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Updated: 09 मार्च, 2019 06:31 PM
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बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह बार बार दोहरा रहे हैं कि यूपी में पार्टी की सीटें 74 भले हो जाएं, लेकिन 72 तो हरगिज नहीं होने वाली. 2014 में ये संख्या 73 रही. बाकी सीटों की जंग तो अपनी जगह है लेकिन यूपी की सात सीटों पर बीजेपी नेतृत्व की नजर सबसे ज्यादा लगी हुई है.

यूपी की ये सात सीटें वो हैं जिन्हें बीजेपी खानदानी सीटें बताती है. इनमें दो सीटें कांग्रेस के पास हैं और पांच समाजवादी पार्टी के पास. समाजवादी पार्टी के पास कहने से बेहतर होगा ये कहना कि मुलायम सिंह यादव के परिवार के पास.

सात में चार सीटों पर विपक्षी उम्मीदवारों की घोषणा हो चुकी है जिनमें तीन बड़े नाम शामिल हैं - सोनिया गांधी, राहुल गांधी और मुलायम सिंह यादव. चौथी सीट बदायूं की है जिस पर फिलहाल समाजवादी पार्टी का कब्जा है. यही वो सीट है जिस पर कांग्रेस ने भी अपने उम्मीदवार की घोषणा कर दी है.

बीजेपी इन सातों सीटों की तैयारी में काफी दिनों से लगी हुई है - लेकिन यूपी में सपा बसपा गठबंधन और संभावित आपसी समझ को देखते हुए लग रहा है कहीं बीजेपी के ख्वाब अधूरे न रह जाएं.

सोनिया गांधी संभालेंगी मोर्चा

कांग्रेस नेता सोनिया गांधी के चुनाव लड़ने पर काफी असमंजस था. डिंपल यादव के चुनाव नहीं लड़ने की तो अखिलेश यादव ने घोषणा ही कर डाली थी. अब वो बीते दिनों की बातें हो चुकी हैं. अब ये औपचारिक स्थिति है कि सोनिया गांधी रायबरेली से और डिंपल यादव कन्नौज से ही चुनाव लड़ेंगी. कांग्रेस ने लोक सभा चुनाव के लिए उत्तर प्रदेश में 11 उम्मीदवारों की पहली सूची जारी की है, जबकि समाजवादी पार्टी ने नौ उम्मीदवारों के नाम का ऐलान किया है. ये दोनों नाम भी उनमें शामिल हैं.

सोनिया गांधी के सक्रिय राजनीति से दूरी बनाने और खराब सेहत की वजहों से उनके चुनाव लड़ने को लेकर तरह तरह की अटकलें लगायी जाती रहीं. जब प्रियंका गांधी वाड्रा को कांग्रेस का महासचिव बनाया गया तो एक बार रायबरेली से उनके नाम पर भी थोड़ी चर्चा हो गयी. इसका एक कारण प्रियंका वाड्रा का रायबरेली से लगातार जुड़े रहना भी है. जब सोनिया गांधी ने कहा था कि राहुल गांधी उनके भी नेता हैं तभी चुनाव लड़ने को लेकर उनका कहना था कि पार्टी जहां से चाहे.

अब जबकि सोनिया गांधी चुनाव लड़ने वाली हैं तो जाहिर है चुनाव प्रचार भी करेंगी. कांग्रेस का नेतृत्व तो राहुल गांधी कर ही रहे हैं, इसलिए सोनिया गांधी विपक्षी दलों को साथ रखने या गठबंधन की अगुवाई कर सकती हैं. इंडिया टुडे कॉन्क्लेव में बीजेपी की सत्ता में वापसी को लेकर पूछ गये एक सवाल के जवाब में सोनिया गांधी ने कहा था - 'उन्हें जीत कर लौटने नहीं देंगे.' लगता है सोनिया गांधी उसी इरादे के साथ तैयारियों में जुट गयी हैं. प्रियंका वाड्रा भी अब राहुल गांधी की मदद में मैदान में कूद पड़ी हैं.

हैरान करने वाली उम्मीदवारी डिंपल यादव की लग रही है. 2017 के यूपी विधानसभा चुनावों के बाद अखिलेश यादव ने साफ तौर पर कहा था कि डिंपल यादव लोक सभा चुनाव नहीं लड़ेंगी. बाद डिंपल यादव की सीट पर अखिलेश यादव ने खुद ही चुनाव लड़ने की बात कही थी - लेकिन अचानक समाजवादी पार्टी की लिस्ट में डिंपल का नाम आने के बाद से बदली हुई रणनीतियों के संकेत मिल रहे हैं.

narendra modiअमेठी से पहले मोदी ने रायबरेली के लोगों को समझाया कि कैसे कांग्रेस ने उनके लिए कुछ नहीं किया

अब सवाल ये है कि बीजेपी के लिए ये कितनी बड़ी चुनौती होगी? रायबरेली को लेकर बीजेपी में जो भी तैयारी चल रही हो, अमेठी को लेकर स्मृति ईरानी हद से ज्यादा सक्रिय हैं. हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अमेठी का दौरा किया था और अमित शाह तो कई बार हो आये हैं. रायबरेली में भी बीजेपी ने कांग्रेस के एक बड़े स्थानीय नेता को भगवा पहनाया है - लेकिन उम्मीदवार को लेकर अभी तस्वीर साफ नहीं है.

सपा बसपा गठबंधन ने रायबरेली और अमेठी की सीटें कांग्रेस के लिए छोड़ दी है. अब ऐसा तो होगा नहीं कि गठबंधन अपने वोट बैंक को मनमर्जी से वोट देने के लिए छोड़ देगा. मान कर चलना चाहिये कि अखिलेश यादव और मायावती अपने अपने वोटर से बीजेपी के खिलाफ ही वोट करने को कहेंगे.

जब सोनिया के खिलाफ गठबंधन कोई उम्मीदवार नहीं उतार रहा है तो क्या संभव है कि कांग्रेस ऐसा करेगी? डिंपल यादव के लिए कन्नौज में भी यही देखने को मिल सकता है. ये सही है कि कांग्रेस के ही राज बब्बर ने 2009 में फिरोजाबाद सीट पर डिंपल यादव को पहले ही चुनाव में हरा दिया था - लेकिन वही डिंपल कालांतर में कन्नौज से निर्विरोध निर्वाचित हुईं. अब अगर कांग्रेस उम्मीदवार नहीं उतारती तो गठबंधन के साथ साथ कांग्रेस का वोट बैंक भी डिंपल यादव के ही सपोर्ट में खड़ा होगा. ऊपर से बीएसपी के वोटों के ट्रांसफर होने की गारंटी तो है ही.

सोनिया गांधी और डिंपल यादव की बात और है, लेकिन ये फॉर्मूला बाकी सीटों पर लागू नहीं होने जा रहा है. इस बात के भी संकेत दोनों दलों की सूची से ही साफ हो चुका है. बदायूं से समाजवादी पार्टी ने मौजूदा सांसद धर्मेंद्र यादव को उम्मीदवार बनाया है तो कांग्रेस ने वरिष्ठ नेता सलीम इकबाल शेरवानी को टिकट दिया है. धर्मेंद्र यादव अखिलेश यादव के चचेरे भाई हैं. सलीम शेरवानी बदायूं से पांच बार सांसद रह चुके हैं.

amit shahलोगों पर डोरा डाल अमेठी में डेरा जमाने की कोशिश

ऐसे में बीजेपी को बदायूं सीट पर विपक्ष के बीच आपसी टकराव का फायदा मिल सकता है, लेकिन अब अमेठी, रायबरेली, मैनपुरी और कन्नौज में बहुत मुश्किल होगा.

मुलायम ने मैनपुरी के लिए आजमगढ़ क्यों छोड़ा?

2014 में मुलायम सिंह यादव दो सीटों से चुनाव लड़े थे - आजमगढ़ और मैनपुरी. बाद में मुलायम सिंह ने मैनपुरी सीट से इस्तीफा दे दिया और वहां से तेज प्रताप सांसद चुन लिये गये.

मुलायम सिंह ने आजमगढ़ सीट अपने पास रखी जरूर लेकिन आना जाना न के बराबर रहा. यूपी विधानसभा चुनावों से पहले सिर्फ दो बार वो अपने इलाके में गये वो भी तत्कालीन मुख्यमंत्री और बेटे अखिलेश यादव के साथ. विधानसभा चुनाव के दौरान मुलायम सिंह के प्रचार आजमगढ़ से शुरू करने की संभावना रही, लेकिन पारिवारिक झगड़े के कारण शायद टल गया. उसके बाद से तो मुलायम सिंह के आजमगढ़ से चुनाव क्षेत्र बदलने की चर्चा ही शुरू हो गयी थी.

वैसे भी 2014 में मैनपुरी के मुकाबले मुलायम सिंह के अपने निकटतम प्रतिद्वंद्वी से जीत का अंतर बहुत कम रहा. मुलायम सिंह ने तो कहा भी था कि परिवार के लोग नहीं लगते तो मालूम नहीं क्या होता - क्योंकि पार्टी ने तो हरा ही दिया होता. आजमगढ़ में मुलायम सिंह की जीत का अंतर सिर्फ 63,204 रहा जबकि मैनपुरी में ये 3,64,66 रहा. यहां तक कि मुलायम सिंह के नाम पर तेज प्रताप भी मैनपुरी से तीन लाख से ज्यादा वोटों के अंतर से उपचुनाव जीते थे.

अब पहला सवाल तो ये है कि मुलायम सिंह के मैनपुरी से लड़ने की सूरत में तेज प्रताप को पार्टी कहां से टिकट देगी? या उन्हें अच्छे दिनों का इंतजार करना होगा?

आजमगढ़ में जब मुलायम सिंह का बुरा हाल रहा तो तेज प्रताप को समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार बनाने का कोई मतलब नहीं लगता - तो क्या अखिलेश यादव खुद आजमगढ़ का रूख कर सकते हैं?

अखिलेश और प्रियंका के लिए क्या है?

सोनिया गांधी के रायबरेली और डिंपल यादव के कन्नौज से चुनाव लड़ने की बात पक्की होने के बाद सवाल है कि अब अखिलेश यादव और प्रियंका गांधी वाड्रा के सामने क्या विकल्प होंगे? प्रियंका गांधी को जिस तरह 2022 के हिसाब से प्रोजेक्ट किया जा रहा है, उससे उनके लोक सभा चुनाव लड़ने की संभावना तो कम लगती है, लेकिन अखिलेश यादव क्या करने वाले हैं देखना होगा.

प्रियंका गांधी वाड्रा को लेकर एक खबर आयी है कि जब से उनकी औपचारिक एंट्री हुई है - कांग्रेस के देश भर में 10 लाख बूथ कार्यकर्ता बने हैं. इनमें यूपी में ऐसे कार्यकर्ताओं की तादाद में दो गुणा से भी ज्यादा बढ़ोतरी हुई है. यूपी में पहले ये संख्या 1.5 लाख थी जिसमें दो गुना से भी ज्यादा इजाफा हुआ है - 3.5 लाख.

जहां तक अखिलेश यादव का सवाल है कयास लगाये जा रहे हैं कि पूर्वी यूपी में जनाधार बढ़ाने के लिए वो खुद आजमगढ़ का रूख कर सकते हैं. आजमगढ़ में यादव, मुस्लिम और दलित वोट बैंक निर्णायक साबित होते हैं. आजमगढ़ से अखिलेश के मैदान में उतरने से आस पास की लोक सभा सीटों पर समाजवादी पार्टी को फायदा मिल सकता है. अखिलेश यादव के लिए एक और विकल्प माना जा रहा है - संभल लोक सभा सीट. संभल मुलायम सिंह यादव की पुरानी सीट रही है. संभल से दो बार खुद मुलायम सिंह और एक बार उनके भाई रामगोपाल यादव भी सांसद रह चुके हैं.

जिस तरह दिल्ली में कांग्रेस और आप के बीच गठबंधन पर 'कभी हां तो कभी ना' वाली स्थिति बनी हुई है, यूपी में भी तकरीबन वही हाल है. एक चर्चा शुरू हुई थी कि गठबंधन में से नौ सीटें कांग्रेस को ऑफर हुआ है, लेकिन कांग्रेस को भला ये कैसे मंजूर होता. अखिलेश यादव भले ही घूम घूम कर कह रहे हैं कि गठबंधन और कांग्रेस मिलकर बीजेपी के खिलाफ चुनाव लड़ने जा रहे हैं, तो राहुल गांधी भी तो गठबंधन नेताओं को सम्मान देते आ रहे हैं - लेकिन गठबंधन साथ होने या सम्मान देने से नहीं, वो तो सीटों से तय होता है.

इस बीच एक और खबर है कि कांग्रेस महाराष्ट्र में गठबंधन को तीन सीटें दिला सकती है. इनमें दो बीएसपी और एक समाजवादी पार्टी को. इसके लिए कांग्रेस और उसकी गठबंधन पार्टनर एनसीपी दोनों को अपने हिस्से की सीटें छोड़नी होंगी. परदे के पीछे ऐसी ही कवायद उन राज्यों को लेकर भी जारी है जहां अखिलेश यादव और मायावती अपने अपने दलों की संभावनाएं देख रहे हैं.

बात पते की ये बतायी जा रही है कि बदायूं सीट पर कांग्रेस ने दबाव बनाने के लिए ही उम्मीदवार की घोषणा कर डाली है. अब तक दोनों में से कोई पक्ष पीछे हटने को राजी नहीं है.

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