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Updated: 16 मई, 2019 02:31 PM
प्रभाष कुमार दत्ता
प्रभाष कुमार दत्ता
  @PrabhashKDutta
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16 मई राजनीति के इतिहास में काफी मायने रखने वाली तारीख है. कुछ और हो न हो, लेकिन भाजपा के लिए तो ये तारीख इतिहास लिखने वाली ही बन गई थी. 16 मई 2014 को ही भाजपा पूर्ण बहुमत के साथ पांच साल के लिए भारतीय सत्ता की कमान संभालने के लिए चयनित हुई थी. पांच साल पहले नरेंद्र मोदी की लहर ने कई चुनावी पंडितों को चौंका दिया था. भाजप को केंद्र सरकार मिली थी और पिछले 30 सालों में भाजपा एकलौती ऐसी पार्टी बन गई थी जिसे इस तरह का मैंडेट मिला था. कांग्रेस जो 10 सालों से सत्ता में थी वो अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच कर सिर्फ 44 सीटों पर सिमट गई थी.

भाजपा को 282 सीटें मिली थीं और ये 66 प्रतिशत बहुमत था. भाजपा ने 428 लोकसभा संसद क्षेत्रों में अपने उम्मीदवार उतारे थे. विपक्षियों ने उस समय भी भाजपा की जीत को लेकर सवाल उठाए थे और कहा था कि पार्टी को सिर्फ 31 प्रतिशत वोट मिले थे और दावा किया था कि 69 प्रतिशत भारतीय भाजपा के साथ नहीं हैं. पर इस दावे का कोई नतीजा नहीं निकला.

किसी भी पार्टी ने 1991 के चुनाव के बाद से 30% वोट पावर सरकार नहीं बनाई. दो उदाहरण तो उत्तर प्रदेश से भी लिए जा सकते हैं दो देश के सबसे ज्यादा जनसंख्या वाले संसद क्षेत्रों से भरा हुआ है.

बसपा ने 2007 उत्तर प्रदेश चुनावों में बहुमत प्राप्त किया था और तब भी इसे 30 प्रतिशत वोट मिले थे और ऐसे ही सपा ने 2012 में सत्ता हासिल की थी जब उस पार्टी को 29 प्रतिशत वोट मिले थे. ये रिकॉर्ड 2017 में भाजपा द्वारा ही तोड़ा गया था जब उसके पास 39.7 प्रतिशत वोट आए थे और ये उत्तर प्रदेश के पिछले 40 साल के रिकॉर्ड में सबसे ज्यादा था. हालांकि, राज्य चुनावों में भाजपा ने नुकसान झेला, लेकिन 2014 लोकसभा चुनावों में भाजपा को यूपी से 42.7 प्रतिशत वोट मिले थे.

नरेंद्र मोदी को जिताने में 5 कारण अहम रहे जिनकी वजह से मोदी लहर पूरे भारत पर छा गई.नरेंद्र मोदी को जिताने में 5 कारण अहम रहे जिनकी वजह से मोदी लहर पूरे भारत पर छा गई.

तो ऐसा क्या हुआ कि भाजपा 16 मई 2014 को सत्ता में आ गई और नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बन गए?

1. अर्थव्यवस्था की डोर और अच्छे दिन पर जोर-

कांग्रेस-UPA सरकार 2004 में सत्ता में वापस आई थी जब चुनाव के नतीजे ग्रामीण इलाकों की परेशानियों के आधार पर था. उस समय अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा संचालित की जा रही एनडीए सरकार ने ग्रामीण मुद्दों को नजरअंदाज किया था.

अर्थव्यवस्था सही चल रही थी जब मनमोहन सिंह सरकार ने कई पब्लिक वेलफेयर स्कीम लॉन्च की थी जैसे MNREGA, शिक्षा का अधिकार और साथ ही साथ किसानों की कर्जमाफी जैसे दांव खेले गए थे और ये 2009 चुनावों के ठीक पहले हुआ था.

हालांकि, वैश्विक स्थितियां और कांग्रेस सरकार की लीडरशिप में जरूरत से ज्यादा दख्ल (अप्रत्यक्ष तौर पर पार्टी के उपाध्यक्ष राहुल गांधी द्वारा) ने पार्टी की नीतियों को जैसे लकवा लगा दिया.

आर्थिक विकास ठहर गया और महंगाई बढ़ने लगी. प्राइवेट सेक्टर की नौकरियां कम होने लगीं, जीडीपी ग्रोथ कम होने लगी थी और विशेषज्ञों का कहना था कि अब भारत के विकास के दिन खत्म हो गए हैं. राजनीति जमीन तब बदलने को तैयार थी.

चुनाव के समय तक तो विकास एक अहम मुद्दा बन गया था और गुजरात मॉडल का विकास नरेंद्र मोदी को एक उपयुक्त कैंडिडेट बना चुका था. उस समय नरेंद्र मोदी को भारत के आर्थिक विकास के सवाल का उत्तर समझा जाने लगा.

इसी कड़ी में मनमोहन सिंह ने एक आम सभा के दौरान कहा, 'अच्छे दिन आने वाले हैं..' इस नारे का इस्तेमाल भाजपा के प्रधानमंत्री कैंडिडेट यानी नरेंद्र मोदी ने किया और 'अच्छे दिन' वाला नारा कुछ ऐसा हो गया जैसे भारत के अच्छे दिन तभी आएंगे जब पीएम की गद्दी पर नरेंद्र मोदी बैठेंगे.

2. भ्रष्टाचार जिसने यूपीए की कमर तोड़ी और नरेंद्र मोदी को नई छवि दी-

भ्रष्टाचार एक ऐसा मुद्दा था जो यूपीए की सत्ता विरोधी लहर का अहम कारण बना. उस समय यूपीए सरकार अपने ऊपर लगे दाग मिटाने की कोशिश में थी. कॉमनवेल्थ गेम्स स्कैम, 2G स्पेक्ट्रम घोटाला, कोयला घोटाला, VVIP चॉपर घोटाला, आदर्श स्कैम, कैश-फॉर-वोट स्कैम आदि सब यूपीए सरकार के मत्थे थे.

खुद गांधीवादी अन्ना हज़ारे द्वारा भ्रष्टाचार के खिलाफ कैंपेन चलाई गई जिसने पूरे देश के लोगों को अपने साथ ले लिया. इसमें जनलोकपाल का मुद्दा उठा. RTI एक्टिविस्ट और नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं ने इस भ्रष्टाचार विरोधी कैंपेन को और बढ़ावा दिया और आम लोगों में यूपीए सरकार के प्रति गुस्सा और बढ़ता चला गया.

दूसरी तरफ आरएसएस और भाजपा ने नरेंद्र मोदी को एक ऐसे प्रत्याशी के तौर पर पेश किया जो गुजरात में सबसे ज्यादा सालों तक मुख्यमंत्री रहे हैं और भ्रष्टाचार के खिलाफ हैं. एक के बाद एक स्कैम सामने आना मनमोहन सरकार के लिए एक अभिषाप बन गया और मनमोहन सिंह एक कमजोर लीडर साबित हो गए. नरेंद्र मोदी एक बड़े नेता के रूप में उभरे और वोटरों ने उनका स्वागत भी किया.

3. युवा और आकांक्षाओं का सागर-

जब मोदी ने 2014 लोकसभा चुनावों के लिए अपनी कैंपेन शुरू की थी तो उन्होंने सबसे पहला वार यूपीए सरकार पर युवाओं को लेकर ही किया था. मोदी के अनुसार कांग्रेस ने MNREGA के नाम पर युवाओं को खैरात दी थी और भारत के युवा का अपमान किया था.

अपनी रैलियों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वादे किए कि वो लाखों युवाओं को रोजगार संबंधी कौशल सिखाने का इंतजाम करेंगे और उन्हें उद्यमिता का गुर सिखाएंगे. 2014 चुनावों के दौरान 81 करोड़ में से आधे वोटर 35 साल की उम्र से कम थे.

नरेंद्र मोदी के भाषण और चुनावी वादों ने उन्हें युवाओं का हीरो बना दिया और युवाओं की आकांशाएं मोदी के साथ बंध गईं. युवा वोटर बड़ी संख्या में सामने आए और मोदी के लिए वोट किया. ये वोट भाजपा को नहीं मोदी को था.

4. हिंदुत्‍व का बढ़ना-

1980 में अपने गठन के साथ ही भाजपा ने 'कांग्रेस द्वारा मुसलमानों को बहलाना' अपने चुनाव का मुद्दा बना लिया. कैंपेन तब से लेकर अब तक ऐसी ही रही है. भाजपा के इन आरोपों को और बल मिला मनमोहन सिंह के 2006 के नेशनल डेवलपमेंट काउंसिल के बयान से.

उन्होंने कहा, 'हमें ऐसी नीतियां बनाने की जरूरत हैं जिनसे अल्पसंख्यकों को, खासतौर पर मुसलमानों को सशक्तिकरण मिल सके और वो समान अधिकार से विकास का फल ले सकें. उन्हें संसाधनों पर पहला हक मिलना चाहिए.'

भाजपा ने इस बयान को कांग्रेस के खिलाफ इस्तेमाल किया. जब अर्थव्यवस्था बिगड़ी और नौकरियों की कमी हुई तो यही कैंपेन एक नई मिसाल बन गई.

करीब 45000 आरएसएस की शाखाओं ने इस लहर को उठने में मदद किया और ये नरेंद्र मोदी की गुजरात विकास मॉडल वाली छवि के साथ फिट बैठा. उन्हें एक कट्टर हिंदुत्व लीडर बताया गया. एक वीडियो क्लिप जिसमें मोदी मुसलमानों वाली टोपी एक समारोह में पहनने से मना कर रहे थे उसे वायरल किया गया और ये नरेंद्र मोदी की कट्टर हिंदुत्व की छवि के साथ बैठ गया.

5. ब्रांड मोदी-

मनमोहन सिंह के दूसरे कार्यकाल के खत्म होने तक भाजपा ने अपनी लीडरशिप स्थापित कर ली थी. वरिष्ठ सांसद और भाजपा के हिंदुत्व के पोस्टर ब्वॉय रह चुके लाल कृष्ण आडवाणी को बैकसीट पर रखकर नरेंद्र मोदी को भाजपा का सुप्रीम लीडर बना दिया गया. उनके सलाहकार और साथी अमित शाह को उत्तर प्रदेश का जिम्मा सौंप दिया गया. उत्तर प्रदेश में भाजपा ने 1990 के दशक से ही अच्छा प्रदर्शन नहीं किया था.

 नरेंद्र मोदी के साथ-साथ अमित शाह की भी गद्दी बदल गई. नरेंद्र मोदी के साथ-साथ अमित शाह की भी गद्दी बदल गई.

मोदी के चुनाव कैंपेन को चलाने के लिए कई पेशेवर लोगों को लगाया गया. उसमें IT प्रोफेशनल्‍स का अहम योगदान रहा. भाजपा ने सभी रैलियों की लाइव फीड पेश की और मोदी का भाषण कई चैनलों के लिए आसानी से पहुंचाया गया.

भाजपा कार्यकर्ताओं को मोदी की रैलियों में ज्यादा जोश दिखाने को कहा गया. उस समय 'मोदी-मोदी' का नारा चारों ओर गूंजने लगा. ऐसी चुनाव कैंपेन देश में पहले नहीं देखी गई थी और एक-एक पोलिंग बूथ तक सब कुछ इलेक्ट्रॉनिक हो चुका था. इसी समय कांग्रेस और अन्य पार्टियों को मौकी की नजाकत समझ आने लगी. ये पार्टियां चुनाव शुरू होने से पहले ही चुनाव हार चुकी थीं.

मनमोहन सिंह को एक कमजोर लीडर बताने वाली कैंपेन ने मोदी को एक मजबूत नेता साबित कर दिया. उसी समय 8 जनवरी 2014 को पाकिस्तानी सेना की बॉर्डर एक्शन टीम ने भारतीय सीमा लांघकर दो जवानों को मार डाला. जम्मू कश्मीर के पूंछ इलाके में हुई इस घटना में एक जवान का सिर काटकर ले पाकिस्तान ले जाया गया था.

भाजपा लीडर सुषमा स्वराज की तरफ से इस घटना का भरपूर विरोध किया गया और यूपीए सरकार को चैलेंज दिया गया कि वो दूसरी ओर से 10 सिर काटकर लाएं. उसी महीने में उत्तर प्रदेश में हुई एक रैली में पीएम मोदी के 56 इंची सीने की मिसाल सामने आई. ये बात थी उत्तर प्रदेश जैसे पिछड़े इलाके को भी गुजरात जैसा विकसित बनाने की. 56 इंच वाला कमेंट मजबूत लीडर होने से जोड़ा गया और मोदी जीत गए.

2014 लोकसभा चुनाव 9 फेज में हुए थे 7 अप्रैल से 12 मई तक और चुनाव के नतीजे 16 मई को घोषित हुए. नरेंद्र मोदी ने 26 मई 2014 को प्रधानमंत्री पद की शपथ ली.

(प्रभाष के. दत्ता ने ये स्टोरी सबसे पहले IndiaToday वेबसाइट के लिए की थी.)

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लेखक

प्रभाष कुमार दत्ता प्रभाष कुमार दत्ता @prabhashkdutta

लेखक इंडिया टुडे डिजिटल में असिस्टेंट एडीटर हैं.

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