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बड़ा आर्टिकल  |  
Updated: 10 जून, 2022 02:47 PM
अनुज शुक्ला
अनुज शुक्ला
  @anuj4media
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उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने के पहले से अब तक समाजवादी पार्टी के अंदर से जिस तरह की चीजें निकलकर सामने आई हैं उसने ना सिर्फ अखिलेश यादव के नेतृत्व पर कई सवाल खड़े किए हैं. सपा के राजनीतिक इतिहास पर नजर रखने वालों को भी फिलहाल हैरानी हो रही होगी. पार्टी के अंदरुनी ढांचे में आजम खान के संदर्भ और तमाम घटनाओं को लेकर लोग घोर आश्चर्य में हैं. इतनी हैरानी तब भी नहीं थी जब शिवपाल यादव ने अखिलेश के नेतृत्व को खुली चुनौती दी थी. यह पहले से साफ़ था कि शिवपाल की राजनीतिक प्रासंगिकता उनकी क्षमताओं की वजह से बनी तो रहेगी, बावजूद सपा से बाहर उनका पुराना वजूद नहीं रहेगा. शिवपाल से खुद को बचाकर निकल चुके अखिलेश को अब पार्टी में अपने ही वजूद के लिए जूझना पड़ रहा है.

पिछले कुछ महीनों से सपा लगातार ऐतिहासिक उतार-चढ़ाव और अनिश्चितता के दौर से गुजरती दिख रही है. पार्टी के अब तक के इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ. एक भी उदाहरण नहीं मिलता कि कभी नेताजी मुलायम सिंह यादव के नेतृत्व को किसी भी दूसरी पंक्ति के नेता ने चुनौती देने की हिम्मत तो करना दूर की बात, सपने में भी सोचा हो. राम मनोहर लोहिया के स्कूल से निकले मुलायम की राजनीतिक काबिलियत का अंदाजा सिर्फ इसी बात से लगा सकते हैं कि उन्होंने मंडल को कानूनी रूप देने वाले पूर्व प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह को भी बहुत सफाई से किनारे लगा दिया था. मुलायम यूपी में अकेले दम मंडल-कमंडल से उपजे हालात पर पिछड़ा वर्ग के साथ मुसलमानों को लेकर राजनीति करते रहे. मुलायम के उत्तराधिकारी और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश के नेतृत्व में सपा ने हालिया चुनाव में एक शानदार प्रदर्शन की वजह से अभी भी मुख्य विपक्षी दल का रुतबा बनाए रखा है. मगर सपा के इतिहास में पहली बार साफ दिख रहा है कि शीर्ष नेतृत्व के रूप में अखिलेश के पास मुलायम जैसी चमक का अभाव है.

घरेलू झगड़े में पड़ोसी ने हाथ सेंक लिए और घरमालिकों को पता भी नहीं चला

अब सवाल है कि सपा में अखिलेश की यह हालत कैसे हुई? पार्टी का सबसे बड़ा नेता कौन है और क्या सभी चीजें एक लंबे प्रक्रिया का नतीजा मानी जा सकती हैं? फिलहाल सपा की जो भी मजबूत या खराब हालत दिख रही है वह एक दिन का परिणाम बिल्कुल नहीं है. यह एक लंबी प्रक्रिया की वजह से है. यह मुलायम की सक्रियता कम होने और 'हू आफ्टर मुलायम' के बाद अंतहीन उत्तराधिकार के संघर्ष का नतीजा है. राजनीतिक विरासत में उत्तराधिकार का संघर्ष घरेलू किस्म का होता है. अखिलेश-शिवपाल के बीच वर्चस्व की जंग में दिखे घरेलू कलह को अखिलेश ने एक कुशल प्रबंधक की तरह डील किया. मगर अखिलेश शायद एक बात भूल गए कि घरेलू उत्तराधिकार के झगड़ों में हारा हुआ पक्ष कभी कमजोर नहीं पड़ता. हमेशा एक उचित मौके की ताक में रहता है.

azam khanआजम खान और अखिलेश यादव. फ़ाइल फोटो.

शिवपाल के मामले में दुर्भाग्य से वह मौका खुद अखिलेश थाली में सजाकर ले गए. आप कह सकते हैं कि फिलहाल सपा की तमाम खराब दिख रही चीजों की एक बड़ी वजह शिवपाल हैं और इसके लिए शायद ही सबूत देने की जरूरत पड़े. वह दिख रहा है. लेकिन यहां शिवपाल कोई बड़ा फायदा लेते नहीं दिखते. बल्कि असल फायदा यादव कुनबे से बाहर कोई दूसरा उठा रहा है. यह जरूर है कि अखिलेश की तकलीफ से उन्हें (शिवपाल) मजा मिल रहा होगा. यह मजा कुछ साल पहले मिले उनके पुराने जख्मों पर एंटीसैप्टिक की तरह है. जहां तक प्रक्रिया की अवधि की बात है शिवपाल की कोशिशें सपा छोड़ने के बाद से आजम की रिहाई तक जारी रहीं हैं. सपा की राजनीति समझने वालों को गुत्थी सुलझाना मुश्किल नहीं.

आजम ने अखिलेश को उनकी राजनीतिक हद कैसे दिखाई?

अगर सपा के मौजूदा ताकतवर नेता की बात की जाए तो वह निश्चित ही आजम दिख रहे हैं. यह भी मानने में हर्ज नहीं करना चाहिए कि अखिलेश को कभी जितनी तकलीफ शिवपाल ने भी नहीं दी थी, पिछले कुछ दिनों में आजम ने हर मौके पर दी है. बेशुमार तकलीफे और अपमान. सपा पूरी तरह से आजम के कंट्रोल में चल रही है. किसी को लग सकता है कि यह भला कैसे संभव है? रामपुर और आजमगढ़ में लोकसभा के उपचुनाव हो रहे हैं. इनके साथ ही विधानपरिषद के भी चुनाव हैं. आजमगढ़ से तो अखिलेश ने चचेरे भाई धर्मेंद्र यादव को टिकट दे दिया. लेकिन सबसे चौंकाने वाली घटना रामपुर में हुई. यहां सपा की तरफ से आसिम रजा नाम के शख्स को उम्मीदवारी मिली है. बताया जा रहा है कि आसिम ने इससे पहले कभी इतना बड़ा चुनाव नहीं लड़ा है. आसिम के रूप में एक तरह से आजम ही चुनाव लड़ रहे हैं.

आसिम के टिकट की घोषणा पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने नहीं बल्कि खुद आजम ने की. और इसके पीछे संदेश साफ़ था. रामपुर में तो आजम की ही पसंद का नेता मैदान में उतरता. आजम चाहते तो अपने मनपसंद उम्मीदवार का नाम अखिलेश को भेज सकते थे, जिसे वो पार्टी के मंच से विधिवत घोषणा करते. किसी भी पार्टी में करीब करीब ऐसा ही होता है. उन पार्टियों के इतिहास में भी जहां पार्टी चीफ भले ही अंदरुनी तौर पर कमजोर हो, लेकिन नियमों के तहत शीर्ष नेतृत्व से बड़े घोषणा की परंपरा निभाई जाती है. मगर रामपुर के मामले से ऐसा लग रहा है कि आजम ना सिर्फ एकतरफा पसंद तय कर रहे बल्कि यह भी बता रहे हैं कि अब सपा का मतलब अखिलेश नहीं बल्कि आजम खान है. सवाल है कि क्या आजम, मुलायम के नेतृत्व में ऐसा करने की भी सोच भी सकते थे? जवाब नहीं में ही होगा.

आजम खेमा यूपी में विधानसभा चुनाव से पहले और नतीजों के बाद- जिस तरह योजनाबद्ध तरीके से अखिलेश के नेतृत्व को भोथरा करने पर तुले हैं शायद ही अखिलेश उसकी भरपाई कर सकें. यहां तक कि इन चीजों की पूर्व मुख्यमंत्री की भविष्य की योजनाओं पर भी पानी फिरता दिख रहा है. उन्होंने भाजपा से मुकाबले में जो सफल गठबंधन बनाया था, उसकी मजबूत दीवारें भी ढहनी शुरू हो गई हैं. असल में आजम ने विधानपरिषद उम्मीदवारों के लिए भी अखिलेश की पसंद को खारिज कर अपने लोगों के नाम आगे बढ़ा दिए हैं. इमरान मसूद, अखिलेश यादव के भरोसे पर सपा में शामिल हुए थे. उन्हें विधान परिषद में भेजने की तैयारी थी. मसूद के रूप में अखिलेश के मुस्लिम विकल्प को आजम ने एक झटके में खारिज कर दिया. मसूद के बदले जिन शाहनवाज खान शब्बू और जासमीर अंसारी को चुना गया है- दोनों आजम के खासम ख़ास हैं.

महान दल को उम्मीद थी कि उसे विधानपरिषद में शायद भागीदारी मिले. पर ऐसा नहीं हुआ और अब महान दल ने सपा गठबंधन से खुद को अलग कर लिया है. विधानसभा चुनाव में सपा ने सबसे अच्छा प्रदर्शन पूर्वांचल में किया. इसकी सबसे बड़ी वजह ओमप्रकाश राजभर का उनके गठबंधन में शामिल होना रहा. हालांकि खबरें हैं कि राजभर भी विधानपरिषद में भागीदारी को लेकर नाराज हैं. एक तरह से देखें तो आजम की मनमानियों ने भविष्य में सपा गठबंधन पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं.

क्या आजम के बहाने कांग्रेस सीक्रेट मिशन पर है, दुश्मनी निकाल रहे शिवपाल यादव

ऐसा हो सकता है और तमाम सूत्र सीधे कांग्रेस से जाकर जुड़ जाते हैं. असल में सपा के पूर्व मुख्यमंत्री के विरोध में जिस तरह के नैरेटिव साल 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद चलाए गए उनका संकेत तो यही साबित करता है. यह नैरेटिव कांग्रेस की तरफ से ही गढ़ा गया था. भाजपा और बसपा नेताओं के बयानों ने इसे मजबूती दी. धारा 370, नागरिकता क़ानून, राम मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले, ट्रिपल तलाक और किसान आंदोलन के मुद्दे पर अखिलेश कुछ चुनावों में आए जनादेश के बाद बहुत रणनीतिक दिख रहे थे. सॉफ्ट हिंदुत्व का उनका फ़ॉर्मूला और गठबंधन राजनीति में जाने की ओशिश काफी सफल नजर आई. लेकिन कांग्रेस के नैरेटिव और उसपर आए विरोधी बयानों में यह प्रचारित हुआ कि मुस्लिमों के तमाम मुद्दों पर जब आंदोलन हो रहे थे- अखिलेश और उनके निर्देश पर पार्टी कार्यकर्ता घरों में खामोश बैठे थे.अचानक दिखी अखिलेश की सॉफ्ट हिंदुत्व की छवि की वजह से मुसलमानों ने आंख मूंदकर भरोसा कर लिया.

यह जिस वक्त की बात है प्रियंका गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस बहुत आक्रामकता से यूपी में आंदोलन चला रही थी. यह भी कम मजेदार नहीं है कि सार्वजनिक रूप से कांग्रेस की यूपी इकाई ने ही आजम के जेल में बंद होने के मुद्दे को प्रमुखता से उठाया. कुछ कांग्रेसी नेताओं के आजम के घर तक जाने की भी चर्चाएं हुईं. आजम के करीबियों की तरफ से भी उनके नेता के प्रति अखिलेश की चुप्पी को लेकर सरेआम बयान दिए गए. यह नैरेटिव कांग्रेस का था जो समीकरणों के लिहाज से भाजपा और बसपा दोनों के लिए फायदेमंद था. कांग्रेस बसपा की कोशिश थी कि मुस्लिम मतों का हिस्सा टूटकर उनकी तरफ आए और भाजपा बिखराव में अपने लिए बेहतर गुंजाइश देख रही थी. हालांकि मुस्लिम मत आखिर तक सपा के साथ ही एकजुट रहा. बसपा कांग्रेस को कुछ नहीं मिला. लेकिन हिंदू मतों की वजह से भाजपा जीतने में कामयाब रही.

akhilesh-yadav_650_060922085540.jpgजयंत चौधरी अखिलेश यादव.

आजम खान के आरोपों ने विधानसभा में अखिलेश की कमाई को तहस नहस कर दिया

विधानसभा नतीजों के बाद तो यह सिलसिला और बढ़ गया. जबकि सीतापुर जेल में अखिलेश, आजम से मिल चुके थे बावजूद उनकी भूमिका पर निशाना साधा गया. आजम खान की रिहाई से पहले उनके प्रवक्ता के बयानों ने सनसनी मचा दी. उन्होंने सीधे पूर्व मुख्यमंत्री पर ठीकरा फोड़ा और यह साबित करने की कोशिश की कि आजम की खराब हालत के लिए वही जिम्मेदार हैं. अखिलेश की तरफ से कुछ नेताओं ने मिलकर सुलह की कोशिश की बावजूद आजम मुलाक़ात को राजी ही नहीं हुए और उन्हें लौटा दिया गया. जबकि शिवपाल उनतक पहुंचे. जेल से रिहाई के वक्त भी शिवपाल वहां थे. यह वही शिवपाल थे जो नतीजों के ठीक बाद कॉमन सिविल कोड के जरिए राजनीति चमकाने की कोशिश में दिखे थे. यह विषय मुसलमान बिल्कुल पसंद नहीं करते और अपने धार्मिक मामले में सीधा हस्तक्षेप मानते हैं.

रिहाई के वक्त अखिलेश के नहीं पहुंचने को भी मुद्दा बनाया गया. आजम ने तो अखिलेश के लिए इशारों में ना जाने क्या क्या कहा. लगा कि पार्टी टूटने ही वाली है. चूंकि शिवपाल भी उनके साथ थे और उन्होंने भी जिस तरह पूर्व मुख्यमंत्री के नेतृत्व पर सवाल उठाएं थे- सपा का भविष्य अनिश्चित नजर आने लगा था. लोग समझ नहीं पा रहे थे क्या हो रहा है? आजम लखनऊ भी पहुंचे तो उन्होंने पूर्व मुख्यमंत्री से दूरी बनाए रखी. उल्टा जब वे दिल्ली में इलाज के लिए भर्ती थे अखिलेश को हाल लेने पहुंचना पड़ा. इन सबके बीच आजम तमाम इंटरव्यूज में जेल में अपने कथित उत्पीडन के तथ्य बांटते फिरते रहे. इस बीच एक और बड़ी चीज हुई. कपिल सिब्बल को सपा से राज्यसभा का टिकट मिला. यह भी आजम की ही इच्छा थी. क्योंकि कपिल की वजह से ही आजम को बेल मिली है.

आजम के जेल में बंद रहने से लेकर कपिल सिब्बल के कांग्रेस में इस्तीफ़ा देने और सपा की तरफ से टिकट पाने तक की तमाम घटनाएं एक संकेत यह भी देती हैं कि जैसे सभी चीजें कांग्रेस और आजम खान के तालमेल से हो रही हों.

कांग्रेस और बसपा ने क्यों उम्मीदवार नहीं दिए यह भी समझिए

बसपा ने आजमगढ़ लोकसभा चुनाव के लिए उम्मीदवार तो दिया लेकिन रामपुर में नहीं. क्यों? यह बसपा चीफ को ही बेहतर पता हो. लेकिन इसके पीछे भी आजम वजह हैं. असल में आजम के लिए मायवती ने हाल ही में जिस तरह से तारीफ़ की वह मायावती का भविष्य के लिए ऑफर था. मायवती अभी भी आजम के लिए एक विकल्प बनाए रखना चाहती हैं. कांग्रेस ने क्यों नहीं उम्मीदवार उतारा, सवाल जब आजम का है तो इसे समझने में कोई इफ बट नहीं होना चाहिए.

जो अखिलेश यादव चाचा शिवपाल तक को बर्दाश्त नहीं कर पा रहे थे- वह भला शिवपाल-आजम को एक साथ कैसे बर्दाश्त कर पाएंगे? वह भी तब जबकि नतीजों के बाद कुछ चर्चाओं में सपा में बड़ी टूट की आशंका तक जताई जा चुकी है. शिवपाल पूरी तरह से खामोश हैं. शिवपाल की खामोशी, आजम के फैसले और तमाम फैसलों में अखिलेश की किसी भी तरह की भूमिका का ना दिखना- संकेत माना जा सकता है कि आजम इस वक्त समाजवादी पार्टी में सबसे बड़े नेता बन चुके हैं. यह एक तरह से बगावत ही है. शायद अखिलेश रामपुर और आजमगढ़ के नतीजों का इंतज़ार कर रहे हैं. वे उपचुनाव नतीजों में मिले जनादेश के बाद इस संकट का समाधान करने निकले.

हो सकता है कि सपा और कांग्रेस विधानसभा चुनाव के बाद मिलीजुली रणनीति के तहत आगे बढ़ रही हों. हालांकि कई चीजें अभी पूरी तरह से साफ होना बाकी है. शिवपाल का कदम भी महत्वपूर्ण होगा. जो भी हो लेकिन समाजवादी पार्टी भविष्य में दो फाड़ दिशा की तरफ ही बढ़ती दिख रही है. अखिलेश की साख पर आजम एंड कंपनी ने बट्टा लगाने में कामयाबी पाई है. अगर उन्हें पार्टी, खुद के नेतृत्व और यादव मतों पर हनक बरकरार रखना है तो भविष्य में बहुत निर्ममतापूर्ण फैसले लेने पड़ेंगे. इसमें उन्हें नुकसान भी झेलना पड़ सकता है. फिलहाल तो मुलायम का उत्तराधिकारी ऐतिहासिक दबाव का सामना कर रहा है.

लेखक

अनुज शुक्ला अनुज शुक्ला @anuj4media

ना कनिष्ठ ना वरिष्ठ. अवस्थाएं ज्ञान का भ्रम हैं और पत्रकार ज्ञानी नहीं होता. केवल पत्रकार हूं और कहानियां लिखता हूं. ट्विटर हैंडल ये रहा- @AnujKIdunia

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