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Updated: 03 मई, 2021 08:08 PM
बिलाल एम जाफ़री
बिलाल एम जाफ़री
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राजनीति अवसरवादिता का खेल है. क्या पीएम मोदी और क्या कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी के अलावा तृणमूल सुप्रीमो ममता बनर्जी. अवसरवादी वही है, जो न केवल मौके पर चौका जड़े. बल्कि दर्शकदीर्घा में बैठे लोगों से पहले ही ताली बजवा दे. पांच राज्यों पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु, पुडुचेरी में चुनाव हो चुके हैं. नतीजे हमारे सामने हैं. पश्चिम बंगाल में जहां ममता तृणमूल का किला बचाने में कामयाब रहीं. तो वहीं केरल की सत्ता लेफ्ट के हाथ आई. इसी तरह भाजपा भी असम बचाने में कामयाब रही. पांच राज्यों में हुए इस चुनाव के सबसे रोचक नतीजे तमिलनाडु से आए जहां एआईडीएमके को पछाड़ते हुए डीएमके ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की है. पांच राज्यों में हुए इस चुनाव में ऐसा बहुत कुछ हो चुका है जो इतिहास में दर्ज होगा. मगर जिस चीज के लिए ये चुनाव याद किया जाएगा वो है कांग्रेस पार्टी. और उसकी वो चालबाजी, जिसमें उसने ये घोषणा की कि कोविड 19 की दूसरी वेव के चलते उसका कोई भी प्रवक्ता चुनाव परिणाम वाले दिन यानी 2 मई 2021 को किसी भी टीवी डिबेट में नहीं जाएगा.

West Bengal Elections, Congress, Rahul Gandhi, Election Campaigning, Coronavirusराहुल गांधी ने जो दांव बंगाल में ममता बनर्जी को फायदा पहुंचाने के लिए खेला उसने राजनीतिक पंडितों तक को हैरत में डाल दिया

कांग्रेस की इस पहल या ये कहें कि इस फैसले के बाद तो जैसे प्रतिक्रियाओं की झड़ी लग गई. पार्टी के समर्थकों के अलावा वो लोग जो कांग्रेस से थोड़ी बहुत भी हमदर्दी रखते थे उन्होंने पार्टी द्वारा लिए गए इस फैसले का स्वागत किया और इसे देशहित में बताया.

पार्टी प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला के ट्वीट को यदि हम नजीर बनाएं तो कई बातें खुद न खुद साफ़ हो जाती हैं. साथ ही इस बात का भी अंदाजा लग जाता है कि भविष्य में कांग्रेस और राहुल गांधी की राजनीति का रुख क्या होगा.

बंगाल में तृणमूल खेला करने में कितनी कामयाब हुई? ये किसी से छिपा नहीं है. मगर कांग्रेस और वर्तमान में पार्टी के सर्वेसर्वा राहुल गांधी ने खेला जरूर कर दिया है. सवाल होगा कैसे? तो बस इतना समझ लीजिए कि राहुल गांधी और कांग्रेस ने केरल औेर असम में तो जमकर प्रचार किया. लेकिन बात जब बंगाल की आई तो राहुल और पार्टी दोनों ने ऐसा यू टर्न लिया कि बड़े बड़े राजनीतिक पंडित विचलित हो गए.

राहुल और कांग्रेस ने बंगाल में प्रचार की जगह पीछे हटने को क्यों वरीयता दी? इसकी भी वजह बहुत दिलचस्प है. बंगाल का जैसा पॉलिटिकल बैक ड्राप रहा है, राहुल और कांग्रेस पार्टी दोनों ही इस बात को बखूबी जानते थे कि बंगाल में उनकी कोई संभावना नहीं थी, और साथ ही कहीं न कहीं वो ममता के पक्ष में अपने वोटरों को एक बड़ा संदेश देना चाहते थे.

कहा तो यहां तक जा रहा है कि राहुल को कोविड के लक्षण नजर आने लगे थे, लेकिन उन्होंने मोदी पर हमला करके खुद को इलाज के क्वारंटाइन कर लिया. अब अपने नेताओं को बहस में न भेजकर भी वो अपनी उसी रणनीति पर काम कर रहे हैं.

राहुल द्वारा ये सब क्यों किया गया? इसकी भी वजह बहुत मजेदार है. राहुल चाहते हैं कि कोरोना का मुद्दा कांग्रेस-बीजेपी के बीच विवाद का विषय न बने. बल्कि बीजेपी बनाम जनता का मुद्दा बने. राहुल को उम्मीद थी कि जनता की नाराजगी का आखिरी फायदा तो उन्हें ही मिलेगा और ये बात बंगाल के मद्देनजर सही भी साबित हुई है.

बंगाल जीतने के लिए बीजेपी ने साम, दाम, दंड, भेद एक किया हुआ था लेकिन जिस तरह ममता बनर्जी बंगाल के दुर्ग में लगे झंडे को बचाने में कामयाब हुईं उसकी एक बहुत बड़ी वजह वो समर्थन है, जो पीएम मोदी को शिकस्त देने के लिए ममता बनर्जी को पर्दे के पीछे से राहुल गांधी और कांग्रेस ने दिया.

ध्यान रहे कोविड की इस दूसरी लहर को लेकर जैसे हालात हैं. भाजपा और पीएम मोदी दोनों आम से लेकर खास तक एक बड़े वर्ग की आलोचनाओं का शिकार हो रहे हैं. कहा तो ये भी जा रहा है कि जितनी ऊर्जा पीएम मोदी ने बंगाल में रैली के लिए लगाई यदि उसकी आधी भी वो कोरोना से लड़ने के लिए लगा देते तो आज स्थिति और होती. न तो लोग ऑक्सीजन और बेड की कमी से मरते. न ही देश में कोविड के इस दौर में जरूरी चीजों की कालाबाजारी होती.

बहरहाल राहुल गांधी का कोविड की इस सेकंड वेव के दौर में, अपने प्रवक्ताओं को परिणाम वाले दिन टीवी डिबेट में न भेजने का फैसला उनके राजनीतिक भविष्य के लिए कितना फायदेमंद होगा इसका फैसला तो वक़्त करेगा. लेकिन जो वर्तमान है साथ ही जैसा रवैया राहुल गांधी का इस वक़्त है वो पूर्व में दूध से जल चुके थे और अभी वो छाछ भी फूंक फूंककर पी रहे हैं.

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लेखक इंडिया टुडे डिजिटल में पत्रकार हैं.

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