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Updated: 05 जून, 2019 07:33 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद के सेंट्रल हाल में सभी सांसदों से संयम की अपील की थी. सीधे, सपाट और सरल शब्दों में समझाने की भी कोशिश की थी. बीजेपी नेताओं को सुबह सुबह कैमरा देखते ही 'राष्ट्र के नाम संदेश' देने से बाज आने को भी कहा था - और हर तरीके से ये जताने की कोशिश की कि मोदी सरकार 2.0 के स्लोगन में जो नया फीचर 'सबका विश्वास' ऐड-ऑन हुआ है उसे मन में गांठ बांध लें - 'सबका विश्वास'. पिछली पारी में ये सिर्फ 'सबका साथ, सबका विकास' तक ही था.

प्रधानमंत्री के भाषण के दौरान ताली तो सभी ने बजायी, मेजें भी थपथपायीं - और 'मोदी-मोदी' भी कई बार किया, लेकिन सरकार का कामकाज शुरू होने के बाद एक एक कर लोग अपने मूल स्वरूप में नजर आने लगे. दिलचस्प बात तो ये है कि ये संगठन वाले नहीं, बल्कि बीजेपी के वे नेता हैं, जिन्हें सरकार में मंत्री बनाया गया है.

मुश्किल भी है, जो नेता एक खास स्टाइल की राजनीति करते आयें हों, वे खुद को कब तक रोक पाएंगे - 'मन की बात' कभी न कभी जबान पर तो आएगी ही. अब रातोंरात कोई ये सोचे कि गिरिराज सिंह लोगों को पाकिस्तान चले जाने की सलाह देना छोड़ दें, भला कैसे हो सकता है.

'शट-अप शांडिल्य गिरिराज!'

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जो आइडिया आगे बढ़ाते हैं, अमित शाह का काम ही है उस पर पूरी तरह अमल करना. लिहाजा, पहले अपने जूनियर मंत्री जी. कृष्ण रेड्डी और फिर कैबिनेट सहयोगी गिरिराज सिंह को भी अमित शाह ने बीजेपी अध्यक्ष होने के नाते डांट पिलायी है.

एनडीए का नेता चुने जाने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद के सेंट्रल हाल में जो भाषण दिया, उसमें एक घंटे तो बीजेपी नेताओं के लिए नसीहत पर भी फोकस था. जनादेश को जाति और धर्म की राजनीति के खिलाफ करार देने के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि देश के लोगों बड़ी जिम्मेदारी दी है और सभीको मिल कर उसका निर्वहन करना है. लगे हाथ विपक्ष को टारगेट करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने बताया कि गरीबों की ही तरह देश में अल्पसंख्यकों के साथ छल हुआ है और उसे हर हाल में खत्म करना है.

प्रधानमंत्री के भाषण में ये मैसेज भी रहा कि बाकी सब तो बीजेपी के प्रभाव में आ ही गये हैं, अब अल्पसंख्यकों का दिल जीतना जरूरी है. 'सबका साथ, सबका विकास' के साथ 'सबका विश्वास' जोड़ने के साथ ही मोदी ने खास जोर दिया कि नयी मोदी सरकार इस मसले पर कितना ध्यान देने वाली है. प्रधानमंत्री मोदी के बयान तो गौरक्षकों के हमलों को लेकर भी कई बार आये - लेकिन नया संकेत ये रहा कि अब सिर्फ बातें ही नहीं होंगी बल्कि उन्हें अमलीजामा भी पहलनाया जाएगा.

ये तो नहीं मालूम कि प्रधानमंत्री मोदी के भाषण के वक्त गिरिराज सिंह झपकी ले रहे थे या किसी नयी स्कीम के बारे में सोच रहे थे, लेकिन अब तो ये साफ है कि वो नीतीश पर हमला बोलने के चक्कर में प्रधानमंत्री मोदी की सीख भुला बैठे हैं. तभी तो बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह को कड़ा रूख अपनाना पड़ा है.

amit shah and giriraj singhअबकी बार... वो सब नहीं चलेगा!

बिहार में हुई इफ्तार पार्टी में नीतीश कुमार, सुशील मोदी, रामविलास पासवान, चिराग पासवान और जीतनराम मांझी की जमघट को देख गिरिराज सिंह आपा खो बैठे - हालांकि, अपने ट्वीट में बड़े ही सुंदर शब्दों में गहरा कटाक्ष किया.

गिरिराज सिंह के ट्वीट पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने ज्यादा कुछ तो नहीं, सिर्फ इतना ही कहा कि वो ऐसा इसलिए करते रहते हैं ताकि मीडिया में जगह मिलती रहे. डिप्टी सीएम सुशील मोदी ने जरूर नीतीश का बचाव और गिरिराज सिंह की खिंचाई की है. नीतीश कुमार को लेकर सुशील मोदी ने कहा कि वो इफ्तार भी करते हैं और फलाहार-खरना भी, लेकिन जो लोग तंज कर रहे हैं वो तो होली का भोज भी नहीं देते - इफ्तार तो दूर की बात है. खरना बिहार में छठ पर्व का हिस्सा होता है.

सुशील मोदी ने तो गिरिराज सिंह को महज आईना दिखाने की कोशिश की है - बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह तो इतने नाराज हैं कि 'खामोश' रहने को ही कह दिया है.

क्यों मुसीबत मोल लेते हो यार!

गिरिराज सिंह ही नहीं, लगता है गृह राज्य मंत्री जी किशन रेड्डी भी लगता है, मोदी के भाषण से अल्पसंख्यकों वाली बात मिस कर गये. जी. किशन रेड्डी ने तो हैदराबाद को आतंकवादियों का अड्डा ही बता डाला. जी. किशन रेड्डी ने दलील दी थी कि अगर कोई घटना बेंगलुरु या भोपाल में भी होती है तो उसकी जड़ें हैदराबाद में मिलती हैं - पुलिस और एनआईए हर 2-3 महीनों में हैदराबाद से आतंकियों को गिरफ्तार करते हैं.

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, गृह मंत्री अमित शाह ने जीएस रेड्डी को उनके इस बयान के लिए फटकार लगाई है और रेड्डी को अनर्गल बयानबाजी से बचने की नसीहत दी है. तेलंगाना से आने वाले जी. किशन रेड्डी को भी गिरिराज सिंह की तरह प्रधानमंत्री मोदी का करीबी माना जाता है. तेलंगाना से आने वाले जी. किशन रेड्डी ने मोदी के साथ 25 साल पहले अमेरिका यात्रा पर गये थे - और उस यात्रा की तस्वीरें भी एक बार शेयर की थीं.

siriraj singh and nitish never like each otherगिरिराज तो नीतीश को फूटी आंख नहीं देखते, लेकिन...

2014 से पहले जो बीजेपी नेता नरेंद्र मोदी का झंडा उठाये हुए थे उनमें गिरिराज सिंह भी शुमार हैं - और 2013 में तो नीतीश कुमार के एनडीए छोड़ने के बाद मोदी का नाम लेकर अक्सर हमला बोलते रहते थे. मुमकिन है अमित शाह के लिए ऐसे नेताओं के साथ सख्ती से पेश आने में अमित शाह को भी थोड़ा संकोच होता होगा - लेकिन ये तो अल्पसंख्यकों को लेकर प्रधानमंत्री मोदी की ही गाइडलाइन है जिसे वो लागू करने में जुटे हैं.

जी. किशन रेड्डी के बयान के फौरन बाद हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी की स्वाभाविक प्रतिक्रिया भी आई थी, 'एक राज्य मंत्री इस तरह की बात कर रहा है. ये तेलंगाना के लिए उनकी घृणा को बताता है. मैं उनसे पूछना चाहता हूं कि पिछले पांच साल में एनआईए, आईबी और रॉ ने क्या ये लिखित में दिया है कि हैदराबाद आतंकियों के लिए सुरक्षित है.'

विरोधियों को पाकिस्तान भेजने की रेडीमेड सलाह लेकर चलने वाले गिरिराज सिंह से अमित शाह तो उनके बेगूसराय से चुनाव लड़ने में हीलाहवाली को लेकर भी खफा थे - अल्पसंख्यकों के संदर्भ में नीतीश कुमार पर हमला बोल कर गिरिराज सिंह खुद ही लपेटे में आ गये.

टाइम्स ऑफ इंडिया से बातचीत में बीजेपी के एक सीनियर नेता ने बताया है, 'पार्टी अध्यक्ष ने गिरिराज सिंह की टिप्पणी के लिए उन्हें सख्त लहजे में चेतावनी दी है. उन्होंने सीधे सीधे कह दिया है कि ऐसी टिप्पणियां बर्दाश्त नहीं की जाएंगी और पार्टी नेतृत्व कड़े एक्शन भी ले सकता है.'

अमित शाह साथी नेताओं का अमूमन मजबूती से बचाव ही करते हैं - या मीडिया में मामला रफा-दफा समझा जाये इसके लिए विवाद पैदा करने वाली बयानबाजी से बचने की सलाह देते हैं - ऐसी ही कुछ हिदायत गृह मंत्री अमित शाह ने हाल ही में अपने जूनियर मंत्री को भी दी धी.

दादरी में अखलाक की हत्या के बाद अवॉर्ड वापसी से लेकर जगह जगह मॉब लिंचिंग की घटनाएं पिछली मोदी सरकार की मुश्किलें बढ़ाती रही हैं - पिछली पारी में मोदी ने कई बार गौरक्षकों को आगाह भी किया था और राज्यों को उनके गतिविधियों को लेकर डॉजियर तैयार करने की भी सलाह दी थी - मुश्किल ये रही कि न तो कभी घटनाओं पर लगाम कसी जा सकी - न नेताओं के सपोर्ट पर - जयंत सिन्हा तो बाकायदा घर बुलाकर माला-फूल के साथ स्वागत और सम्मान ही करते देखे गये - नतीजा ये हुआ कि उन्हें मंत्रिमंडल में जगह भी नहीं मिली.

ऊपरी तौर पर लग तो ऐसा ही रहा है कि नीतीश पर टिप्पणी के लिए अमित शाह ने गिरिराज सिंह को खरी-खोटी सुनायी है - लेकिन सब कुछ बिलकुल ऐसा ही नहीं है. दरअसल, अमित शाह ने गिरिराज सिंह के बहाने नीतीश कुमार और उनकी राजनीति को न्यूट्रलाइज करने की कोशिश की है. धारा 370, आर्टिकल 35 A, यूनिफॉर्म सिविल कोड जैसे मुद्दों पर नीतीश कुमार बीजेपी को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं - चुनावों के दौरान जेडीयू के मैनिफेस्टो न आने की ये वजह तो रही ही, मोदी सरकार 2.0 के आने के बाद भी नीतीश कुमार काफी मुखर रहे हैं. केंद्र की मोदी सरकार से नीतीश कुमार की दूरी बनाना और मंत्रिमंडल विस्तार के जरिये अवाम को मैसेज देने की नीतीश कुमार की कोशिश अमित शाह को नागवार गुजर रही है.

बेहद कम जनाधार होने के बावजूद नीतीश कुमार सुशासन बाबू वाली छवि के बूते बिहार की राजनीति में बने हुए हैं. साथ ही, नीतीश कुमार जताना चाहते हैं कि जो 'सबका विश्वास' वाली राजनीति बीजेपी शुरू कर चुकी है, उसके असली दावेदार सिर्फ वही हैं. मुस्लिम वोटों पर नीतीश कुमार सिर्फ अपना ही हक मान कर चलते हैं. एनडीए से पहली बार अलग होने से लेकर मोदी की रैली में 'भारत माता की जय' नारे के बीच बैठे बैठे मुस्कुराने के पीछे मकसद यही मैसेज देना था. नीतीश मुस्लिम समुदाय को संदेश देना चाह रहे थे कि एनडीए के साथ रहने के बावजूद सिर्फ वही उनके हितैषी हैं.

बीजेपी नेतृत्व ने नीतीश कुमार को चारों तरफ से घेर लिया है. 'सबका विश्वास' स्लोगन के पीछे भी बीजेपी की सोच यही है कि मुस्लिम वोट पर चाहे जेडीयू हो चाहे कांग्रेस या चाहे कोई और भले ही दावा करे - लेकिन आम चुनाव में 10 फीसदी मुस्लिम वोट मिले तो बीजेपी को भी हैं. पंचायत से पार्लियामेंट तक भगवा फहराने के मिशन में जुटी बीजेपी अब तक मुस्लिम समुदाय को समझाती रही कि हिंदुओं के बीच वो सुरक्षित हैं - अब बता रही है कि जब बीजेपी को कोई हराने वाला ही नहीं बच रहा तो दूसरों को वोट देने से क्या फायदा. ये बात मायावती अपनी स्टाइल में मुस्लिम समुदाय को समझाती हैं और बीजेपी अपने तरीके से.

अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक दूरगामी सोच के तहत माइनॉरिटी पॉलिटिक्स को झकझोरने की कोशिश की है - तो गिरिराज सिंह के बहाने अमित शाह अब नीतीश कुमार की राजनीतिक जमीन पर धावा बोल रहे हैं - समझ में तो ये बातें नीतीश कुमार को भी आ रही होंगी. वैसे भी नीतीश कुमार और अमित शाह दोनों ही अपने अपने इलाके में चाणक्य ही कहलाते हैं. मोदी-शाह की जोड़ी समझाना चाहती है कि 'सबका विश्वास' के लंबदार सिर्फ नीतीश कुमार या खुद को वैसा समझने वाली पार्टी नहीं - अब बीजेपी वो जगह भी भरने की तैयारी कर चुकी है. 

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लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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