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काश मेरे पास वो सब न होता जिसकी वजह से मैं लड़की हूं

    • श्रुति दीक्षित
    • Updated: 07 जनवरी, 2018 12:32 PM
  • 22 दिसम्बर, 2017 05:24 PM
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हर लड़की अपने जीवन में कभी न कभी ये तो जरूर सोचती है कि काश उसके ये ब्रेस्‍ट न होते... काश ये वजाइना न होती... काश वो लड़की ही न होती... यानी शरीर के वो हिस्‍से जो लड़कियों को लड़की बनाते हैं, वही उसे परेशानी का कारण भी दे जाते हैं.

जी.. ये मेरे मन की इच्छा है..

अगर मेरे पास Vagina न होती तो शायद जिंदगी काफी बेहतर हो सकती थी. सुबह की शुरुआत हर रोज किसी न किसी लड़की, महिला, बहन, बेटी, मां के रेप की खबर सुनने को मिलती है. न चाहते हुए भी एक डर सा मन में बैठ जाता है कि कहीं मेरे साथ ये न हो जाए. ये डर अधिकतर लोग नहीं समझ पाएंगे.. फेमिनिस्ट तो इसे बिलकुल भी नहीं समझ पाएंगे. ये डर है Vagina होने का डर.

वजाइना ही क्‍यों ? सुबह उठना और जल्दी नहा लेना क्योंकि परिवार के बाकी लोगों के लिए बाथरूम खाली करना है, नाश्ता, खाना, टिफिन, दूध सबका ख्याल रखना और फिर आधा अधूरा खाकर काम के लिए निकल जाना. ये तो चलिए कोई बात नहीं, असली संघर्ष तो घर से निकलने के बाद शुरू होता है. मेट्रो में लेडीज कम्पार्टमेंट तक पहुंचने के लिए तेज भागना होता है. कारण.. अगर गलती से जनरल कम्पार्टमेंट में चढ़ गई तो न जाने कितने ही लोगों की नजरों का शिकार होना पड़ेगा, न जाने कितने हाथ मेरे जिस्म को छुएंगे, न जाने कितने लोग जानकर धक्का मार कर जाएंगे.

ऑफिस पहुंचने पर अगर जरा भी कपड़ा अस्त-व्यस्त हो गया तो बहुत से लोगों की निगाहें मुझपर होंगी. उसपर गलती से अगर ब्रा की स्ट्रिप दिख गई तब तो यकीनन मैं कई लोगों के जहन में आ जाऊंगी. कभी-कभी कुछ लोगों की शक्लें देखकर लगता है कि मेरे बारे में भगवान ही जाने क्या क्या सोचते हैं. शक्ल से किसी के बारे में राय बनाना गलत है, लेकिन कपड़ों को देखकर राय बनाना भी तो गलत ही है.

खैर, जब दिन की शुरुआत हर रोज ऐसी हो तो आगे क्या कहा जाए... ऑफिस में दिन भर इतने लोग मिलने आते हैं. हंसकर बात करने के बहाने उनकी निगाहें क्या तलाश रही होती हैं, या फिर उनके उनके दिमाग में क्या चल रहा होता है ये पता लगाना कोई बहुत मुश्किल नहीं होता. सिर्फ इतना ही नहीं, दिन भर लड़की होने के ताने...

जी.. ये मेरे मन की इच्छा है..

अगर मेरे पास Vagina न होती तो शायद जिंदगी काफी बेहतर हो सकती थी. सुबह की शुरुआत हर रोज किसी न किसी लड़की, महिला, बहन, बेटी, मां के रेप की खबर सुनने को मिलती है. न चाहते हुए भी एक डर सा मन में बैठ जाता है कि कहीं मेरे साथ ये न हो जाए. ये डर अधिकतर लोग नहीं समझ पाएंगे.. फेमिनिस्ट तो इसे बिलकुल भी नहीं समझ पाएंगे. ये डर है Vagina होने का डर.

वजाइना ही क्‍यों ? सुबह उठना और जल्दी नहा लेना क्योंकि परिवार के बाकी लोगों के लिए बाथरूम खाली करना है, नाश्ता, खाना, टिफिन, दूध सबका ख्याल रखना और फिर आधा अधूरा खाकर काम के लिए निकल जाना. ये तो चलिए कोई बात नहीं, असली संघर्ष तो घर से निकलने के बाद शुरू होता है. मेट्रो में लेडीज कम्पार्टमेंट तक पहुंचने के लिए तेज भागना होता है. कारण.. अगर गलती से जनरल कम्पार्टमेंट में चढ़ गई तो न जाने कितने ही लोगों की नजरों का शिकार होना पड़ेगा, न जाने कितने हाथ मेरे जिस्म को छुएंगे, न जाने कितने लोग जानकर धक्का मार कर जाएंगे.

ऑफिस पहुंचने पर अगर जरा भी कपड़ा अस्त-व्यस्त हो गया तो बहुत से लोगों की निगाहें मुझपर होंगी. उसपर गलती से अगर ब्रा की स्ट्रिप दिख गई तब तो यकीनन मैं कई लोगों के जहन में आ जाऊंगी. कभी-कभी कुछ लोगों की शक्लें देखकर लगता है कि मेरे बारे में भगवान ही जाने क्या क्या सोचते हैं. शक्ल से किसी के बारे में राय बनाना गलत है, लेकिन कपड़ों को देखकर राय बनाना भी तो गलत ही है.

खैर, जब दिन की शुरुआत हर रोज ऐसी हो तो आगे क्या कहा जाए... ऑफिस में दिन भर इतने लोग मिलने आते हैं. हंसकर बात करने के बहाने उनकी निगाहें क्या तलाश रही होती हैं, या फिर उनके उनके दिमाग में क्या चल रहा होता है ये पता लगाना कोई बहुत मुश्किल नहीं होता. सिर्फ इतना ही नहीं, दिन भर लड़की होने के ताने किसी न किसी रूप में सुनने को मिल जाते हैं. काम का प्रेशर और घर का प्रेशर दोनों झेलने वाली लड़की न तो अपने पसंद की शिफ्ट कर सकती है न ही किसी काम को मना करने की ताकत रखती है. कारण ये नहीं कि वो कमजोर है, बल्कि कारण ये है कि अगर उसने ऐसा किया तो सिर्फ एक ही बात सुनने मिलेगा.. 'यार तुम लड़कियों को हमेशा कोई न कोई दिक्कत रहती है.'

ऑफिस के आम दिन तो वैसे भी परेशान करने वाले होते हैं, इसपर अगर पीरियड्स हों तो यकीन मानिए दिन और भी मुश्किल हो जाता है. एक उंगली पर जरा सा कट जाए तो लोगों को कितनी समस्या होती है ऐसे में महीने के 5-6 दिन लगातार जब किसी को ब्लीडिंग होती रहे तो क्या सोचा जा सकता है कि कैसी हालत होती है? चिढ़, दर्द, हाईजीन सब एक तरफ और ऑफिस में किसी तरह से पैड बाथरूम तक लेकर जाने की समस्या एक तरफ. ताड़ने वाली निगाहें तो तब भी पीछा नहीं छोड़ती हैं.

दिन भर की खीज जो मन में लिए वापस जाते हैं तभी ये समझ आ जाता है कि अभी और भी मुश्किल समय बाकी है. शाम को तो मनचलों का भी समय होता है न. अंधेरा घिरते ही वो भी सामने आ जाते हैं. एक तरह से वापस घर की चार दीवारी में जाना सुबह बाहर निकलने से ज्यादा मुश्किल होता है. मनचलों की फौज चौराहों पर खड़ी होती है, शेयरिंग ऑटो में साथ बैठती है. शायद इसकी गिनती ही नहीं की जा सकती कि दिन में कितनी निगाहें एक शरीर पर टिकी होती हैं. कितने लोग फायदा उठाने की कोशिश करते हैं. कोई ब्रेस्ट को हाथ लगाएगा तो कोई बालों को सूंघेगा.

मेट्रो स्टेशन पर भीड़ ज्यादा होती है. धक्का भी ज्यादा लगता है. कोई कहीं से हाथ मारता है, लेकिन हमे तो आगे बढ़ना है. आखिर यही तो दस्तूर है. जैसे तैसे थक हार कर घर पहुंचते हैं. तो फिर वही. लोग अपने भूखे पेट की दुहाई देते हैं और ताने मिलते हैं कि आखिर क्यों इतनी देर हो गई. घर पहुंच कर खाना बनाओ और पूरा काम करो. थक हारकर जब बिस्तर पर जाओ तो एक और रस्म निभानी पड़ती है. पति को खुश करने की रस्म. यही तो होता है जब आपके पास वजाइना हो. ब्रेस्ट हों. जब आप एक लड़की हों. 

हर रोज अखबार में न्यूज चैनल में ऐसी खबरें दिखती हैं जो शायद इस बात का संकेत देती हैं कि लड़कियों को लड़की होने की सजा मिल रही है. जरा सोचिए क्या बीती होगी निर्भया पर जब उसके साथ ये बर्बरता की गई तो. क्या बीती होगी उस 4 साल की बच्ची पर जब उसकी वजाइना में लकड़ी डाली गई. जी हां, उस गुप्तांग को वजाइना कहते हैं. इसी वजाइना से पुरुष निकलते हैं और अपनी पूरी जिंदगी इसी के साथ खिलवाड़ करने में निकाल देते हैं. उस दर्द की कल्पना भी नहीं की जा सकती जो पूरी जिंदगी में एक लड़की को सिर्फ इसलिए झेलना पड़ता है क्योंकि उसके पास लड़कियों वाले अंग हैं. किसी बच्ची के अधकचरे ब्रेस्ट को सिर्फ इसलिए दबा दिया जाता है क्योंकि वो लड़की है. कोई लड़की कितनी तकलीफों को सहती है. 

कुछ कहते हैं देखने का तरीका अलग है, कुछ कहते हैं ये निराशाजनक है... पर अगर पूरी जिंदगी सिर्फ यही है और इसी डर के साथ जीना है कि कहीं किसी को आपके शरीर की तलब न लग जाए. तो मैं बेहतर है यही कहूंगी कि काश मैं लड़की न होती, काश मेरे पास ब्रेस्ट न होती, काश मेरी वजाइना नहीं होती...

(ये खत एक अनाम लड़की द्वारा लिखा गया है जिसने अपना दर्द बयान करने की कोशिश की है, पर शायद ये एक सच्चाई है जो सभी लड़कियों के मन की बात कहता है.)

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इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. ये जरूरी नहीं कि आईचौक.इन या इंडिया टुडे ग्रुप उनसे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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