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Updated: 31 दिसम्बर, 2020 01:06 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
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ममता बनर्जी (Mamata Banerjee) में कई खासियतें हैं और वे उनको बाकियों से अलग तो करती ही हैं, ताकतवर भी बनाती हैं. अब भी ममता बनर्जी अक्सर पहले लोगों के बीच खड़ी होकर बोलती हैं - और फिर वे बातें ट्विटर पर आती है, जबकि अन्य नेताओं के मामले में ऐसा न होकर इसका उलटा होता है.

ममता बनर्जी के सामने जब भी कोई राजनीतिक मुश्किल आती है, वो सीधे लोगों के बीच पहुंच जाती हैं. सीधा संवाद शुरू होता है और अपने नेता को बरसों से उसी अंदाज में देखते आ रहे लोग नये सिरे से जुड़ाव महसूस करते हैं - ममता बनर्जी को हमेशा ही उनके ऐसे कदमों का फायदा मिलता रहा है, लेकिन मुश्किलें भी ममता बनर्जी के सामने तारक मेहता का उल्टा चश्मा वाले जेठालाल की तरह ही आती हैं. 2021 का पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव तो लगता है ममता बनर्जी के राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी मुश्किल है. अब सबसे बड़ी मुश्किल है तो मुकाबले के लिए ब्रह्मास्त्र तो निकालना ही पड़ेगा.

हवाई चप्पल पहन कर सड़क पर पैदल मार्च करना ममता बनर्जी का ब्रह्मास्त्र है - और आखिरी कामयाबी भी वो इसी रास्ते हासिल करती रही हैं. CAA-NRC के विरोध में भी ममता बनर्जी सड़क पर उतरी थीं और लोगों के हुजूम के साथ मार्च भी निकाला था. कोरोना काल में भी ममता सड़क पर निकली थीं, लेकिन लॉकडाउन और महामारी के चलते पैदल नहीं बल्कि गाड़ी से - और हर थोड़े अंतराल के बाद उनका काफिला रुकता और लोगों को वो लाउडस्पीकर पर संबोधित करतीं - बतातीं कि हालात कितने मुश्किल हैं - और सरकार क्या कर रही है - सारी बातों के बाद बोलतीं कि फिक्र की कोई जरूरत नहीं है क्योंकि वो और उनकी सरकारी टीम हर वक्त मदद के लिए 24x7 तैनात है.

चाहे वो CAA-NRC का विरोध हो या फिर कोरोना काल में लॉकडाउन के नियमों के अनुपालन में खामी का इल्जाम, ममता बनर्जी को केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार के साथ लगातार जूझते रहना पड़ा है. राज्यपाल जगदीप धनखड़ से दो-दो हाथ तो जैसे रोजमर्रा की राजनीति का हिस्सा बन चुका हो. हालांकि, ममता बनर्जी की टीम पर आक्रामक हो चुकी है और तृणमूल कांग्रेस नेताओं की तरफ से राज्यपाल जगदीप धनखड़ को हटाने की मांग होने लगी है.

ममता बनर्जी का ताजा संघर्ष बीजेपी नेता अमित शाह (Amit Shah) के बंगाल में बढ़ते कदमों को रोकने के मकसद से शुरू हुआ है. ममता बनर्जी की बहुत बड़ी ताकत शुभेंदु अधिकारी को एक झटके में बीजेपी ज्वाइन करा कर अमित शाह ने तो तृणमूल कांग्रेस के भीतर कोहराम मचा दिया है. यही वजह है कि ममता बनर्जी अपने तरीके से हर उस जगह पहुंचने लगी हैं जहां जहां अमित शाह का बुलडोजर चल चुका है - ये तो संभव भी नहीं है कि अमित शाह ने जो तहस नहस मचाया है, ममता बनर्जी पूरी तरह डैमेज कंट्रोल कर पायें, लेकिन हाथ से फिसल रही चीजों में से कुछ भी बचा लें तो बड़ी बात ही होगी.

शाह को शिकस्त देने सड़क पर उतरीं ममता बनर्जी

अमित शाह को शिकस्त देने के लिए ममता बनर्जी उनके पदचिह्नों पर चल पड़ी हैं. जिस दिन शुभेंदु अधिकारी और कई तृणमूल नेताओं को अमित शाह ने ज्वाइन कराया बीरभूम जिले के बोलपुर में रोड शो किया था - और कहा था कि वैसा रोड शो उन्होंने जीवन में पहले कभी नहीं देखा था. तब भी जब वो बीजेपी के अध्यक्ष रहते उसे दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी बनाने में लगे हुए थे.

अमित शाह के बोलपुर मार्च के 10 दिन बात ममता बनर्जी भी उन्हीं सड़कों पर पहुंच गयीं और लोगों के बीच जा खड़ी हुईं. लोगों से बात कीं और उसके बाद बीजेपी और अमित शाह को खूब खरी खोटी सुनायीं.

ममता बनर्जी का सीधा इल्जाम रहा - 'पश्चिम बंगाल की संस्कृति को खत्म करने की साजिश रची जा रही है.'

जैसे जैसे शब्द निकल रहे थे उनके मतलब के हिसाब से आवाज भी तेज होती जा रही थी - 'हिंसा और बांटने की राजनीति बंद करो.'

लगे हाथ ममता बनर्जी आगाह भी कर रही थीं - 'विश्व भारती पर की जा रही अपमानजनक टिप्पणी मुझे पसंद नहीं है.'

ममता बनर्जी चलते चलते उस इलाके में भी पहुंच गयीं जहां केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने लंच किया था. अमित शाह के लंच को लेकर एक मीडिया रिपोर्ट की हेडलाइन थी - 'खाये और चल दिये!' बताते हैं कि अमित शाह ने बाउल सिंगर बासुदेव बाउल के घर खाना तो खाया था, लेकिन कोई बातचीत नहीं की. बासुदेव बाउल ने मीडिया से बताया था कि वो बहुत सारी बातें कहना चाहते थे, लेकिन अमित शाह ने उनको मौका नहीं दिया.

ये तो ऐसा लगता है जैसे बाउल सिंगर ने अमित शाह से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तरह संवाद की उम्मीद की थी. अब हर कोई एक जैसा तो हो नहीं सकता. निश्चित तौर पर अगर प्रधानमंत्री मोदी ने लंच किया होता तो किसी को भी ऐसी शिकायत नहीं होती. असल में मोदी का अनुभव संसार भी ऐसा है कि बातें भी होती हैं शेयर करने के लिए. चाहे वो पंचायतों के सरपंचों से मुखातिब हों या फिर पार्लियामेंट के सांसदों से. हो सकता है प्रधानमंत्री मोदी पूछ भी लेते कि खाना कैसे बनाया. पहले पैन में तड़का देकर बनाया या सब बना कर आखिर में तड़का लगाया. ये भी संभव था मोदी से बाउल गायक को बहुत सारे टिप्स भी मिले होते, लेकिन अफसोस ऐसा नहीं हुआ.

ममता बनर्जी तो पूरी तैयारी के साथ इलाके में निकली थीं. ममता के पहुंचते ही बाउल गायक बासुदेब बाउल (Basudeb Das Baul) उनके मंच पर पहुंच गये - और बिलकुल वही गीत गाया जो जो अमित शाह को सुनाया था - 'तोमे ह्रदय माझरे राखबो, छेरे देबो ना'.

मतलब ये है कि 'मैं आपको हमेशा अपने दिल में रखूंगा, कभी नहीं छोड़ूगा.'

महज 10 दिन के भीतर ये हुआ ये बदलाव हृदय परिवर्तन है या 'पोरिबर्तन' की सियासत का कोई नया स्वरूप?

अमित शाह ने तो सिर्फ लंच किया था, ममता बनर्जी तो पहुंच कर खाना ही बनाने लगीं. अब ये तो संभव भी नहीं है, अमित शाह और ममता बनर्जी दोनों एक दूसरे की तरह रोड शो करने लगें.

mamata banerjeeआम चुनाव में ममता बनर्जी के चाय बनाने का अनुभव तो अच्छा नहीं रहा, शायद इसीलिए तृणमूल कांग्रेस नेता ने चाय की जगह सब्जी पकाया है!

इलाके में घूमते घूमते ममता बनर्जी आदिवासियों के पास पहुंच गयीं और बातों बातों में ही उनके लिए खाना भी पकाने लगीं. 2019 के आम चुनाव के दौरान भी ममता बनर्जी सरेराह चलते चलते दीघा में अचानक एक जगह रुकीं - और चाय की दुकान पर पहुंच कर चाय बनाने लगी थीं.

...और अब एक्सपायरी डेट सीएम!

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दाढ़ी को पश्चिम बंगाल के चुनावी मौसम को देखते हुए रविंद्र नाथ टैगोर से जोड़ कर देखा जाने लगा है. काफी दिनों से लोग सोशल मीडिया पर अपने अपने तरीके से रिएक्ट भी कर रहे हैं. टैगोर को लेकर बीजेपी नेता सुब्रह्मण्यन स्वामी की एक पहल ने भी ममता बनर्जी को गुस्सा दिला दिया है. स्वामी ने प्रधानमंत्री मोदी को पत्र लिख कर राष्ट्रगान में बदलाव का सुझाव दिया है. राष्ट्रगान, दरअसल, टैगोर की ही रचना है.

अमित शाह काफी दिनों से पश्चिम बंगाल के लोगों से सोनार बांग्ला बनाने की बात कर रहे हैं. वैसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी राजा राम मोहन रॉय के बहाने कह ही चुके हैं कि जिन बदलावों के सपने उन्होंने देखे थे वे अभी तक पूरे नहीं हो सके हैं. प्रधानमंत्री मोदी ने ये बात भी उसी दिन कही जब वो अम्फान तूफान से हुए नुकसानों का जायजा लेने कोलकाता और ओडिशा के दौरे पर निकले थे.

मोदी और शाह दोनों ही से बुरी तरह खफा ममता बनर्जी कहती हैं, 'वे न तो टैगोर को जानते हैं और न ही नेताजी को… वे यहां नफरत की राजनीति के साथ आए हैं.'

बीजेपी के ताप से अपनी राजनीति को झुलसने से बचाने के लिए तृणमूल कांग्रेस की तरफ से बंग ध्वनि कार्यक्रम चलाया जा रहा है. कार्यक्रम के तहत बताया जा रहा है कि ममता बनर्जी सरकार ने पश्चिम बंगाल के लोगों के लिए क्या क्या किया है. साथ ही, ममता बनर्जी की कोशिश है कि अपने हाव भाव से लेकर बातों से लोगों के मन में बैठा दें कि बीजेपी तो बाहरी लोगों की पार्टी है. समझाइश होती है, बीजेपी को न तो बंगाल की राजनीति की समझ है, न संस्कृति की.

ममता बनर्जी कहती हैं, 'बीजेपी को बंगाल की जानकारी नहीं है... बीजेपी कहती है कि टैगोर का जन्म विश्व भारती में हुआ था लेकिन सच तो ये है कि टैगोर कोलकाता में पैदा हुए थे.'

अमित शाह ने बाकी बातों के बीच रोड शो के दौरान एक और दावा किया था - 'बंगाल की राजनीति में दीदी का टाइम ओवर हो चुका है.'

याद रहे, 2019 के आम चुनाव के दौरान ममता बनर्जी भी ऐसे ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के लिए कई मौकों पर 'एक्सपाइरी डेट पीएम' कहती रहीं.

अमित शाह की बातों के जवाब में ममता बनर्जी का कहना है, 'खेल इतना आसान नहीं है… पहले आप 30 सीटें तो लेकर आइये - उसके बाद 294 सीटों की बात करना.”

वैसे ममता बनर्जी की चुनावी मुहिम को सुपरवाइज कर रहे, प्रशांत किशोर ने दावा किया था कि बीजेपी को बंगाल में दहाई के आंकड़े तक पहुंचने के लिए संघर्ष करना पड़ेगा. बाद में प्रशांत किशोर ने यहां तक बोल दिया था कि अगर बीजेपी को 100 सीटें मिल गयीं तो वो ये काम छोड़ देंगे. अब ममता बनर्जी कह रही हैं 30 सीटें लाकर बीजेपी दिखाये - अच्छा तो ये होता कि ममता बनर्जी और प्रशांत किशोर ठंडे दिमाग के साथ बैठ कर तय कर लेते कि बीजेपी की कितनी सीटें मान कर चलना है. कई बात ऐसे में धोखा भी हो जाता है.

ममता बनर्जी मौका देख कर एक्ट भी करती हैं और बात भी, शायद इसीलिए क्योंकि वो लोगों की नब्ज पहचानती हैं. ममता बनर्जी लोगों का मूड भांप कर कहती हैं, 'राष्ट्रगान को छूकर तो देखो फिर देखो क्या होता है?' - ये सुनते ही भीड़ जिंदाबाद भाव में शोर के साथ सपोर्ट करती है और ममता बनर्जी को लगता है कि जो सोच कर सड़क पर उतरी थीं, मिशन पूरा हो चुका है.

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मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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