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6 भटकी हुई बहस जिससे बड़ी आबादी एकजुट हुई...

    • अमित अरोड़ा
    • Updated: 23 नवम्बर, 2017 06:05 PM
  • 23 नवम्बर, 2017 06:05 PM
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पिछले 2-3 सालों में कुछ ऐसी घटनाएं हुई हैं जिन्होनें भारत के बहुसंख्यक वर्ग को हैरान कर दिया है. जाति के आधार पर बंटे इस वर्ग को इन घटनाओं ने एकजुट कर दिया है.

पिछले 2-3 सालों में कुछ ऐसी घटनाएं हुई हैं जिन्होनें भारत के बहुसंख्यक वर्ग को हैरान कर दिया है. जाति के आधार पर बंटे इस वर्ग को इन घटनाओं ने एकजुट कर दिया है.

आइए जानें क्या हैं वो घटनाएं:

योग दिवस को हिंदूवादी सोच का नतीजा कहना:

विश्व ने अपनाया देश में ही विरोध

भारत सरकार की पहल पर 21 जून 2015 से अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के रूप में विश्वभर में मनाया जा रहा है. इस पहल का दुनिया भर में स्वागत किया गया, लेकिन भारत में कई लोग इसका विरोध कर रहे हैं. योग दिवस को मुस्लिम समाज के ऊपर हिंदू एजेंडा थोपने के रूप में भी प्रस्तुत किया गया. जब तर्क के आधार पर योग दिवस का विरोध मुमकिन नहीं हुआ तो उसका मज़ाक भी उड़ाया गया.

असहिष्णुता की बहस:

मौत पर सियासत

सितंबर 2015 में उत्तर प्रदेश के दादरी में मोहम्मद अख़लाक़ की हत्या कर दी गई थी. अख़लाक़ की हत्या इस शक में कर दी गई थी कि उसने गाय के मांस खाया था. मामले के सुनवाई कोर्ट में हो रही है, इसलिए अभी इसके पक्ष-विपक्ष में कहना ग़लत होगा. लेकिन इस एक घटना को ऐसे पेश किया गया जैसे पूरे देश में मार-काट मची पड़ी है. एक एजेंडा के तहत यह दिखाने का प्रयास किया गया कि भारत में अल्पसंख्यक वर्ग डर में जी रहा है. कथित बुद्धिजीवियों ने अपने पुरस्कार वापस कर देश को बदनाम करने की कोशिश की. तो वहीं आमिर ख़ान जैसे कलाकार भारत में असहिष्णुता के नाम पर देश छोड़कर जाने की धमकी देने लगे.

जेएनयू में भारत विरोधी...

पिछले 2-3 सालों में कुछ ऐसी घटनाएं हुई हैं जिन्होनें भारत के बहुसंख्यक वर्ग को हैरान कर दिया है. जाति के आधार पर बंटे इस वर्ग को इन घटनाओं ने एकजुट कर दिया है.

आइए जानें क्या हैं वो घटनाएं:

योग दिवस को हिंदूवादी सोच का नतीजा कहना:

विश्व ने अपनाया देश में ही विरोध

भारत सरकार की पहल पर 21 जून 2015 से अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के रूप में विश्वभर में मनाया जा रहा है. इस पहल का दुनिया भर में स्वागत किया गया, लेकिन भारत में कई लोग इसका विरोध कर रहे हैं. योग दिवस को मुस्लिम समाज के ऊपर हिंदू एजेंडा थोपने के रूप में भी प्रस्तुत किया गया. जब तर्क के आधार पर योग दिवस का विरोध मुमकिन नहीं हुआ तो उसका मज़ाक भी उड़ाया गया.

असहिष्णुता की बहस:

मौत पर सियासत

सितंबर 2015 में उत्तर प्रदेश के दादरी में मोहम्मद अख़लाक़ की हत्या कर दी गई थी. अख़लाक़ की हत्या इस शक में कर दी गई थी कि उसने गाय के मांस खाया था. मामले के सुनवाई कोर्ट में हो रही है, इसलिए अभी इसके पक्ष-विपक्ष में कहना ग़लत होगा. लेकिन इस एक घटना को ऐसे पेश किया गया जैसे पूरे देश में मार-काट मची पड़ी है. एक एजेंडा के तहत यह दिखाने का प्रयास किया गया कि भारत में अल्पसंख्यक वर्ग डर में जी रहा है. कथित बुद्धिजीवियों ने अपने पुरस्कार वापस कर देश को बदनाम करने की कोशिश की. तो वहीं आमिर ख़ान जैसे कलाकार भारत में असहिष्णुता के नाम पर देश छोड़कर जाने की धमकी देने लगे.

जेएनयू में भारत विरोधी नारे:

ऐसे बुद्धिजीवी किस काम के?

फ़रवरी 2016 में जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में कुछ छात्रों ने संसद हमले के दोषी आतंकवादी अफजल गुरु की बरसी मनाई और इस मौके पर देश विरोधी नारे भी लगाए. किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि देश की राजधानी में ऐसी भारत विरोधी सोच पनप रही होगी| इतना ही नहीं भारत के कई विपक्षी राजनीतिक दलों ने बोलने की आज़ादी का तर्क देकर, देश विरोधी नारे लगाने वाले छात्रों का समर्थन भी किया. देश की सामान्य जनता यह देख कर हैरान थी कि कैसे कुछ राजनीतिक दल भारत विरोधी सोच का खुले आम साथ दे रहे हैं.

भारतीय सेना की सर्जिकल स्ट्राइक पर सवाल उठना:

सेना पर भी सवाल खड़ा करने वाले जाने किस मिट्टी के बने होते हैं

भारतीय सेना ने उरी आतंकवादी हमले का बदला लेने के लिए सितम्बर 2016 में पाकिस्तान के विरुद्ध सर्जिकल स्ट्राइक किया था. सर्जिकल स्ट्राइक कामयाब रही. भारतीय सेना की यह सफलता कुछ लोगों को रास नहीं आई, और उन्होनें सेना की सर्जिकल स्ट्राइक का ही प्रमाण मांगना शुरू कर दिया. उन्हें अपनी ही सेना की बात पर भरोसा नहीं था. तब ऐसा लगा कि मानो ये लोग पाकिस्तान की भाषा बोल रहे हैं.

धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों पर न्यायालयों के फ़ैसले:

कोर्ट के एकतरफे फैसले

महाराष्ट्र में होने वाले दही-हांडी कार्यक्रम की ऊंचाई को लेकर न्यायालयों के फ़ैसले. तमिलनाडु में जल्लीकट्टू पर रोक. इस साल दीवाली से ठीक पहले दिल्ली में पटाखों की बिक्री पर लगी रोक. न्यायालयों के इन फ़ैसलों को बहुसंख्यक वर्ग ने बड़े भारी मन से स्वीकार किया.

चाहे न्यूयॉर्क टाइम्स द्वारा साड़ी में हिंदू राष्ट्रवाद ढूंढ लेना हो; 'पीके', 'पद्मावती' जैसी फ़िल्में बनाना हो; सेक्सी 'दुर्गा' जैसी फ़िल्मों के नाम रखना हो; 'सेक्सी राधा' जैसे गाने फ़िल्मों में डालना हो, बहुसंख्यक वर्ग की धार्मिक भावनाओं को लगातार आहत किया जा रहा है.

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इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं. ये जरूरी नहीं कि आईचौक.इन या इंडिया टुडे ग्रुप उनसे सहमत हो. इस लेख से जुड़े सभी दावे या आपत्ति के लिए सिर्फ लेखक ही जिम्मेदार है.

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