charcha me | 

होम -> सियासत

 |  7-मिनट में पढ़ें  |  
Updated: 28 नवम्बर, 2021 03:59 PM
देवेश त्रिपाठी
देवेश त्रिपाठी
  @devesh.r.tripathi
  • Total Shares

यूपी चुनाव के मद्देनजर समाजवादी पार्टी के सियासी समीकरणों को दुरुस्त करने में जुटे सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के लिए शब्द 'बदलाव' टैग लाइन बनता जा रहा है. यूपी विधानसभा चुनाव 2022 के लिए गठबंधन को लेकर आरएलडी अध्यक्ष जयंत चौधरी से मुलाकात के अगले ही दिन अखिलेश यादव की मुलाकात आम आदमी पार्टी के प्रदेश प्रभारी संजय सिंह से हुई. लगभग तय माना जा रहा है कि समाजवादी पार्टी यूपी चुनाव से पहले आम आदमी पार्टी से भी गठबंधन कर सकती है. यूपी चुनाव में भाजपा के सामने खुद को मजबूत दावेदार के रूप में पेश करने के लिए समाजवादी पार्टी का गठबंधन अब तक जयंत चौधरी की आरएलडी, ओमप्रकाश राजभर की सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी, केशव देव मौर्य के महान दल, संजय चौहान की जनवादी पार्टी (सोशलिस्ट), गोंडवाना गणतंत्र पार्टी और अपना दल कमेरावादी से हो चुका है. इस स्थिति में सवाल उठना लाजिमी है कि अखिलेश यादव और समाजवादी पार्टी के लिए अब तक हुए इन गठबंधनों के क्या मायने हैं? 

पश्चिमी यूपी में 'जयंत चौधरी के साथ, बदलाव की ओर'

2014 के बाद से ही पश्चिमी उत्तर प्रदेश का जाट मतदाता खुलकर भाजपा के पाले में खड़ा दिखाई दिया है. लेकिन, किसान आंदोलन को जाट समुदाय से मिले समर्थन के बाद भाजपा के लिए पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सियासी समीकरण गड़बड़ा गए थे. हालांकि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से कृषि कानूनों की वापसी के ऐलान के बाद माना जा रहा है कि भाजपा अब पश्चिमी उत्तर प्रदेश के चुनावी मैदान में फिर से खुद को स्थापित करने की कोशिश में जुट जाएगी. लेकिन, पश्चिमी यूपी में सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव और आरएलडी प्रमुख जयंत चौधरी की जोड़ी भाजपा के लिए बड़ी चुनौती खड़ी कर रही है. समाजवादी पार्टी और आरएलडी के बीच गठबंधन से अखिलेश यादव को मिलने वाले मुस्लिम वोटों और जयंत चौधरी के पक्ष में लामबंद हुए जाट मतदाताओं के गठजोड़ का प्रभाव पश्चिमी उत्तर प्रदेश की 136 विधानसभा सीटों पर पड़ेगा. वैसे, सपा-आरएलडी गठबंधन में जयंत चौधरी को उनकी आकांक्षाओं के हिसाब से सीटें नहीं मिल रही हैं. लेकिन, अखिलेश यादव के साथ के बिना पश्चिमी उत्तर प्रदेश में पार्टी का प्रदर्शन बहुत अच्छा हो पाने की उम्मीद भी नहीं है.

किसान आंदोलन और आरएलडी प्रमुख अजित सिंह के निधन के बाद जयंत चौधरी को जाट नेता के तौर पर पगड़ी भी पहनाई जा चुकी है. आरएलडी ने किसान आंदोलन के साथ ही किसानों के तमाम मुद्दों को लेकर अपने समीकरणों को साधने की शुरुआत कर दी थी. जो भाजपा के लिए कहीं न कहीं चिंता बढ़ाने वाला मामला बन सकता है. वहीं, सपा-आरएलडी गठबंधन के लिए सबसे बड़ी समस्या ये है कि समाजवादी पार्टी की मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति के खिलाफ एकजुट होकर भाजपा को समर्थन देने वाला जाट समुदाय क्या जयंत चौधरी के नाम पर अखिलेश यादव के साथ आने को तैयार होगा? वहीं, इन सबसे इतर भाजपा से नाराज वोटों में बंटवारा रोकना भी सपा-आरएलडी गठबंधन के लिए एक बड़ी चुनौती होगा. पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बसपा और कांग्रेस के वोट बेस सपा-आरएलडी गठबंधन के लिए एक अलग चुनौती पेश करेगा. वहीं, कृषि कानूनों की वापसी के बाद जाट खाप पंचायतों में सामने आ रहे मतभेद भी अखिलेश यादव और जयंत चौधरी के लिए चिंता बढ़ाने वाला मामला कहा जा सकता है. 

पूर्वांचल में 'सपा-सुभासपा के साथ से भाजपा साफ'

उत्तर प्रदेश की 33 फीसदी विधानसभा सीटों वाले पूर्वांचल को लेकर कहा जाता है कि सूबे की सत्ता का रास्ता यहीं से होकर जाता है. 2017 के विधानसभा चुनाव में पूर्वांचल की 164 सीटों में 115 पर कब्जा जमाने वाली भाजपा ने ये साबित भी किया था. भाजपा के लिए पूर्वांचल 'नाक का सवाल' है, क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र वाराणसी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गोरखनाथ मठ इसी पूर्वांचल का हिस्सा हैं. लेकिन, पूर्वांचल में भाजपा को मजबूती देने वाले एनडीए के पूर्व सहयोगी रहे सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी के ओमप्रकाश राजभर ने समाजवादी पार्टी की साइकिल की सवारी करना चुन लिया है. वैसे, पूर्वांचल में अखिलेश यादव भाजपा को टक्कर देने के लिए कोई भी कमजोर कड़ी छोड़ते नहीं दिख रहे हैं. अखिलेश यादव ने बसपा के संस्थापक सदस्यों में से रहे रामअचल राजभर और सुखदेव राजभर के बेटे के सहारे चुनावी वैतरणी पार करने के पक्के इंतजाम किए हैं. समाजवादी पार्टी को मजबूत करने के लिए सोची-समझी रणनीति के तहत जनवादी पार्टी (सोशलिस्ट) के नेता संजय चौहान और अपना दल कमेरावादी भी अखिलेश के साथ गठबंधन में नजर आ रहे हैं.

Akhilesh Yadav Samajwadi Party Allianceकिसान आंदोलन, कोरोना महामारी के प्रबंधन समेत अन्य मुद्दों की वजह से यूपी चुनाव के समीकरण बदल गए हैं.

किसान आंदोलन, कोरोना महामारी के प्रबंधन समेत अन्य मुद्दों की वजह से यूपी चुनाव के समीकरण बदल गए हैं. तो, पूर्वांचल के लिए पीएम नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की ओर से विकास योजनाओं की सौगात से समीकरणों को साधने की कोशिश की जा रही है. दरअसल, पूर्वांचल की करीब चार दर्जन सीटों पर राजभर मतदाता सियासी खेल को बनाने-बिगाड़ने की ताकत रखता है. वहीं, 20 से ज्यादा ऐसी सीटें हैं, जिन पर 2017 के विधानसभा चुनाव में सपा दूसरे नंबर पर रही थी. और, इन सीटों का राजभर मतदाता भाजपा के साथ गया था. अगर ओमप्रकाश राजभर, रामअचल राजभर और पप्पू राजभर की तिकड़ी राजभर मतदाताओं को एकजुट करने में कामयाब हो जाती है, तो भाजपा के लिए मुश्किल खड़ी हो सकती है. वहीं, अपना दल कमेरावादी के जरिये कुर्मी वोटों पर भी समाजवादी पार्टी की नजर है. लेकिन, भाजपा के साथ गठबंधन करने वाली अनुप्रिया पटेल की पार्टी अपना दल (एस) ने बीते तीन चुनावों में कुर्मी वोटों पर अपनी पकड़ को काफी स्थापित किया है.

जनवादी पार्टी (एस) के संजय चौहान की नोनिया समुदाय के मतदाताओं पर गहरी पकड़ है. पूर्वांचल की कई सीटों पर नोनिया समाज का वोट जीत-हार तय करने वाला कहा जा सकता है. 2019 में संजय चौहान ने चंदौली संसदीय सीट से सपा के टिकट पर आम चुनाव लड़ा था. और, भाजपा के महेंद्र नाथ पांडेय से केवल 14,000 वोटों के अंतर से हारे थे. केशव देव मौर्य के महान दल के सहारे कुशीनगर, मिर्जापुर, अंबेडकरनगर, प्रतापगढ़, प्रयागराज जिलों अखिलेश यादव को चमत्कार की उम्मीद है. समाजवादी के एमवाई समीकरण में अगर राजभर, कुर्मी, मौर्य, नोनिया जातियों का वोट जुड़ जाता है, तो भाजपा के लिए पूर्वांचल में अपना पिछला प्रदर्शन दोहराना असंभव सी चुनौती नजर आ रहा है. हालांकि, भाजपा ने अपना दल (एस) और संजय निषाद की निषाद पार्टी के सहारे पूर्वांचल के सियासी समीकरणों को साधने की कोशिश की है. वहीं, राजभर नेताओं को केंद्र और राज्य सरकार में मंत्री पद देकर इस समाज का एक नया नेतृत्व बनाने के भी प्रयास किए हैं. लेकिन, ये कितना सफल होगा, यूपी चुनाव के नतीजे ही तय करेंगे. क्योंकि, पूर्वांचल में अखिलेश हर मामले में भाजपा से अव्वल नजर आ रहे हैं.

आम आदमी पार्टी के साथ 'एक मुलाकात, बदलाव के लिए'

सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने पहले ही साफ कर दिया था कि वो यूपी विधासभा चुनाव 2022 के लिए केवल छोटे दलों से ही गठबंधन करेंगे. अखिलेश का ये बयान यूपी में पैर जमाने की कोशिश कर रही आम आदमी पार्टी के लिए किसी वरदान से कम नहीं कहा जा सकता है. सपा के साथ गठबंधन तय होने के बाद अगर आम आदमी पार्टी के खाते में कम सीटें भी आती हैं, तो उसके लिए ये बोनस जैसा ही मामला होगा. क्योंकि, अकेले यूपी चुनाव में जाने पर उसे 'वोटकटवा' जैसे आरोपों का भी सामना करना पड़ सकता था. 'दिल्ली मॉडल' के साथ यूपी में विधानसभा चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही आम आदमी पार्टी का शहरी सीटों पर थोड़ा-बहुत प्रभाव देखने को मिला है. मुफ्त बिजली-पानी की योजनाओं के सहारे आम आदमी पार्टी ने यूपी की शहरी सीटों पर ठीक-ठाक माहौल बना दिया है. भाजपा से नाराज वोटों के बंटवारे को रोकने के लिए आम आदमी पार्टी भी अखिलेश यादव की मदद ही करती नजर आती है. आसान शब्दों में कहा जाए, तो अगर अखिलेश यादव के गठबंधन वाला प्लान पूरी तरह से सटीक बैठ जाता है, तो भाजपा के लिए सत्ता में दोबारा वापसी की राह नामुमकिन नजर ही आ रही है.

लेखक

देवेश त्रिपाठी देवेश त्रिपाठी @devesh.r.tripathi

लेखक इंडिया टुडे डिजिटल में पत्रकार हैं. राजनीतिक और समसामयिक मुद्दों पर लिखने का शौक है.

iChowk का खास कंटेंट पाने के लिए फेसबुक पर लाइक करें.

आपकी राय