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Updated: 06 अक्टूबर, 2019 05:53 PM
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देर भी हो और दुरूस्त भी हो, जरूरी नहीं. हरगिज नहीं. अशोक तंवर के कांग्रेस छोड़ने का कदम भी करीब करीब ऐसा ही है. अशोक तंवर के इस्तीफे को देर से लिया फैसला तो कहा जा सकता है, लेकिन दुरूस्त नहीं. अभी तो ऐसा ही लग रहा है - क्योंकि वो कांग्रेस छोड़ चुके हैं और हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर का कहना है कि बीजेपी में उनके जैसे नेताओं के लिए नो-एंट्री का बोर्ड लगा हुआ है.

अशोक तंवर ने जो मुद्दे उठाये हैं इससे हरियाणा कांग्रेस को कोई फर्क नहीं पड़ता, लेकिन कांग्रेस के लिए काफी कुछ सोचने की जरूरत लग रही है. बगावती तेवर के हिसाब से देखें तो उत्तर प्रदेश में अदिति सिंह का केस अलग लगता है, लेकिन हरियाणा में अशोक तंवर और महाराष्ट्र में संजय निरुपम लगभग एक ही तरह की बात कर रहे हैं.

दोनों ही नेताओं की बातों से ऐसा लग रहा है जैसे कांग्रेस में सोनिया गांधी और राहुल गांधी के समर्थक एक दूसरे के खिलाफ आमने सामने की जंग छेड़ चुके हैं - और ये कांग्रेस के लिए सबसे ज्यादा फिक्र वाली बात है.

अशोक तंवर के इस्तीफे से कांग्रेस को कितना फर्क पड़ता है

अच्छा तो ये हुआ होता कि अशोक तंवर भी राहुल गांधी के अध्यक्ष पद छोड़ने के फौरन बाद साथ इस्तीफा दे दिये होते - तब शायद उनकी स्थिति अभी से कहीं ज्यादा बेहतर होती.

हरियाणा में तो वैसे भी भूपिंदर सिंह हुड्डा के आने के बाद अशोक तंवर के कांग्रेस में बने रहने या चले जाने से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला. कांग्रेस में होकर भी वो हुड्डा फेमिली से बदला लेने के अलावा कुछ और तो कर भी नहीं रहे थे. ये बात भी उन्होंने खुद ही बतायी थी कि वो भी वैसा ही व्यवहार करेंगे जैसा पांच साल तक हुड्डा परिवार और उनके आदमी उनके साथ करते आये थे.

ऐसे में तंवर के कांग्रेस छोड़ देने से भी हरियाणा कांग्रेस को कोई फर्क नहीं पड़ने वाला. वो कांग्रेस में रह कर भी पार्टी उम्मीदवारों के लिए वोट तो मांगते नहीं. जब से बागी तेवर अपना लिया था उसके बाद तो सवाल ही नहीं उठता.

ashok tanwar and sanjay nirupam call attention towards congress infightingअशोक तंवर और संजय निरुपम ने कांग्रेस में चल रही सोनिया और राहुल के समर्थकों की लड़ाई को सड़क पर ला दिया है

तंवर ने टिकटों के बंटवारे में जो इल्जाम लगाया था वो भी कोई मामूली बात नहीं थी. अशोक तंवर ने सोहना सीट के लिए पांच करोड़ में टिकट बेचे जाने का आरोप सरेआम लगाया था. अशोक तंवर के इस आरोप के बाद तो वैसे भी उनका कांग्रेस में बने रहना मुश्किल था. मार्गरेट अल्वा का उदाहरण तो यही कहता है कि कांग्रेस नेतृत्व इस बात को बर्दाश्त नहीं करता. संयोग से तब भी कांग्रेस की कमान सोनिया गांधी के हाथों में थी - और अब भी है. जहां तक अशोक तंवर के बीजेपी में जाने का सवाल है, फिलहाल तो वो रास्ता भी बंद नजर आ रहा है. मनोहरलाल खट्टर ने कह दिया है कि उनको बीजेपी में एंट्री नहीं मिलेगी. यहां तक तो ठीक है. मनोहरलाल खट्टर हरियाणा के मुख्यमंत्री हैं और सत्ता में वापसी के मुहाने पर बीजेपी भी खड़ा पा रही होगी - उनकी बात भी मानी जाएगी कोई शक शुबहे वाली बात नहीं है.

हालांकि, मनोहरलाल खट्टर का ये कहना कि अशोक तंवर से बीजेपी की कोई बात ही नहीं हुई है, गले के नीचे नहीं उतरता. अशोक तंवर और बीजेपी में बातचीत के ऐसे कई चैनल हैं जो जरूरी नहीं कि वो मनोहरलाल खट्टर को मालूम हों ही. दिल्ली में बैठे बैठे आलाकमान की हॉटलाइन हमेशा एक्टिव रहती है - और राज्यों के नेताओं को उसकी भनक तक नहीं लगती. कर्नाटक की उठापटक में कहां से कौन खेल चल रहा था बीएस येदियुरप्पा को कितनी खबर हुआ करती रही. खबर होती भी कहां से मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने से पहले तो मुलाकात तक का वक्त नहीं मिल सका.

अशोक तंवर को नो-एंट्री देने को लेकर खट्टर जो दलीलें दे रहे हैं वे तो बीजेपी नेतृत्व के फैसलों के मजाक उड़ाने जैसा ही है. खट्टर के मुताबिक बीजेपी में ऐसे नेताओं को शामिल किया जाता है जिनका ‘अतीत साफ-सुथरा’ हो और उन पर कोई ‘धब्बा’ न हो. गजब बात कर रहे हैं. अगर खट्टर के पैरामीटर से से देखा जाये तो मुकुल रॉय, हिमंता बिस्व सरमा जैसे नेताओं को बीजेपी में कभी लिये जाने का सवाल ही नहीं उठता. ये सवाल उठाने के महीने भर के बाद तो केरल कांग्रेस के नेता टॉम वडक्कन भी भगवा धारण कर चुके थे.

खट्टर को भी ये अधिकार तो है कि वो खुद की और पार्टी की तारीफ कर सकें, लेकिन लोग मान भी लें ये तो कतई जरूरी नहीं है. वैसे भी मनोहरलाल खट्टर हरियाणा में बीजेपी सरकार के मुख्यमंत्री हैं, बीजेपी के आधिकारिक प्रवक्ता नहीं कि मान लिया जाये कि अशोक तंवर की बीजेपी नेताओं से कोई बात नहीं हुई.

अशोक तंवर के बीजेपी से ऑफर की कहानी भी दिग्विजय सिंह से संघ के प्रस्ताव जैसी ही लगती है. जिस तरह से अशोक तंवर ने तीन महीने में बीजेपी से छह बार मिले ऑफर का दावा किया था, दिग्विजय सिंह का भी कहना है कि 1970-71 में कुशाभाऊ ठाकरे और विजयाराजे सिंधिया ने उनसे जनसंघ में शामिल होने के लिए कहा था. बीजेपी उसी जनसंघ का नया वर्जन है और विजयाराजे सिंधिया संस्थापकों में से एक थीं. विजयाराजे सिंधिया कोई और नहीं कांग्रेस नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया की दादी थीं और कुशाभाऊ ठाकरे बीजेपी के अध्यक्ष रह चुके हैं.

ये तो साफ है कि अशोक तंवर के कांग्रेस छोड़ने से हरियाणा कांग्रेस कमेटी की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ने वाला, लेकिन सवाल ये है कि क्या कांग्रेस को राष्ट्रीय स्तर पर भी इस घटना से कोई फर्क नहीं पड़ने वाला? खासकर उन मुद्दों से जिनकी तरफ अशोक तंवर इशारा कर रहे हैं.

क्या कांग्रेस में राहुल और सोनिया समर्थक आमने-सामने लड़ रहे हैं?

ये ठीक है कि भूपिंदर सिंह हुड्डा ने कैप्टन अमरिंदर सिंह की राह पकड़ कर हरियाणा में अपनी मंजिल पा ली है - लेकिन वो न तो पंजाब के मुख्यमंत्री की तरह हैं, न ही हरियाणा के मुख्यमंत्री बन पाने के अभी तक कोई संकेत दे पाये हैं.

भूपिंदर सिंह हुड्डा के पक्ष में अब तक सिर्फ इतनी ही बात हुई है कि वो सोनिया गांधी को अपनी बात समझा कर या पार्टी तोड़ डालने जैसी स्थिति का प्रदर्शन कर अपनी बात मनवा लिये हैं - वरना, पांच साल तक राजनीति के तमाम तिकड़मों के बावजूद अशोक तंवर का बाल भी बांका नहीं कर सके. ऐसा इसलिए नहीं कर सके क्योंकि अशोक तंवर के सिर पर राहुल गांधी का वरद हस्त रखा हुआ था.

कांग्रेस से इस्तीफा देने के बाद अशोक तंवर ने मौजूदा कांग्रेस नेतृत्व पर सवाल उठाया है. सोनिया गांधी फिलहाल कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष हैं जिन्हें राहुल गांधी इस्तीफा देने और उस पर अड़े रहने के बाद आगे आना पड़ा है.

अशोक तंवर का सीधा आरोप है कि कांग्रेस में राहुल गांधी के वफादार नेताओं को पार्टी में किनारे लगाया जा रहा है. अशोक तंवर कहते हैं, 'हमारी ये हालत इसलिए है क्योंकि हमें साइडलाइन कर दिया गया.'

अशोक तंवर की ही तरह मुंबई में कांग्रेस नेता संजय निरुपम भी बगावती रूख अख्तियार किये हुए हैं - लेकिन खास बात ये है कि दोनों ही एक ही तरीके का मुद्दा उठा रहे हैं. दोनों नेताओं की ये बातें महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा के लिए हो रहे चुनावों के बीच महत्वपूर्ण तो हो ही जाती हैं. अशोक तंवर की ही तरह संजय निरुपम का भी आरोप है कि राहुल गांधी से जुड़े लोगों की उपेक्षा की जा रही है. संजय निरुपम, ज्योतिरादित्य सिंधिया का भी नाम लेते हैं, कहते हैं - 'महाराज सिंधिया जैसे लोगों को सिर्फ शांत करने के लिए स्क्रीनिंग कमेटी की जिम्मेदारी दे दी गयी है.' संजय निरुपम को भी उन नेताओं में शुमार किया जाता है जो सोनिया गांधी के आलोचक रहे हैं. वैसे संजय निरुपम राजनीति में शिवसेना के जरिये आये और फिर 2005 में कांग्रेस ज्वाइन कर लिये.

चाहे अशोक तंवर हों या संजय निरुपम दोनों के निशाने पर कांग्रेस के बुजुर्ग नेताओं की टोली है. संजय निरुपम कहते हैं कि पिछले पांच साल में वरिष्ठ नेताओं ने अभियान चलाया कि राहुल गांधी की कोशिशें नाकाम हो जायें. हालांकि, संजय निरुपम अपना स्टैंड साफ करते हुए कहते हैं कि वो सोनिया गांधी के खिलाफ नहीं हैं - बल्कि वो चाहते हैं कि सोनिया गांधी को गुमराह करने वाले ऐसे नेताओं से छुटकारा पाना चाहिये.

क्या अशोक तंवर और संजय निरुपम ने कांग्रेस में छिड़ी उस जंग की ओर ध्यान नहीं दिलाया है - जो बुजुर्ग और युवा कांग्रेसियों के बीच छिड़ी हुई है?

ऐसा क्यों लग रहा है जैसे अशोक तंवर और संजय निरुपम ने राहुल गांधी और सोनिया गांधी के समर्थकों को आमने-सामने ला दिया है. तो क्या कांग्रेस में राहुल बनाम सोनिया जैसी भी कोई जंग चल रही है?

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