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1991 आर्थिक नीति के 30 साल: हमारे पास मां है, बंगला है, गाड़ी है, बैंक बैलेंस है!

    • शरत कुमार
    • Updated: 26 जुलाई, 2021 07:05 PM
  • 26 जुलाई, 2021 07:05 PM
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आज देश इकनॉमिक रिफॉर्म जिसे नई आर्थिक नीति भी कहा जाता है उसके तीसरी वर्षगांठ पर खड़ा है.1991 की नई आर्थिक नीति के बाद देश ने क्या खोया क्या पाया इसे लेकर लंबी बहस चल रही है. भारत ने कितनी आर्थिक तरक़्क़ी की और कितनी होनी चाहिए थी इसे नापने का पैमाना भारत के आर्थशास्त्रियों और राजनीतिशास्त्रियों का अलग अलग है.

भारत के सौ सालों के इतिहास पर नज़र डालें तो हिंदुस्तान को सामाजिक और आर्थिक बदलाव के नज़रिए से अलग अलग काल खंडों में बांटा जा सकता है. मगर मोटे तौर पर अगर खाका खींचें तो बदलाव की बयार पिछले सौ सालों में दो ही बार आयी है जिसने सही मायने में हिंदुस्तान के संस्कार को बदलकर रख दिया है. सबसे पहले देश का मिज़ाज तब बदलना शुरू हुआ था, जब 1925 में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी अस्तित्व में आए थे. वह दौर था जब देश के जन मानस पर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी अपनी अटूट छाप छोड़ रहे थे. मगर आज का दिन 1925 के बाद के भारत पर चर्चा का नहीं है. आज देश इकनॉमिक रिफॉर्म जिसे नई आर्थिक नीति भी कहा जाता है उसके तीसरी वर्षगांठ पर खड़ा है.1991 की नई आर्थिक नीति के बाद देश ने क्या खोया क्या पाया इसे लेकर लंबी बहस चल रही है. कोई कह रहा है कि जंजीरों में जकड़ा हुआ भारत दौड़ पड़ा था, दौड़ने की आदत कभी नहीं रही इसलिए गिर पड़ा है, कोई कह रहा है थक गया है. तो कोई कह रहा है यह लंबी सुस्ती के बाद एक बार फिर से दौड़ने वाला है. भारत ने कितनी आर्थिक तरक़्क़ी की और कितनी होनी चाहिए थी इसे नापने का पैमाना भारत के आर्थशास्त्रियों और राजनीतिशास्त्रियों का अलग अलग है.

जैसा अर्थव्यवस्था में सुधार हुआ है पिछले 30 साल भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण साबित हुए हैं

भारत बदला क्योंकि बदलने की बड़ी मजबूरी थी. भारत के लिए उस दीवार को गिराने की मजबूरी थी जिस दिवार के एक तरफ़ अमिताभ बच्चन खड़े होकर कह रहे थे कि हमारे पास गाड़ी है, बंगला है, बैंक बैलेंस है और दीवार की दूसरी तरफ़ शशि कपूर कह रहे थे कि और मेरे पास मां है. मां के पास कुटिया में बैठे भारत के श्रवण कुमार को अब पेट पालना मुश्किल हो रहा था.

तब वह दौर आया जब दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे का पिता...

भारत के सौ सालों के इतिहास पर नज़र डालें तो हिंदुस्तान को सामाजिक और आर्थिक बदलाव के नज़रिए से अलग अलग काल खंडों में बांटा जा सकता है. मगर मोटे तौर पर अगर खाका खींचें तो बदलाव की बयार पिछले सौ सालों में दो ही बार आयी है जिसने सही मायने में हिंदुस्तान के संस्कार को बदलकर रख दिया है. सबसे पहले देश का मिज़ाज तब बदलना शुरू हुआ था, जब 1925 में राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ और भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी अस्तित्व में आए थे. वह दौर था जब देश के जन मानस पर राष्ट्रपिता महात्मा गांधी अपनी अटूट छाप छोड़ रहे थे. मगर आज का दिन 1925 के बाद के भारत पर चर्चा का नहीं है. आज देश इकनॉमिक रिफॉर्म जिसे नई आर्थिक नीति भी कहा जाता है उसके तीसरी वर्षगांठ पर खड़ा है.1991 की नई आर्थिक नीति के बाद देश ने क्या खोया क्या पाया इसे लेकर लंबी बहस चल रही है. कोई कह रहा है कि जंजीरों में जकड़ा हुआ भारत दौड़ पड़ा था, दौड़ने की आदत कभी नहीं रही इसलिए गिर पड़ा है, कोई कह रहा है थक गया है. तो कोई कह रहा है यह लंबी सुस्ती के बाद एक बार फिर से दौड़ने वाला है. भारत ने कितनी आर्थिक तरक़्क़ी की और कितनी होनी चाहिए थी इसे नापने का पैमाना भारत के आर्थशास्त्रियों और राजनीतिशास्त्रियों का अलग अलग है.

जैसा अर्थव्यवस्था में सुधार हुआ है पिछले 30 साल भारत के लिए बहुत महत्वपूर्ण साबित हुए हैं

भारत बदला क्योंकि बदलने की बड़ी मजबूरी थी. भारत के लिए उस दीवार को गिराने की मजबूरी थी जिस दिवार के एक तरफ़ अमिताभ बच्चन खड़े होकर कह रहे थे कि हमारे पास गाड़ी है, बंगला है, बैंक बैलेंस है और दीवार की दूसरी तरफ़ शशि कपूर कह रहे थे कि और मेरे पास मां है. मां के पास कुटिया में बैठे भारत के श्रवण कुमार को अब पेट पालना मुश्किल हो रहा था.

तब वह दौर आया जब दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे का पिता अपनी बेटी सिमरन से कहता है कि जा सीमरन जा, जी ले अपनी ज़िंदगी. सीमरन अपने सपनों के साथ दौड़ तो पड़ी. मगर उसके बाद कि उसकी ज़िंदगी कैसी है? यह किसी को पता नहीं. यक़ीन मानिए 1991 नई आर्थिक नीति के बाद भारत. वह भारत नहीं रहा ज़िसके सांचे में ढालक परिवार और समाज ने व्यक्ति निर्माण किया जाता था.

भले यह नहीं कहा जा सकता कि सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा ने भारतीयों को बनाने का कोई नया फ़ार्म तैयार किया हो. पर यह भी नहीं कह सकते कि वह वही हिन्दुस्तान के लोग हैं जो इससे पहले अपने स्वभाव और संस्कार के लिए जाने जाते थे. सिर में सरसों का तेल लगाकर शर्ट के ऊपर वाला बटन बंद कर चुपचाप पढ़ाई करने वाला गांव का लायक़ बच्चा अब गांव में होनहार नहीं कहा जाता.

जो जितना बकर-बकर करे उसकी क़ाबिलीयत उतनी होने लगी. समाज में जीने का एक मात्र ध्येय पैसा कमाना हो गया. लालची, धूर्त और मक्कारों की एक ऐसी पौध तैयार हुई जिसके आगे CBI, ED और एंटी करप्शन ब्यूरो जैसे संस्थान आज भी हांफ रहे हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वाक्य में कहें तो किसी भी काम के बारे में व्यक्ति सोचने लगा है कि इसमें मेरा क्या और फिर मेरा नहीं तो मुझे क्या.

सोच छोटी होती चली गई और परिवार छोटा होता चला गया. औरत का शरीर एक उत्पाद बन गया और जिस इंसान की पहुंच इस उत्पाद तक नहीं हो पाया वह दरिंदा बन गया. ऐसी बात नहीं है कि 1991 के नई आर्थिक नीति से पहले बलात्कार नहीं होते थे, परिवार नहीं टूटता था या न्यूक्लियर फ़ैमिली नहीं थी मगर अपवाद और आम में जो फ़र्क है वह फ़र्क आ गया.

नैतिकता की ऐसी टूटन कल्पना से परे है, जिसमें डॉक्टर पैसे कमाने के लिए मुर्दे को ऑक्सीजन पर कई दिनों तक रखता है. हीरे की ख़ान का मालिक राज कुंद्रा कभी सट्टेबाज़ी में तो कभी पोर्नोग्राफ़िक ने पकड़ा जाता है. उससे भी ज़्यादा बड़ा बदलाव यह है कि यह ख़बरें या फिर यह घटनाएं हमें झकझोरती नहीं हैं.हमारे अंदर के शॉक फ़ैक्टर शॉट सर्किट हो चुका है.

रिश्ते अब ऊपर तय नहीं होते बल्कि रिश्ते अब व्यापार तय करता है. अब दलाल कोई गाली नहीं रही प्रोफ़ेशन बन गया है. सौदा कराने के बाद वह गर्व के साथ कहता है मेरी दलाली दो पर्सेंट होगी या फिर लोग कहते हैं मेरा काम करा दो तो मैं दलाली 2 पर्सेंट दूंगा. यह इसलिए कि क्योंकि हमारे समाज के देखने और उसे लेकर सोचने के नज़रिए में फ़र्क़ आ गया है.

यह बदलाव देश में नई आर्थिक नीति लेकर आयी है. जब हमने स्वतंत्रता की वर्षगांठ पर क्रिकेट के इंडिपेंडेस कप का आयोजन किया और उसका नाम रखा था पेप्सी इंडिपेंडेंस कप उसी दिन हमने अपनी संप्रभुता का सौदा पैसे के लिए करने की शुरूआत कर दिए थे. यक़ीनन देश तरक़्क़ी किया मगर तरक्की किसे कहते हैं इसे लेकर आज तक विवाद बना हुआ है.

अब एक इकॉनॉमिक रिफोर्म की तीसवीं वर्षगांठ पर अर्थशास्त्रियों की रुदाली बैठी है कि जिस तरहसे अपने शुरुआत की थी उसका लक्ष्य हम पा नहीं सके. यह सच है, मगर ये पूरा सच नहीं है.दुनियाका कोई भी सामाजिक रिफार्म आर्थिक रिफार्म के बिना सफल नहीं हो सकता और ठीक उसी तरह से दुनिया का कोई भी आर्थिक रिफार्म सामाजिक रिफार्म के बिना सफल नहीं हो सकता.

पूंजीवाद की परिभाषा में एक पिरामिड बनता है जिसमें ऊपर वाला माल कमाता है और उसकी थाली में इतने छेद होते हैं कि जूठन नीचे गरीब की थाली तक आता है जिसे परकोलेट सिस्टम कहते हैं. मगर देश में उद्योगपतियों और व्यवसायियों के एक ऐसी पौध तैयार हो गई जिन्होंने अपने थाली में छेद रखा ही नही. ग़रीब -ग़रीब बनते चले गए और अमीर -आमिर बनते चले गए.

नई आर्थिक नीति की जो परिकल्पना थी कि हर व्यक्ति साथ में ऊपर उठेगा वह ध्वस्त हो गया. उसके ध्वस्त होने की वजह से अर्थव्यवस्था की जो रफ़्तार राजनेताओं ने या फिर अर्थशास्त्रियों ने पकड़ानी चाही थी उस पर रोक लगानी पड़ी. क्योंकि सरकार का काम लोकतंत्र में लोगों के सरोकारों का पैरोकार होना भी है. अब इसे लेकर विशेषज्ञ कहते हैं कि एक आर्थिक रिफॉर्म का डिज़ायर्ड रिज़ल्ट नहीं निकला.

भारत में अक्सर लोग नई आर्थिक नीति लेकर देश के आर्थिक प्रगति पर ज़्यादा चर्चा करते हैं, जबकि भारत जैसे देश में एक व्यक्ति एक इकाई के रूप में देश की पूंजी हैं. कोरोना जैसे महामारी में निजी अस्पतालों की अमानवीय लूट और सरकारी अस्पतालों की सेवा श्रद्धा ने नई आर्थिक नीति के कमज़ोर पहलूओं को एक बार फिर से उजागर कर दिया है.

कलकत्ता और जमशेदपुर में टाटा-बिड़ला की नौकरी में कर्मचारी घर लौटकर आता था तो परिवार के साथ सुकून से जीता था मगर अब नए बनिए की नौकरी में कब आपका बॉस आपको यह कह दे कि कल से दफ़्तर नहीं आना है यह आपको पता नहीं .यह कहते हुए उसका कलेजा नहीं कांपता है कि कल सुबह से उसके 2 बच्चे और बीवी क्या खाएंगे.

मुनाफ़ाखोर व्यवस्था में उसका दिल और दिमाग़ दोनों मशीन बन चुका है. और यहीं से सामाजिक सुरक्षा चक्र की ज़रूरत महसूस की जाती है. देश के नई आर्थिक नीति के जनक पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव के समय इस नीति के शिल्पकार मनमोहन सिंह तो महान बन गए मगर और अंधाधुंध आर्थिक सुधारों की चकाचौंध ने कांग्रेस को उस अंधेरे में ढकेल दिया जिससे बाहर निकलने का रास्ता उसे आज तक नहीं मिला है.

प्रधानमंत्री की भूमिका में मनमोहन सिंह ने इस देश में लोगों को उद्योगपति और व्यवसायी बनाकर दोबारा सत्ता में नहीं लौटे थे बल्कि मनरेगा जैसे कामों की बदौलत लौटे थे. यहां पर पहली बार देश में भरपेट भोजनकी गारंटी दी गई है. और सरकार गई तो करप्ट कॉरपोरेट प्रैक्टिस की वजह से हीं. प्रधानमंत्री नरेंद्रमोदी तो आज़ाद हिन्दुस्तान के सबसे बड़े समाजवादी सरकार के प्रधानमंत्री हैं जो ग़रीब कल्याण के लिए योजनाओं के मामले में अब तक के सभी प्रधानमंत्रियों को पीछे छोड़ दिया है.

इसका मतलब यह क़तई नहीं है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आर्थिक सुधारों के विरोधी हैं मगर नई आर्थिक नीति ने इस देश को कर्ज़ से तो बचा लिया पर सूदखोरों की ऐसी फ़ौज खड़ी कर दी जो गरीबों का खून पीते थे और फिर आर्थिक सुधार को, सामाजिक सुधार को पटरी पर लाने के लिए लौटना पड़ा है या साथआने का इंतज़ार करना पड़ रहा है. दोनों एक साथ अगर नहीं चले तो विकास अवरुद्ध हो जाता है और यही भारत की नई आर्थिक नीति के साथ हो रहा है.

नई आर्थिक नीति ने सामाजिक बदलाव की नई आकांक्षाएं पैदा की जिसकी पैदाइश लालू प्रसादयादव और मुलायम सिंह यादव, मायावती जैसे लोग निकले.ये हमारी नई आर्थिक नीति की सबसे बड़ी देन भी है जिसने गरीबों को सपने दिखाने शुरू किए. ग़रीब, शोषित, दलित और महिलाएं आज हर उस वर्जनाओं को तोड़ने के लिए आतुर है जिसके खांचे में तो वह फ़िक्स कर दिए गए थे.

अब कोई महानायक नहीं होता, अब कोई नायक नहीं होता ,जिस दिन जिसका हो बॉस दिन का नायक है. अब कोई देवानंद, राकेश खन्ना या अमिताभ बच्चन पैदा नहीं हो सकता. नायक बनाने की मनोवृत्तिको नई आर्थिक नीति ने खंडित कर दिया है. दुनिया मेहनत पर मेहरबान है, परिश्रम को प्रणाम है. कंबल ओढ़कर घी पीने की रवायत भी इस नई आर्थिक नीति ने ख़त्म कर दी है.

व्यक्ति और समाज शर्मीला नहीं रहा. जो उसे चाहिए वह हर क़ीमत पर चाहिए. अब घर में बच्चा भी ज़िद्दी पैदा होता है. ऐसे में इस बात का कोई पैमाना नहीं हो सकता कि नई आर्थिक नीति ने हमें क्या दिया और हम सेक्या छीन लिया है. भारत मिडिल क्लास लोगों का देश है और आगे भी रहेगा क्योंकि भारत की आत्मा मध्यमार्गी सोच की है.

यहां अतिरेक और अतिरंजनाओं की कोई जगह नहीं. फ़र्क सिर्फ़ इतना आया है कि अब हमें मां भी चाहिए और उसके साथ उतनी ही ज़रूरी हो गया है बंगला, गाड़ी और बैंक बैलेंस भी. इसे हासिल करने के लिए नैतिकता का तराजू नहीं चाहिए और भारत में मां भी मदर इंडिया फ़िल्म की मां नहीं रही.

नई आर्थिक नीति हो या फिर कोई नई विचारधारा भारत की फिजां में नैसर्गिक घर्षण बल है जो गति को धीमा कर मध्यमार्गी बना देती है. जो नहीं मिल रहा है उसकी चाहत स्वभाव का नैसर्गिक गुण है मगर सच तो यह है कि भारत की जो विकास गति है वह कभी भी किसी महान आर्थिक और राजनैतिक सुधारवादी की मोहताज नहीं रही है. जो यह समझ गया वही भारत पर राज क़ायम रखेगा.

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