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Indian Hockey ने जो मुकाम पाया, वो टीम का सामर्थ्य और नवीन पटनायक का सहयोग ही है!

    • रीवा सिंह
    • Updated: 04 अगस्त, 2021 08:23 PM
  • 04 अगस्त, 2021 08:23 PM
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भारतीय पुरुष हॉकी टीम की तारीफ हो रही है. खिलाड़ी वहां तक खेले हैं तो सिर्फ़ अपने सामर्थ्य पर और नवीन पटनायक के सहयोग से. देश इस स्थिति में ही नहीं है कि आंकलन करे, क्योंकि भारतीय हॉकी के हिस्से में जो भी आया या नहीं आया, उसकी किसी को भनक ही नहीं लगी है.

पुरुष हॉकी टीम यहां तक पहुंची यह कहीं से कम नहीं है. कांस्य पदक की उम्मीद फ़िलहाल है लेकिन यह उम्मीद है, खिलाड़ियों पर दबाव नहीं है. उनके लगन व परिश्रम का सम्मान, उनकी अस्मिता हमपर ड्यू (देय) है जो उन्हें दिया जाना है. यह भी क्या कम है कि खिलाड़ियों ने सुबह के सात बजे पूरे देश को उठाकर टीवी के सामने बिठा दिया कि देखो, अब और अनदेखे नहीं किये जा सकेंगे हम. किसी खेल से कोई तुलना नहीं लेकिन क्रिकेट फ़ीवर में गोते लगाने वाला देश आज हॉकी स्टिक की भाषा समझ रहा था तो इसका श्रेय न जीएस की किताबों को जाता है, न प्रतियोगी परीक्षाओं को और न खेल के प्रति हमारी सरकार के रुझान को. यह खिलाड़ियों के संघर्ष व खेल का ही परिणाम है कि आज हॉकी टीम के कप्तान के अलावा भी 4-5 नाम सभी को याद हो गये. वो नाम जो खेलप्रेमी देश के लिए कल तक शून्य में समाहित थे.

आज पुरुष हॉकी टीम जिस मुकाम पर पहुंची वो कहीं से भी कम नहीं है

खिलाड़ी वहां तक खेले हैं तो सिर्फ़ अपने सामर्थ्य पर और नवीन पटनायक के सहयोग से. देश इस स्थिति में ही नहीं है कि आंकलन करे, अपना आंकलन कर सके यह आवश्यक है. यह भी नहीं कि उन्हें उनका सम्मान व संसाधन देश ने नहीं दिया इसलिए सहानुभूतिवश इस हार पर हौसला-अफ़ज़ाई करनी है. खिलाड़ियों का यहां तक पहुंचकर डंका बजाना वाकई सराहनीय है.

ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन को मात देना हमेशा दूर की कौड़ी रही है और वह इन्होंने कर दिखाया है. दूसरी ओर यह ध्यान देने वाली बात है कि हम ओलंपिक्स में मेन्स हॉकी और विमेन्स हॉकी लिख-पढ़ रहे हैं. क्रिकेट में यह भिन्न है, वहां क्रिकेट होता है और विमेन्स क्रिकेट होता है. मतलब पुरुष का क्रिकेट सर्वस्व समाहित किये हुए सार्वभौमिक सत्य होता है और फिर आता है विमेन्स क्रिकेट जो महिलाओं के लिये है, जिसके प्रति रुझान हाल के...

पुरुष हॉकी टीम यहां तक पहुंची यह कहीं से कम नहीं है. कांस्य पदक की उम्मीद फ़िलहाल है लेकिन यह उम्मीद है, खिलाड़ियों पर दबाव नहीं है. उनके लगन व परिश्रम का सम्मान, उनकी अस्मिता हमपर ड्यू (देय) है जो उन्हें दिया जाना है. यह भी क्या कम है कि खिलाड़ियों ने सुबह के सात बजे पूरे देश को उठाकर टीवी के सामने बिठा दिया कि देखो, अब और अनदेखे नहीं किये जा सकेंगे हम. किसी खेल से कोई तुलना नहीं लेकिन क्रिकेट फ़ीवर में गोते लगाने वाला देश आज हॉकी स्टिक की भाषा समझ रहा था तो इसका श्रेय न जीएस की किताबों को जाता है, न प्रतियोगी परीक्षाओं को और न खेल के प्रति हमारी सरकार के रुझान को. यह खिलाड़ियों के संघर्ष व खेल का ही परिणाम है कि आज हॉकी टीम के कप्तान के अलावा भी 4-5 नाम सभी को याद हो गये. वो नाम जो खेलप्रेमी देश के लिए कल तक शून्य में समाहित थे.

आज पुरुष हॉकी टीम जिस मुकाम पर पहुंची वो कहीं से भी कम नहीं है

खिलाड़ी वहां तक खेले हैं तो सिर्फ़ अपने सामर्थ्य पर और नवीन पटनायक के सहयोग से. देश इस स्थिति में ही नहीं है कि आंकलन करे, अपना आंकलन कर सके यह आवश्यक है. यह भी नहीं कि उन्हें उनका सम्मान व संसाधन देश ने नहीं दिया इसलिए सहानुभूतिवश इस हार पर हौसला-अफ़ज़ाई करनी है. खिलाड़ियों का यहां तक पहुंचकर डंका बजाना वाकई सराहनीय है.

ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन को मात देना हमेशा दूर की कौड़ी रही है और वह इन्होंने कर दिखाया है. दूसरी ओर यह ध्यान देने वाली बात है कि हम ओलंपिक्स में मेन्स हॉकी और विमेन्स हॉकी लिख-पढ़ रहे हैं. क्रिकेट में यह भिन्न है, वहां क्रिकेट होता है और विमेन्स क्रिकेट होता है. मतलब पुरुष का क्रिकेट सर्वस्व समाहित किये हुए सार्वभौमिक सत्य होता है और फिर आता है विमेन्स क्रिकेट जो महिलाओं के लिये है, जिसके प्रति रुझान हाल के दिनों में बढ़ा है.

हॉकी में पुरुष और महिला टीम में से किसी एक को वरीयता नहीं दी जा रही तो इसका श्रेय भी हमारी सहृदयता अथवा लैंगिक-समानता वाले भाव को नहीं जाता, हमने दोनों को बराबर रखकर किसी पर कोई एहसान नहीं किया. दोनों खिलाड़ियों ने बादल चीरकर खींच ली है अपने हिस्से की रौशनी और ख़ुद कमाया है यह शौर्य व सम्मान. हौंक दिया है इस बार.

बहुत कुछ हो गया है और हो रहा है जिसका होना बाकी था. अबकि जब खिलाड़ी लौटें तो उनका ख़ूब अभिवादन हो, उन्हें स्पॉन्सरशिप के लिये मुंह न ताकना पड़े, खेल की भावना को बल मिले और सराहना भी और उन्हें मिले वह सबकुछ जो हम पर ऋण है.

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इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. ये जरूरी नहीं कि आईचौक.इन या इंडिया टुडे ग्रुप उनसे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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