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Updated: 18 फरवरी, 2021 09:15 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
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बिप्लब देब (Biplab Deb) को भी लगता है बीजेपी नेता राहुल गांधी (Rahul Gandhi) जैसा ही समझते हैं, लेकिन ये कभी नहीं बताया गया कि त्रिपुरा के मुख्यमंत्री के बारे में वे क्या राय रखते हैं? मछुआरों को लेकर राहुल गांधी के ताजा बयान पर केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह का रिएक्शन तो आ गया है, लेकिन बिप्लब देब को लेकर किसी ने खुल कर कोई प्रतिक्रिया नहीं जतायी है.

त्रिपुरा सेंट्रल यूनिवर्सिटी के कार्यक्रम में मुख्यमंत्री बिप्लब देब ने जिस तरीके से हार्वर्ड और कैम्ब्रिज विश्वविद्यालयों की मिसाल दी है, वो बीजेपी के देश से बाहर सत्ता हासिल करने के दावों से तो कम ही विवाद पैदा करने वाला है - और हर कोई उसे भी वैसे ही ले रहा है जैसे उनके महाभारत काल में इंटरनेट के दावों को लेकर सोच और समझ रहा था.

मानते हैं कि लोकतंत्र में जनता का सर्टिफिकेट सबसे महत्वपूर्ण होता है और उसके आगे किसी एकेडमिक डिग्री या डिप्लोमा की भी कोई अहमियत या अनिवार्यता नहीं होती, लेकिन गवर्नेंस का क्या? गवर्नेंस के लिए भी क्या राजनीति (Politics) में सामान्य ज्ञान की भी जरूरत नहीं होती?

टीवी गेम शो केबीसी के एक सीजन की टैगलाइन थी - 'आपका ज्ञान ही आपको आपका हक दिलाता है.'

आखिर ये लाइन किस किस पर लागू होती है? क्या ये सिर्फ आम लोगों के लिए है - राजनीति में मामूली ज्ञान की भी कोई जरूरत महसूस नहीं की जाती? या ये सिर्फ इस बात पर निर्भर करती है कि कौन सत्ता और विपक्ष की राजनीति के किस छोर पर खड़ा है?

आखिर क्यों राहुल गांधी के पास अपना हक हासिल करने के लिए ज्ञान अनिवार्य शर्त है - और बिप्लब देब के लिए बिलकुल भी नहीं!

राहुल गांधी को गिरिराज सिंह नसीहत दे रहे हैं कि मोदी सरकार ने क्या क्या किया है उनको मालूम होना चाहिये, लेकिन बिप्लब देब को कोई क्यों नहीं समझा रहा है - क्या ऐसा सिर्फ इसलिए है कि बिप्लब देब को बीजेपी में भी मुख्यमंत्री से ऊपर नहीं देखा जा रहा है और राहुल गांधी प्रधानमंत्री पद के दावेदार हैं?

अव्वल तो राहुल गांधी कांग्रेस पार्टी के एक सांसद हैं, जबकि बिप्लब देब त्रिपुरा जैसे एक राज्य के मुख्यमंत्री - लेकिन बिप्लब देब को क्यों संदेह का लाभ मिल सकता है - और राहुल गांधी को नहीं?

किसे कितना और क्या क्या मालूम होना चाहिये

देखा जाये तो राहुल गांधी से हुई तथ्यात्मक त्रुटि गवर्नेंस से जुड़ी हुई है, जबकि बिप्लब देब की गलती महज सामान्य ज्ञान का मामला है. राजनीति में अकादमिक डिग्री न होने पर भी गवर्नेंस की जानकारी निश्चित तौर पर होनी चाहिये, लेकिन सामान्य ज्ञान के बगैर भी काम चल सकता है. ये कोई आदर्श स्थिति तो नहीं है लेकिन ये व्यावहारिक परिस्थितियों से उपजी समझ हो सकती है.

अव्वल तो बिप्लब देब ने जिस तरह की बातें की हैं, वैसा बोलने पर उनको त्रिपुरा सेंट्रल यूनिवर्सिटी में न तो एक छात्र के रूप में दाखिला मिलता और न ही वहां की कोई नौकरी, लेकिन जनता के चुने हुए प्रतिनिधि और राज्य का मुख्यमंत्री होने के नाते वो ऐसे सभी अवसरों पर मुख्य अतिथि ही होते होंगे - और वहां उपस्थित लोगों को संबोधित भी करना होगा.

त्रिपुरा सेंट्रल यूनिवर्सिटी में आयोजित एक कार्यक्रम में बिप्लब देब ने कहा, 'एक शहर या जगह अपने विश्वविद्यालय के चलते मशहूर हो सकता है... जब हम इंग्लैंड या लंदन के बारे में सोचते हैं, तो कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी और हार्वर्ड यूनिवर्सिटी की तस्वीरें हमारे दिमाग में आती हैं.'

ऐसा लगता है बिप्लब देब मान कर चल रहे होंगे कि ये दोनों ही संस्थान ब्रिटेन में ही होंगे, जबकि हार्वर्ड यूनिवर्सिटी अमेरिका में उच्च शिक्षा का सबसे पुराना संस्थान है और कैम्ब्रिज ब्रिटेन में है.

biplab deb, rahul gandhiक्या बिप्लब देब और राहुल गांधी के प्रति बीजेपी के नजरिये में फर्क है?

राहुल गांधी हाल फिलहाल जहां भी जाते हैं किसान आंदोलन का जिक्र जरूर करते हैं. अपने पुडुचेरी दौरे में राहुल गांधी ने मछुआरों का जिक्र करते हुए कहा, 'सरकार ने देश की रीढ़ माने जाने वाले किसानों के खिलाफ तीन कानून पास किये हैं... आपको हैरानी होगी कि मैं मछुआरों के बीच किसानों की बात क्‍यों कर रहा हूं - क्‍यों‍कि मैं आपको समुद्र का किसान मानता हूं.'

ये समझाते हुए राहुल गांधी ये भी बोल गये कि अगर 'जमीन के किसानों' के लिए मंत्रालय हो सकता है तो 'समुद्र का किसानों' के लिए क्‍यों नहीं हो सकता? ये सुनते ही बीजेपी नेता गिरिराज सिंह भड़क गये क्यों मोदी सरकार में पहले से ही ऐसा मंत्रालय है और वो उसी विभाग के मंत्री हैं. गिरिराज सिंह का कहना है कि राहुल गांधी इटली से बाहर निकल नहीं पाते क्योंकि उनके दिमाग में सिर्फ इटली रहता है.

खेती बारी से जुड़ी तमाम नसीहतें देने के साथ ही गिरिराज सिंह ने ट्विटर पर लिखा- 'राहुल जी ! आपको इतना तो पता ही होना चाहिए कि 31 मई, 2019 को ही मोदी जी ने नया मंत्रालय बना दिया और 20050 करोड़ रुपये की महायोजना शुरू की जो आजादी से लेकर 2014 के केन्द्र सरकार के खर्च (3682 करोड़) से कई गुना ज्यादा है.'

'पप्पू' किसे समझा जाये और क्यों?

केंद्र में एनडीए की पिछली सरकार में विपक्ष की तरफ से अविश्वास प्रस्ताव लाया गया था - और उस दौरान राहुल गांधी ने कहा था कि आप लोग मुझे 'पप्पू' समझते हैं तो समझिये, मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता. राहुल गांधी ने ये भी कहा कि वो नफरत का जवाब प्रेम से देंगे और दिया भी - प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से गले मिलने के बाद आंख मार कर.

राहुल गांधी के ऐसे ही कुछ एक्ट उनकी नॉन-सीरियस छवि गढ़ने में मददगार साबित होते हैं. राहुल गांधी मालूम नहीं क्यों ये समझ नहीं पाते कि ये सब ऐसी गलतियां है जिनके जरिये उनकी गंभीर बातों को भी हवा में उड़ा दिया जाता है. अक्सर वो ऐसे कई काम भी कर बैठते हैं और खुद ही विरोधियों के निशाने पर आ जाते हैं.

कोरोना वायरस को लेकर राहुल गांधी ने निश्चित तौर पर सबसे पहले अलर्ट किया था, लेकिन बाद में जिस तरीके से वो देश के ज्वलंत मसलों को एक्सपर्ट के जरिये सार्वजनिक तौर समझने और उसके वीडियो पोस्ट करने लगे, मैसेज गलत जाने लगा. ऐसा लग रहा था जैसे राहुल गांधी के पास अपनी कोई सोच नहीं है और वो एक्सपर्ट से मुद्दों की बारीकियों को समझने की कोशिश कर रहे हैं.

पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की भी राहुल गांधी को लेकर कुछ ऐसी ही टिप्पणी रही. बराक ओबामा ने अपनी किताब में लिखा है, 'राहुल गांधी नर्वस लगते हैं, एक ऐसे छात्र की तरह जिसने अपना कोर्स तो पूरा कर लिया है और उसमें अपने टीचर को प्रभावित करने की आतुरता भी है - लेकिन योग्यता और विषय में महारत हासिल करने का गहरा जुनून नहीं है.'

हो सकता है मुलाकात हुई होती तो बराक ओबामा त्रिपुरा के मुख्यमंत्री बिप्लब देब के बारे में भी अपनी कोई राय दिये होते. और कुछ नहीं तो बिप्लब देब के आत्मविश्वास के तो वो कायल होते ही. जिस कॉन्फिडेंस के साथ बिप्लब देब अपनी बातें रखते हैं और बड़े बड़े दावे करते हैं उनका कोई सानी नहीं नजर आता.

हाल ही में बिप्लब कुमार की तरफ से ऐसा दावा किया गया कि हर कोई हैरान रह गया. बिप्लब कुमार ने दावा किया, 'अमित शाह जब बीजेपी अध्यक्ष थे, तब उन्होंने हमें बताया था कि पार्टी अपना दायरा बढ़ाना चाहती है - और नेपाल और श्रीलंका में शासन के लिए योजना बना रही है.'

बिप्लब देब के इस दावे के बाद से नेपाल और श्रीलंका की तरफ से आपत्तियां दर्ज करायी जाने लगी हैं - मीडिया में ऐसी तमाम रिपोर्ट आ चुकी है. बिप्लब देब तो अपने दावे से अमित शाह को भी कठघरे में खड़ा कर दिये हैं, हालांकि, लगता भी नहीं कि अमित शाह जैसे नेता ऐसा सोच सकते हैं या फिर मोटिवेशन के लिए भी पार्टी नेताओं से ऐसी बातें कह सकते हैं - लेकिन क्या वास्तव में ये बिप्लब देब के ही मन की उपज हो सकती है, सवाल तो ये भी उठता है?

लेकिन क्या बिप्लब देब की समझ के इस स्तर के लिए ही उनको संदेह का लाभ दिया जा सकता है - और राहुल गांधी को ये सुविधा नहीं मिल सकती?

9 मार्च 2018 को बिप्लब देब त्रिपुरा के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठे और महीने भर बाद ही एक वर्कशॉप में बोले, 'ये देश वो देश है, जहां महाभारत में संजय ने बैठकर धृतराष्ट्र को युद्ध में क्या हो रहा था... बता रहे थे. इसका मतलब क्या है? उस जमाने में टेक्नोलॉजी थी... इंटरनेट था... सैटेलाइट थी - संजय के आंख से कैसे देख सकता है वो?'

वैसे त्रिपुरा के लोग अपने मुख्यमंत्री के मुंह से ऐसी बातें सुन कर क्या सोचते होंगे?

मुमकिन है वे बिप्लब देब के बारे में कोई राय नहीं बना पाते हों - क्योंकि वोट तो वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर डाले थे. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर ही एक डबल इंजन सरकार की चाहत में बरसों से मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज मानिक सरकार को लोगों ने गद्दी से उतार दिया था.

बिप्लब देब से पहले का भी एक यूनिवर्सिटी का ऐसा ही वाकया है, लेकिन वो देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से जुड़ा है. एक बार यूनिवर्सिटी के एक कार्यक्रम में जवाहरलाल नेहरू का भाषण चल रहा था और उसी दौरान किसी ऐसिहासिक घटना को लेकर उनसे कोई तथ्यात्मक त्रुटि हो गयी. मौके पर मौजूद जाने माने इतिहासकार ईश्वरी प्रसाद सिन्हा ने जैसे ही नेहरू को करेक्ट करने की कोशिश की, तभी फिराक गोरखपुरी ने ये कहते हुए चुप करा दिया, 'बैठ जाओ ईश्वरी... तुम इतिहास को रटते हो - और नेहरू इतिहास को बनाता है.'

अब ये आपको सोचना है कि नेहरू वाली कैटेगरी में किसे रखते हैं, राहुल गांधी को या बिप्लब देब को - और ऐसा करने पर एक को तो आपको संदेह का लाभ देना ही होगा.

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लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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