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Updated: 01 सितम्बर, 2019 12:00 PM
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दिल्ली बीजेपी अध्यक्ष मनोज तिवारी 'दिल्ली बचाओ परिवर्तन यात्रा' पर निकले हैं. 29 अगस्त से शुरू हुई परिवर्तन के यात्रा के तहत मनोज तिवारी दिल्ली के 14 जिलों की 70 विधानसभा क्षेत्रों के लोगों के बीच पहुंचना चाहते हैं.

मनोज तिवारी का कहना है कि वो दिल्ली की केजरीवाल सरकार को नींद से जगा कर राजधानी में कमल खिलाना चाहते हैं. परिवर्तन यात्रा की शुरुआत मनोज तिवारी ने बीजेपी सांसद हंसराज हंस के साथ की - और आप नेता अरविंद केजरीवाल को कदम कदम पर कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की. दिल्ली बीजेपी अध्यक्ष मनोज तिवारी ने परिवर्तन यात्रा शुरू करते ही दो नारे लगाये हैं जो ऊपरी तौर पर तो आप सरकार के खिलाफ है, लेकिन ध्यान देने पर लगता है - तिवारी के निशाने पर तो साथी नेता ही हैं.

साधो, दिल्ली बीजेपी में झगड़ा भारी!

महाराष्ट्र, झारखंड और हरियाणा में होने जा रहे विधानसभा चुनावों के लिए तो बीजेपी ने पूरी तैयारी कर ली है, लेकिन केंद्र की सत्ता पर लगातार दूसरी बार काबिज होने के बावजूद अब भी 'दिल्ली दूर है'. दिल्ली से ही सांसद और राजधानी में कमान संभाल रहे मनोज तिवारी दिल्ली बचाओ परिवर्तन यात्रा के जरिये लोगों के करीब पहुंच कर ये दूरी खत्म करना चाहते हैं. मुश्किल ये है कि लोगों के करीब पहुंचने में उनके करीबी राजनीतिक साथी ही रोड़ा बन रहे हैं.

बाकी तीनों राज्यों में तो बीजेपी को अपने ही मुख्यमंत्रियों के खिलाफ सत्ता विरोधी फैक्टर से मुकाबला करना है, जबकि दिल्ली में मनोज तिवारी को मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के खिलाफ सत्ता विरोधी तगड़ी लहर पैदा करनी है. मनोज तिवारी के सामने चुनौती ये है कि पहली लड़ाई तो उन्हें दिल्ली बीजेपी के नेताओं से ही लड़नी है, आप सरकार और नेताओं का नंबर तो बहुत बाद में आता है.

ऐसा भी नहीं कि बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह, दिल्ली में चल क्या रहा है, से वाकिफ नहीं हैं. वैसे भी दिल्ली बीजेपी में अंदरूनी कलह कोई नयी बात तो है नहीं - विजय गोयल के साथ मनोज तिवारी की खटपट तो उसी दिन शुरू हो गयी थी जब सूबे में पार्टी की उन्हें कमान सौंपी गयी. आखिर विजय गोयल खुद को भी तो कुर्सी के दावेदार मान कर चल रहे थे. वैसे विजय गोयल की शिकायत पहले भी कई बार दिल्ली बीजेपी के नेता कर चुके हैं. अभी तो हाल ये है कि सिर्फ विजय गोयल ही नहीं दिल्ली के दूरसे नेता भी मनोज तिवारी की टांग खींचने में लगे रहते हैं.

manoj tiwari in delhi constituencyमनोज तिवारी को अरविंद केजरीवाल से पहले अपनी ही पार्टी के नेताओं से जंग जीतनी है

दक्षिणी दिल्ली से सांसद रमेश बिधूड़ी तो यहां तक आरोप लगा चुके हैं कि 2019 के लोक सभा चुनाव में उन्हें पार्टी का सहयोग पूरी तरह नहीं मिला. रमेश बिधूड़ी दिल्ली की सोशल मीडिया टीम पर भी सवाल उठा चुके हैं.

मनोज तिवारी के खिलाफ लामबंदी की ताजा वजह हरियाणवी डांसर सपना चौधरी को बीजेपी में लाया जाना हो गया है. इस मिशन की पहल भी मनोज तिवारी की रही और अंजाम तक भी खुद ही पहुंचाया है.

ऐसी तमाम राजनीतिक दुश्वारियों से निजात पाने के लिए ही मनोज तिवारी परिवर्तन यात्रा पर निकले हैं. परिवर्तन का नारा तो ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल में लेफ्ट सरकार के खिलाफ दिया था, लेकिन आम चुनाव से बीजेपी ने तृणमूल कांग्रेस सरकार के खिलाफ ही शुरू कर दिया है. वैसे दिल्ली में बंगाल की एक और छाप दिखायी दे रही है. आप नेता संजय सिंह का दावा है कि दिल्ली बीजेपी के मुख्यमंत्री के तीन संभावित चेहरे उनके संपर्क में हैं. संजय सिंह ने सवालिया लहजे में कहा - 'बीजेपी तय कर ले कौन मुख्यमंत्री बनना चाहता है? विजेंदर गुप्ता, विजय गोयल या मनोज तिवारी?

अभी आम चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने भी पश्चिम बंगाल में बड़ी संख्या में टीएमसी विधायकों के बीजेपी नेतृत्व के संपर्क में होने का दावा किया था - कुछ ने तो आगे चल कर भगवा धारण भी कर लिया.

मनोज तिवारी की परिवर्तन यात्रा में भी आम चुनाव के एक विशेष उपाय की झलक मिलती है. बात तब की है जब दिल्ली में कुछ सांसदों के टिकट काटे जाने की जबरदस्त चर्चा रही. उदित राज की तरह सूची में मीनाक्षी लेखी का नाम भी बताया जा रहा था. फिर क्या था मीनाक्षी लेखी ने ब्रह्मास्त्र ही उठा लिया. मीनाक्षी लेखी फटाफट राहुल गांधी के पसंदीदा स्लोगन 'चौकीदार चोर है' खिलाफ सुप्रीम कोर्ट चली गयीं - कांग्रेस नेता के साथ जो 'हुआ तो हुआ' ही, मीनाक्षी लेखी का टिकट पक्का हो गया और अब तो वो संसद भी पहुंच चुकी हैं.

मनोज तिवारी की दिल्ली बचाओ परिवर्तन यात्रा भी मीनाक्षी लेखी के उठाये कदम से प्रेरित लगता है. असल में मनोज तिवारी के खिलाफ लामबंदी कर रहे बीजेपी नेताओं का एक आरोप ये भी रहा कि वो न तो दफ्तर में मिलते हैं - और न ही लोगों के बीच.

दिल्ली में बेसुरा कौन है AAP या BJP नेता?

दिल्ली बचाओ परिवर्तन यात्रा के दौरान मनोज तिवारी प्रमुख रूप से दो नारे लगा रहे हैं और उनमें से एक है - 'बेसुरों को हटाना है, सुर वालों को लाना है!'

दूसरा नारा तो सीधे सीधे अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी की दिल्ली सरकार के खिलाफ और बीजेपी के पक्ष में है - 'देश में मोदी दिल्ली में भाजपा तभी बनेगी बात, दिल्ली चलेगा मोदी के साथ', लेकिन 'बेसुरों...' वाला स्लोगन तो दिल्ली बीजेपी के नेताओं पर ही ज्यादा सूट करता है.

हाल ही में मनोज तिवारी से दिल्ली बीजेपी के नेताओं के अलावा RSS के भी नाराज होने की जोरदार चर्चा रही. नाराजगी की वजह भी सिर्फ एक ही सामने आयी - सपना चौधरी की बीजेपी में एंट्री.

मीडिया रिपोर्ट के जरिये सामने आयी एक नेता की टिप्पणी से आसानी से समझ में आ जाता है कि मनोज तिवारी ने एक स्लोगन अपनी ही पार्टी में विरोधी नेताओं के लिए दिया है.

मनोज तिवारी को लेकर उनके एक विरोधी नेता की टिप्पणी रही - 'आप एक ऑर्केस्ट्रा की तरह एक पार्टी नहीं चला सकते हैं - और न ही आप गाना गाकर चुनाव जीत सकते हैं.'

जाहिर है ये टिप्पणी निजी तौर पर भी मनोज तिवारी को परेशान करने वाली रही. आखिर मनोज तिवारी गाना नहीं गा रहे होते तो क्या बीजेपी से लोक सभा का टिकट मिल पाता - और क्या दिल्ली से दोबारा संसद पहुंच पाते? ये टिप्पणी मनोज तिवारी के साथ साथ दूसरे निशाने पर भी फिट बैठ रही है - सपना चौधरी.

क्या बीजेपी नेताओं को लगता है कि मनोज तिवारी दिल्ली की राजनीति में ऑर्केस्ट्रा चला रहे हैं? अगर ऐसा वे मान कर भी चलते हैं तो इसमें ऐसा क्या है जो बीजेपी के सिद्धांतों से मेल नहीं खाता? ये ठीक है कि दिनेश लाल यादव निरहुआ चुनाव हार गया, लेकिन उसके लिए तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी आजमगढ़ जाकर रैली की थी.

हकीकत तो यही है कि मनोज तिवारी भोजपुरी के स्टार सिंगर होने और पूर्वांचल के लोगों की दिल्ली में अच्छी खासी आबादी होने के कारण बने हुए हैं. अगर बीजेपी में मनोज तिवारी के विरोधी नेता सिर्फ इस आधार पर उन्हें किनारे करने की कोई मुहिम चला रहे हैं तो कोई दो राय नहीं कि मुंह की खानी ही पड़ेगी.

अब ये बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह के लिए चुनौती है कि कैसे दिल्ली का झगड़ा खत्म करें. बीजेपी नेतृत्व को ये तो नहीं ही भूला होगा कि 2015 का चुनाव पार्टी में आपसी झगड़े के चलते ही हार का मुंह देखना पड़ा था. 2013 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी थी, लेकिन जोड़तोड़ करके सरकार न बनाने का फैसला किया. वो चुनाव बीजेपी ने मौजूदा केंद्रीय मंत्री डॉ. हर्षवर्धन के नेतृत्व में लड़ा था, लेकिन 2014 के आम चुनाव के बाद जब विधानसभा चुनाव हुए तो हर्षवर्धन कब हाशिये पर पहुंचा दिये गये पता भी नहीं चला. तब दिल्ली बीजेपी के अध्यक्ष सतीश उपाध्याय हुआ करते रहे - और चर्चा तो यहां तक रही कि बीजेपी नेतृत्व ने उन्हें विधानसभा के टिकट के लायक तक न समझा. तभी हर्षवर्धन के बारे में चर्चा रही कि वो अपने बेटे के लिए अपने इलाके से टिकट चाहते थे - लेकिन अचानक किरण बेदी की पैराशूट एंट्री हो गयी. फिर जो हुआ उसे भी पांच साल बीतने ही वाले हैं.

अगर बीजेपी वाकई दिल्ली को लेकर गंभीर है तो परिवर्तन की किसी उम्मीद से पहले नेताओं के आपसी झगड़े खत्म करने का कोई रास्ता निकालना होगा. वरना, लोक सभा की सातों सीटें जीतने के बाद भी दिल्ली में कमल खिले ही जरूरी नहीं है - 2014 के नतीजे सबसे बड़े सबूत हैं.

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