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Updated: 18 जून, 2022 10:05 PM
देवेश त्रिपाठी
देवेश त्रिपाठी
  @devesh.r.tripathi
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उरी और पुलवामा में हुए आतंकी हमलों का मुंहतोड़ जवाब देते हुए नरेंद्र मोदी सरकार ने सर्जिकल स्ट्राइक और एयर स्ट्राइक की थी. पाकिस्तान समर्थिक आतंकियों की कमर तोड़ने के इस फैसले को पूरे देश ने सिर आंखों पर लिया था. लेकिन, हाल ही में भारतीय सशस्त्र बलों में बहाली के लिए नरेंद्र मोदी सरकार की ओर से लाई गई 'अग्निपथ' योजना का विरोध लगातार बढ़ता जा रहा है. 'अग्निपथ' योजना को तत्काल वापस लेने की मांग करते हुए देश के कई राज्यों में आंदोलनकारियों ने ट्रेनों में आगजनी के साथ ही सार्वजनिक संपत्तियों को नुकसान पहुंचाना शुरू कर दिया है. नरेंद्र मोदी सरकार इसके लिए तैयार नजर नहीं आ रही है. हालांकि, इस साल की भर्ती प्रक्रिया में अधिकतम आयु सीमा को 21 साल से बढ़ाकर 23 कर दिया गया है. लेकिन, इसके बावजूद विरोध-प्रदर्शन थमता नहीं दिख रहा है. इसे देखकर कहा जा सकता है कि मोदी जी...हर फैसले 'सर्जिकल स्ट्राइक' की तरह नहीं होते!

Agnipath Scheme Narendra Modi Government should learn not every decision is like a surgical strikeमोदी सरकार अग्निपथ योजना लागू करने के बाद अब उसमें उम्र सीमा में छूट की बात कर रही है. ये फैसला पहले क्यों नहीं लिया गया?

धारा 370-सीएए से क्यों अलग है सेना भर्ती?

नरेंद्र मोदी सरकार का सीएए लागू करने का फैसला हो या जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटाने का फैसला हो. इन फैसलों को मोदी सरकार ने बिना किसी दिक्कत के लागू कर दिया था. हालांकि, इनका भी विरोध हुआ. लेकिन, इसे लेकर केवल मुस्लिम समुदाय ही सड़कों पर उतरा था. जिसने विरोध को कमजोर कर दिया था. क्योंकि, ये दोनों ही प्रशासनिक फैसले थे. जिस पर सभी लोगों के बीच विरोध नजर नहीं आया था. आसान शब्दों में कहा जाए, तो सरकार को प्रशासनिक फैसले लेने हों, तो किसी को बहुत ज्यादा फर्क नहीं पड़ता है. लेकिन, सेना भर्ती एक ऐसा फैसला है, जो इस देश की एक बड़ी जनसंख्या से जुड़ा हुआ मामला है. सरकार इस मामले में धारा 370 या सीएए जैसे एप्रोच के साथ आगे नहीं बढ़ सकती थी. माना जा सकता है कि धारा 370 और सीएए जैसे फैसलों की जानकारी पहले से ही सार्वजनिक होने पर और व्यापक विरोध का सामना करना पड़ सकता था. लेकिन, सेना भर्ती जैसी पब्लिक पॉलिसी को बनाने से पहले उसके बारे में कुछ जानकारियां पहले से ही स्पष्ट करने से मोदी सरकार को किसने रोका था?

अग्निपथ योजना को लॉन्च करने के दौरान जब अग्निवीरों की सैलरी से लेकर शिक्षा तक की बातें की गई थीं. उसी समय मोदी सरकार की ओर से उम्र सीमा में छूट को लेकर एक लाइन का स्पष्टीकरण क्यों जारी नहीं किया गया? क्या अग्निपथ योजना को मूर्तरूप देने वालों को इस बारे में ज्ञान नहीं था? आंदोलनकारियों द्वारा आगजनी की घटनाओं को अंजाम देने के बाद ही मोदी सरकार का ध्यान इस ओर क्यों गया? क्या दो साल से सेना भर्ती का इंतजार कर रहे युवाओं के बारे में नीति नियंताओं को जानकारी नहीं थी? जबकि, हाल ही में हुए पांच राज्यों के चुनावों के दौरान राजनाथ सिंह के सामने सेना भर्ती को लेकर नारेबाजी भी हुई थी. वैसे, अग्निपथ योजना के तहत 4 साल बाद आवेदन करने वाले 25 फीसदी अग्निवीरों की ही सेना में भर्ती होनी है. तो, बाकी के 75 फीसदी अग्निवीरों को किन नौकरियों या कहां वरीयता दी जाएगी. इसके बारे में भी जानकारी पहले ही दी जा सकती थी. लेकिन, इसके लिए भी युवाओं के भड़कने का इंतजार किया गया.

मोदी सरकार की ओर से लिए गए फैसलों की एक लंबी फेहरिस्त है. जिसमें नोटबंदी, लॉकडाउन और कृषि कानून जैसे फैसलों अचानक ही ले लिए गए. अगर नोटबंदी को ही उदाहरण के तौर पर देखा जाए, तो महीनों तक इसके नियमों में बदलाव किए जाते रहे. संभव है कि अभी इस योजना में मोदी सरकार और फेरबदल करे. क्योंकि, इस योजना के तहत एक साल में कितने लोगों की भर्ती की जाएगी? थल सेना, नौ सेना और वायु सेना के लिए क्या नियम अपनाए जाएंगे? जैसी बातें अग्निपथ योजना की लॉन्चिंग के समय ही स्पष्ट क्यों नहीं कर दी गईं? वैसे, देखना दिलचस्प होगा कि अग्निपथ योजना लागू रहेगी या इसका भी हाल कृषि कानूनों की तरह होगा? क्योंकि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को टीवी पर आकर केवल इतना ही कहना है कि 'मेरी तपस्या में कुछ कमी रह गई.' जबकि, इस तरह के फैसलों से केवल योजना के बारे में जानकारी देकर आसानी से बचा जा सकता है. लेकिन, प्रशासनिक फैसलों की तरह ही पब्लिक पॉलिसी पर भी मोदी सरकार का सर्जिकल स्ट्राइक वाला ही अप्रोच रहता है.

'कानून समझाओ मंत्रालय' बना ही देना चाहिए

अग्निपथ योजना की लॉन्चिंग के बाद भड़की हिंसा और आगजनी की घटनाओं को देखने के बाद ऐसा लग रहा है कि मोदी सरकार को अब एक 'कानून समझाओ मंत्रालय' भी बना ही देना चाहिए. क्योंकि, देश में सीएए लागू होने के बाद हुए दंगे हों या कृषि कानूनों के लागू होने के बाद किसान आंदोलन के जरिये दिल्ली को बंधक बनाने की कोशिश हो. हर मौके पर मोदी सरकार कानून के पहलुओं को आम जनता को समझाने में नाकाम रही है. 'कानून समझाओ मंत्रालय' बनाने से मोदी सरकार की बड़ी समस्या हल हो जाएगी. ऐसी योजनाओं पर आने वाले नए-नए स्पष्टीकरणों के लिए बाकायदा एक मंत्रालय बन जाने से लोग किसी भी विरोध-प्रदर्शन से पहले इस मंत्रालय से संपर्क कर संभावित बदलावों की जानकारी ले सकेंगे. या फिर आगजनी और हिंसा जैसी घटनाओं को जारी रखना है. तो, उसके लिए आराम से प्लानिंग करने का समय भी मिल जाएगा.

लेखक

देवेश त्रिपाठी देवेश त्रिपाठी @devesh.r.tripathi

लेखक इंडिया टुडे डिजिटल में पत्रकार हैं. राजनीतिक और समसामयिक मुद्दों पर लिखने का शौक है.

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