंत्री बनने पर उन्हें कोई ऐतराज नहीं है. हालांकि, ये दोनों ही बयान 2018 में तीन राज्यों में कांग्रेस की सरकारें बनने के पहले के हैं. चुनाव जीतने के बाद से राहुल गांधी की छवि निखर आयी और विपक्षी खेमे के नेता भी संकोच करने लगे.

हाल ही में एनडीटीवी के साथ एक इंटरव्यू में भी प्रधानमंत्री बनने के जिक्र के साथ सरकार में उनकी भागीदारी को लेकर राहुल गांधी से सवाल पूछा गया था. राहुल गांधी का कहना रहा, 'जब हमारी सरकार थी मैंने मनमोहन सिंह जी को कमिटमेंट दिया था कि सरकार मनमोहन सिंह जी चलाएंगे - और मैं उस सरकार में हस्तक्षेप नहीं करूंगा... मैंने उस टाइम के कांग्रेस प्रेसिडेंट को भी पहले ही बोल दिया था कि मनमोहन सिंह प्राइम मिनिस्टर हैं, मैं कांग्रेस में काम कर रहा हूं, मैं पॉलीटिकल एक्टिविटी कर रहा हूं, मैं कांग्रेस पार्टी को मजबूत करने का काम कर रहा हूं, लेकिन मैं सरकार में काम नहीं करूंगा. पहले दिन से मैंने ये साफ कर दिया था.'

rahul gandhiफिलहाल PM की रेस से बाहर हैं राहुल गांधी

कांग्रेस अध्यक्ष का ये बयान एक तरीके से उस तोहमत पर भी सफाई है जिसमें माना जाता रहा कि राहुल गांधी की न राजनीति में दिलचस्पी है और न ही कोई जिम्मेदारी लेने में. वैसे राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष की जिम्मेदारी लेने के बाद तीन राज्यों में पार्टी की सरकार बनवा चुके हैं.

राहुल गांधी ने ठीक ही किया

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चैलेंज करने से पहले विपक्ष के सामने PM कैंडिडेट ही चुनौती बना हुआ था. राहुल गांधी का नाम तात्कालिक तौर पर वापस लेकर कांग्रेस ने विपक्षी खेमे को बड़ी राहत दी है.

narendra modiराहुल गांधी के PM की रेस से हटने कितना फर्क पड़ेगा?

विपक्षी खेमे में प्रधानमंत्री पद को लेकर एक तरीके से 'आम राय' पर आम राय बन रही थी. इस आम राय में कांग्रेस का रिजर्वेशन बहुत बड़ी बाधा रही. विपक्ष बड़ी पार्टी होने के कारण कांग्रेस को छोड़ना भी नहीं चाहता था और राहुल गांधी को लेकर कांग्रेस की जिद को हजम भी नहीं कर पा रहा था. कांग्रेस नेता गुलाम नबी आजाद का प्रधानमंत्री पद को लेकर बयान विपक्षी नेताओं के लिए राहत भरा है.

प्रधानमंत्री पद को लेकर राहुल गांधी की उम्मीदवारी पर गुलाम नबी आजाद ने कहा, 'अगर हमें इस पद के लिए आमंत्रित नहीं किया जाता तो हम इसे मुद्दा नहीं बनाएंगे.'

देखा जाये तो कांग्रेस का ये बयान तब आया है जब महज 59 सीटों पर वोटिंग बाकी है - और उनमें पंजाब की 13 सीटें भी हैं जहां कांग्रेस की सरकार है.

कांग्रेस की ओर से ये बयान बहुत सोच समझ कर दिया गया लगता है. 19 मई को आखिरी चुनाव और नतीजे के बीच सिर्फ चार दिन का फासला है. कांग्रेस चाहती तो वोटिंग खत्म होने का इंतजार भी कर सकती थी, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया क्योंकि विपक्षी नेताओं की एक महत्वपूर्ण मीटिंग की कोशिश चल रही है. कांग्रेस का बयान उस मीटिंग के हिसाब से काफी महत्वपूर्ण लगता है.

ममता बनर्जी ने अभी तक उस मीटिंग को लेकर मंजूरी नहीं दी है. मीटिंग को लेकर ममता बनर्जी से मुलाकात से ठीक पहले चंद्रबाबू नायडू ने दिल्ली में राहुल गांधी से भी मुलाकात की थी.

बेहतर तो ये होता कि कांग्रेस ये बात पहले बता दी होती. कांग्रेस के पहले ऐसा न कहने के पीछे कार्यकर्ताओं के उत्साह में कमी आने का डर रहा होगा. कांग्रेस की ओर से ऐसे किसी बयान से कार्यकर्ताओं का उत्साह कम हो सकता था और उनकी सक्रियता कम होने का डर तो होगा ही.

देखा जाये तो कांग्रेस नेताओं के अलावा राहुल गांधी अब तक एक ही सपोर्टर हासिल कर पाये हैं - डीएमके नेता एमके स्टालिन. अब तक सिर्फ स्टालिन ही खुलेआम राहुल गांधी को प्रधानमंत्री के तौर पर स्वीकार कर पाये हैं. विपक्षी खेमे में एक्टिव चंद्रबाबू नायडू भी राहुल गांधी को प्रधानमंत्री बनने लायक मानते हैं - सीधे सीधे स्टालिन की तरह कभी नहीं कहा कि राहुल गांधी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर देना चाहिये. स्टालिन से पहले तेजस्वी यादव भी राहुल गांधी के साथ लंच करने के कुछ दिन बाद तक उन्हें प्रधानमंत्री का दावेदार मानते रहे, बाद वो भी चुनाव बाद आम राय पर शिफ्ट हो गये. स्टालिन के प्रस्ताव पर विरोध करने वालों में अखिलेश यादव तो आगे ही रहे. अखिलेश यादव, राहुल का विरोध भले ही करें लेकिन मायावती के नाम पर भी वो सस्पेंस अब भी बनाये हुए हैं. जब भी सवाल उठता है बस इतना ही कहते हैं - सबको मालूम है मैं किसे प्रधानमंत्री बनने देखना चाहता हूं. ये सुनते ही मायावती मुस्कुरा उठती हैं और उका काम हो जाता है.

यहां तक कि दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल भी राहुल गांधी के प्रधानमंत्री पद पर दावेदारी को लेकर एक बार नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट दे चुके हैं. अगर एनडीए की जीत के साथ नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री दोबारा बने तो उसके लिए भी केजरीवाल, राहुल गांधी को पहले से ही जिम्मेदार बताने लगे हैं.

एनसीपी चीफ शरद पवार और पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवगौड़ा जैसे नेता पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और बीएसपी प्रमुख मायावती का नाम ही प्रधानमंत्री पद के लिए आगे बढ़ा रहे हैं. ममता बनर्जी ने तो फ्रंटफुट पर खेलना भी शुरू कर दिया है, जबकि मायावती बैकफुट पर रह कर ही तैयारियों में जुटी हैं.

राहुल गांधी को लेकर कांग्रेस का ये फैसला दुरूस्त तो लगता है लेकिन देर से लिया हुआ. एक तरीके से राहुल गांधी ने अच्छा ही किया है जब रेस भी हवा में हो और नतीजे भी हवाई नजर आ रहे हों तो ऐसे में भागते रहने का क्या फायदा? चुनाव तो हर पांच साल बाद होते ही रहते हैं - क्या फर्क पड़ता है.

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