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Updated: 08 अगस्त, 2022 04:41 PM
मृगांक शेखर
मृगांक शेखर
  @msTalkiesHindi
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नीतीश कुमार (Nitish Kumar) का नीति आयोग की बैठक में न पहुंचना और ममता बनर्जी का पहले से ही दिल्ली में मौजूद रहना अपनेआप ध्यान खींचता है. जो रवैया अब तक ममता बनर्जी का हुआ करता था, इस बार विरोध का वो झंडा तेलंगाना के मुख्यमंत्री के. चंद्रशेखर राव ने उठाया है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पहले ही पत्र लिख कर केसीआर ने बता दिया था कि अपना विरोध जताने के लिए वो बैठक से दूरी बना रहे हैं. केसीआर ने पहले ही बोल दिया था, 'मैं केंद्र सरकार की बैठक से खुद को दूर कर रहा हूं.' केसीआर का कहना है कि राज्यों के प्रति केंद्र सरकार के भेदभावपूर्ण रवैये के कारण ये कदम उनको उठाना पड़ रहा है. नीति आयोग की बैठक में बाकी सभी राज्यों के मुख्यमंत्री पहुंचे थे. मीटिंग से दूरी बना लेने वालों एक नाम दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल का भी रहा. नीतीश कुमार को लेकर कहा जा रहा है कि वो स्वास्थ्य कारणों से बैठक में हिस्सा नहीं ले पाये.

मेडिकल ग्राउंड पर तो कोई सवाल ही नहीं किया जा सकता, लेकिन पूर्व केंद्रीय मंत्री आरसीपी सिंह को लेकर बिहार की राजनीति में जो बवाल मचा है नीतीश कुमार की राजनीतिक सेहत के लिए भी नुकसानदेह ही लगता है.

तमाम आरोप और प्रत्यारोप के बीच दो खास बातें ये हैं कि आरसीपी सिंह को बिहार जेडीयू अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा की तरफ से शोकॉज नोटिस दिया गया था - और पूर्व जेडीयू अध्यक्ष ने पार्टी से भी इस्तीफा दे दिया है. माना जा रहा है कि अगर आरसीपी ऐसा नहीं करते तो नीतीश कुमार उनको सस्पेंड तो कर ही देते.

नोटिस देकर आरसीपी सिंह (RCP Singh) पर भ्रष्टाचार के लगे आरोपों पर सफाई मांगी गयी थी. अपने गांव पहुंचे आरसीपी सिंह ने प्रेस कांफ्रेंस बुलाकर सारे आरोपों को खारिज किया और इस्तीफा देने के साथ ही नीतीश कुमार पर भी कई आरोप लगा डाले. जब बात नीतीश कुमार के प्रधानमंत्री बनने को लेकर उठी तो बोले - वो तो अगले सात जन्मों तक प्रधानमंत्री नहीं बनने वाले हैं.

आरसीपी सिंह पर जेडीयू में रहते अकूत संपत्ति जुटाने जैसा बेहद संगीन आरोप लगाया गया है. आरसीपी सिंह राजनीति में आने से पहले से ही नीतीश कुमार के साथ रहे हैं. पहले वो नीतीश कुमार के पंसदीदा नौकरशाह हुआ करते थे - और धीरे धीरे उनके बेहद करीबी और भरोसेमंद जेडीयू नेता बन गये.

भरोसा भी ऐसा कि नीतीश कुमार ने जब जेडीयू का अध्यक्ष पद छोड़ा तो भी ललन सिंह पर आरसीपी को ही तरजीह दी थी. लंबे अरसे से ललन सिंह और आरसीपी सिंह में नीतीश का सबसे करीबी बनने की होड़ मची रहती थी. बस कुछ दिनों के लिए दोनों में सीजफायर हुआ था जब प्रशांत किशोर को जेडीयू का उपाध्यक्ष बनाया गया था. ये साथ रंग भी लाया, नीतीश कुमार ने प्रशांत किशोर को जेडीयू से बाहर भी कर दिया.

जब नीतीश कुमार को गच्चा देकर आरसीपी सिंह केंद्र की मोदी सरकार में कैबिनेट मंत्री बन गये तभी ललन सिंह जेडीयू के अध्यक्ष बनाये गये. अब जो आरसीपी सिंह के खिलाफ जो भी मुहिम चलायी जा रही है, उनके ट्रैक रिकॉर्ड को देखते हुए स्वाभाविक तौर पर उनको ही मुख्य कर्ताधर्ता समझा जा रहा है.

नीतीश कुमार को तो बिहार की राजनीति में चाणक्य ही माना जाता है, लेकिन मुश्किल है कि बीजेपी (BJP) की दूरगामी रणनीतियों की बदौलत वो चारों तरफ से घिरे हुए भी हैं. हां, ये तो मानना ही पड़ेगा कि ये नीतीश कुमार ही हैं जो बीजेपी की हर चाल की काट भी जानते हैं और इसीलिए मैदान में बने हुए भी हैं.

अब नीतीश कुमार को ये नहीं भूलना चाहिये कि आरसीपी सिंह जैसा करीबी, भरोसेमंद और सबसे बड़ा राजदार नेता बीजेपी के हाथ लग चुका है. अब अगर नीतीश कुमार ने जेडीयू में आरसीपी सिंह के विरोधियों पर लगाम नहीं कसी तो जो भी मिसाइल फेंके जाएंगे, डबल स्पीड में बैकफायर करेंगे. आखिर आरसीपी सिंह भी तो नीतीश कुमार के वैसे ही करीबी रहे हैं जैसे ममता बनर्जी के लिए पार्थ चटर्जी - अब अगर आरसीपी सिंह पर सवाल खड़े किये जाएंगे तो कठघरे में तो नीतीश कुमार अपनेआप खड़े हो जाएंगे.

सवालों के जवाब तो नीतीश कुमार भी देने होंगे

आरसीपी सिंह ने इस्तीफा देते हुए कहा, 'मेरे खिलाफ ये सभी आरोप कुछ लोगों द्वारा एक साजिश के तहत लगाये गये हैं, जो मेरी बढ़ती लोकप्रियता से डरते थे.'

rcp singh, nitish kumarआरसीपी सिंह तो जेडीयू और बीजेपी के झगड़े में पिस रहे हैं, लेकिन नीतीश कुमार के लिए सावधानी हटी और दुर्घटना घटी जैसी स्थिति होती जा रही है

जाहिर है ऐसी बातें आरसीपी सिंह नीतीश कुमार के लिए तो नहीं ही कहेंगे, क्योंकि उनका भी कोई जनाधार नहीं है. ये भी सच है कि नौकरशाही से राजनीति में आरसीपी सिंह के पास जो भी है, नीतीश कुमार से ही मिला हुआ है.

हां, जो बात आरसीपी सिंह ने जेडीयू को लेकर कही है, वो नीतीश कुमार से जुड़ी जरूर लगती है. जेडीयू को डूबता हुआ जहाज करार देते हुए आरसीपी सिंह ने यहां तक कह डाला कि जेडीयू में अब रखा ही क्या है?

जेडीयू के नोटिस में क्या है: आरसीपी सिंह को भेजे गये जेडीयू के नोटिस पर दस्तखत बिहार जेडीयू अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा के हैं - और ये नोटिस नालंदा जिले के जेडीयू के प्रखंड अध्यक्ष और एक अन्य नेता के आरोपों पर आधारित बताया जाता है. नोटिस में कहा गया है कि नालंदा जेडीयू के दो साथियों ने साक्ष्य के साथ शिकायत की है.

नोटिस में आरोप है कि आपके और आपके परिवार के नाम से 2013 से 2022 तक अकूत अचल संपत्ति की रजिस्ट्री करायी गयी है, जिसमें कई तरह की अनियमितताएं मालूम पड़ती हैं.

ये बताते हुए, नोटिस में ही, कि आरसीपी सिंह, नीतीश कुमार के साथ अधिकारी और राजनीतिक कार्यकर्ता के रूप में काम करते रहे हैं, बीते एहसानों की फेहरिस्त भी फिर से पेश की गयी है - 'आपको माननीय नेता ने दो बार राज्य सभा का सदस्य, जेडीयू का राष्ट्रीय महासचिव, फिर राष्ट्रीय अध्यक्ष और केंद्र में मंत्री के रूप में कार्य करने का अवसर पूर्ण विश्वास और भरोसे के साथ दिया.'

आगे लिखा है, 'आप इस तथ्य से अवगत हैं कि माननीय नेता भ्रष्टाचार के जीरो टॉलरेंस पर काम करते हैं - और इतने लंबे सार्वजनिक जीवन के बावजूद नेता पर कभी कोई दाग नहीं लगा और न कोई संपत्ति बनायी.'

एक मीडिया रिपोर्ट में बताया गया है कि जिन संपत्तियों को लेकर आरोप लगाये गये हैं, उनका चुनावी हलफनामे में जिक्र नहीं है. जेडीयू नेताओं का ही आरोप है कि आरसीपी सिंह ने हेरफेर कर अपनी पत्नी के नाम से भी जमीन खरीदी है. आरोप है कि आरसीपी सिंह ने अपने इलाके नालंदा जिले के दो प्रखंडों में 40 बीघा जमीन भी खरीदी है.

ये तो अच्छी बात है कि कोई कानूनी कार्रवाई किये जाने से पहले आरसीपी सिंह को नोटिस दिया गया है. अब जबकि वो इस्तीफा दे चुके हैं, नोटिस का तो कोई मतलब नहीं रह जाता, लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की मंजूरी लेकर उपेंद्र कुशवाहा किसी सरकारी एजेंसी से शिकायत कर सकते हैं - और सरकार की तरफ से सीबीआई जांच की सिफारिश भी की जा सकती है.

लेकिन क्या आरसीपी सिंह के खिलाफ नीतीश कुमार वास्तव में ऐसा कोई सख्त कदम उठाएंगे?

आरसीपी दागी हुए, तो नीतीश बेदाग कैसे: अगर आरसीपी सिंह ने जेडीयू में रहते अकूत संपत्ति अर्जित कर ली तो क्या वो अकेले दोषी समझे जाएंगे? जेडीयू के अध्यक्ष तो वो कुछ ही महीने रहे हैं, बाकी समय तो सारे काम नीतीश कुमार से पूछ कर ही करते रहे होंगे या फिर दूसरे तरीके से समझें तो आरसीपी सिंह की सलाहों पर नीतीश कुमार अमल करते रहे होंगे.

जब से नीतीश कुमार ने अपनी पार्टी जेडीयू बनायी, आरसीपी सिंह साथ हैं - और तभी से बिहार में जेडीयू बीजेपी के साथ सत्ता में है, लेकिन नेतृत्व नीतीश कुमार का ही रहा है. बीजेपी से बस कुछ साल के लिए ही जेडीयू का नाता टूटा रहा.

अब अगर बिहार में नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री रहते आरसीपी सिंह ने किसी तरह का भ्रष्टाचार किया है तो दोनों की ही मिलीभगत समझी जाएगी. अगर ऐसा नहीं भी हुआ तो सुशासन का दावा करने वाले नीतीश कुमार भला आंख मूंदे क्यों बैठे रहे - आंख भी तब जाकर खुली जब वो जेडीयू से दूरी बना लिये!

देखा जाये तो आरसीपी सिंह के मुकाबले तेजस्वी यादव तो कुछ ही दिन के लिए नीतीश कुमार के साथ रहे. गठबंधन साथी और सरकार में डिप्टी सीएम के रूप में. तब तो तेजस्वी यादव से नीतीश कुमार इस कदर खफा हुए कि महागठबंधन छोड़ दिया और खुद इस्तीफा दे दिया ताकि आरजेडी नेता का मंत्री पद अपनेआप खत्म हो जाये.

क्या नीतीश कुमार को आरसीपी सिंह के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप उतने ही दमदार लगते हैं जितने तेजस्वी यादव पर लगे इल्जाम रहे हैं? ये सवाल इसलिए उठ रहा है कि बगैर उनकी मंजूरी मिले आरसीपी सिंह को कारण बताओ नोटिस तो जारी नहीं ही हुआ होता?

लेकिन ये भी नहीं भूलना चाहिये कि अगर आरसीपी सिंह पर भ्रष्टाचार के आरोप लगेंगे तो नीतीश कुमार भी संरक्षण देने के इल्जाम से बच नहीं पाएंगे.

नीतीश नहीं संभाले तो बीजेपी को मौका मिल जाएगा

आरसीपी सिंह और नीतीश कुमार के बीच मनमुटाव बढ़ा तो साल भर पहले ही जब जुलाई, 2021 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कैबिनेट में फेरबदल कर रहे थे - लेकिन मन में खटास बहुत पहले आ चुकी थी. नीतीश कुमार को ये महसूस तो पहले से हो रहा होगा, लेकिन राजनीति में बड़े हितों के लिए अक्सर छोटी मोटी बातें नजरअंदाज भी कर दी जाती हैं.

2019 के आम चुनाव को लेकर जब जेडीयू और बीजेपी के बीच 50-50 सीटों पर सहमति बन गयी तो आगे की जिम्मेदारी आरसीपी सिंह को दे दी गयी. सीटों पर सहमति भी नीतीश कुमार और अमित शाह के बीच दो बार हुई बैठकों के बाद बनी थी. कहते हैं कि आरसीपी सिंह ने बीजेपी के लिए सीटें छोड़ते समय नीतीश कुमार की दिलचस्पी की भी परवाह नहीं की. नीतीश कुमार को तब भी महसूस हुआ था कि आरसीपी सिंह जेडीयू के होते हुए भी बीजेपी को फायदा पहुंचा रहे हैं. आरसीपी सिंह से नाराज तो नीतीश कुमार तब भी हुए थे जब यूपी चुनाव के लिए वो बीजेपी के साथ जेडीयू के लिए कुछ सीटें नहीं मांग पाये थे.

ये तो आरसीपी सिंह भी जानते ही होंगे कि नीतीश कुमार की मर्जी के खिलाफ मंत्री बनने की कीमत चुकानी ही पड़ेगी, लेकिन बीजेपी से कुछ उम्मीद भी रही होगी. जुलाई, 2022 में आरसीपी सिंह के राज्य सभा का कार्यकाल खत्म हो गया और नीतीश कुमार ने उनकी जगह दूसरे जेडीयू नेता को संसद भेज दिया - बीजेपी ने जब मुख्तार अब्बास नकवी से इस्तीफा ले लिया तो आरसीपी सिंह इस्तीफा न देते तो क्या करते?

बीच में खबर ये भी आयी थी कि आरसीपी सिंह ने मित्रों के माध्यम से बीजेपी नेतृत्व को मैसेज दिया था कि वो पार्टी ज्वाइन करना चाहते हैं, लेकिन ग्रीन सिग्नल नहीं मिला. मतलब, तो यही हुआ कि बीजेपी को आरसीपी सिंह को घोषित तौर पर साथ लेने से कोई खास फायदा नजर नहीं आ रहा होगा.

ऊपर से बीजेपी सीधे सीधे नीतीश कुमार को नाराज भी नहीं करना चाहती होगी. चिराग पासवान का केस सबसे बड़ा उदाहरण है. बीजेपी ने नीतीश कुमार के दबाव में चिराग पासवान को बिहार चुनाव के बाद वैसा कुछ भी नहीं दिया जिसके वो हकदार थे - और इन सबके पीछे दबाव तो नीतीश कुमार का ही समझा जाता है.

ऐसे में बीजेपी आरसीपी सिंह का वैसे ही इस्तेमाल करना चाहेगी जैसे चिराग पासवान और जीतनराम मांझी होते रहे हैं. नीतीश कुमार के खिलाफ आरसीपी सिंह के तेवर तो इस्तीफा वाले प्रेस कांफ्रेंस में ही देखे जा चुके हैं. बीजेपी की शह बरकरार रही तो ये सिलसिला आगे भी जारी रहेगा और ज्यादा आक्रामक हो सकता है.

बीजेपी अच्छी तरह जानती है कि आरसीपी सिंह के धोखा देने से नीतीश कुमार भले नाराज हो गये हों, लेकिन वो उनकी कमजोर कड़ी रहे हैं. लंबे अरसे तक नीतीश कुमार की राजनीति को करीब से देखा भी है और हर अच्छे बुरे के राजदार भी रहे हैं. अब अगर नीतीश कुमार ने आरसीपी सिंह का मामला राजनीतिक तरीके से हैंडल नहीं किया तो लेने के देने भी पड़ सकते हैं.

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लेखक

मृगांक शेखर मृगांक शेखर @mstalkieshindi

जीने के लिए खुशी - और जीने देने के लिए पत्रकारिता बेमिसाल लगे, सो - अपना लिया - एक रोटी तो दूसरा रोजी बन गया. तभी से शब्दों को महसूस कर सकूं और सही मायने में तरतीबवार रख पाऊं - बस, इतनी सी कोशिश रहती है.

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