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Updated: 26 अगस्त, 2022 05:03 PM
बिलाल एम जाफ़री
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मैं जा रहा हूं – गुलाम ने कहा

जाओ – राहुल गांधी ने उत्तर दिया

यह जानते हुए कि जाना

मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में कांग्रेस पार्टी के लिए सबसे खौफनाक क्रिया है.

उपरोक्त 4 पंक्तियों के लिए हम केदारनाथ सिंह से माफ़ी मांगेंगे. उम्मीद है हमें माफ़ी मिलेगी लेकिन वो गुलाम जो आज आज़ाद होकर राइट विंग कई लोगों और भाजपा के नबी बन गए हों उन्हें नेहरू, गांधी, राजीव, इंदिरा कभी माफ़ करें ये एक मुश्किल प्रश्न है. गुलाम नबी कांग्रेस पार्टी से आजाद हो गए हैं. सवालों के घेरे में राहुल गांधी हैं. जिक्र राहुल गांधी का हुआ है तो फेसबुक की फ्रेंड लिस्ट से लेकर रियल लाइफ और उसमें भी दोस्तों और रिश्तेदारों तक. तमाम लोग ऐसे हैं, जिन्हें कांग्रेस से ज्यादा राहुल गांधी से लगाव है. ऐसे लोगों की चाहे बातें हों या फिर सोशल मीडिया पोस्ट अमूमन दिख ही जाता है कि ये लोग राहुल गांधी के लिए अपने-अपने दिलों में सॉफ्ट कार्नर रखते हैं. ऐसे लोगों का मानना है कि, मीडिया बदनाम करना और विरोधी खेमा मशीन में आलू डालकर सोना निकालने जैसे जोक बनाना छोड़ दे तो राहुल गांधी से अच्छा पीएम मटेरियल इस देश को शायद ही मिले.

ऐसे लोग मानते हैं कि भले ही राहुल गांधी राजनीति के बड़े बड़े पुरोधाओं के सामने नन्हें मुन्ने राही हों. लेकिन राहुल ही देश के सच्चे सिपाही हैं, जो न केवल 'जय हिंद' की अवधारणा पर फिट बैठते हैं. बल्कि उन्हें उसकी कीमत अच्छे से पता है.

समर्थकों का जैसा मोह राहुल गांधी के प्रति है उन्हें राहुल गांधी में कोई बुराई नजर ही नहीं आती. ये लोग राहुल के एरोगेंस को उनका एटीट्यूड मानते हैं और तर्क देते हैं कि जैसे बैकग्राउंड से राहुल आते हैं उनपर वो फबता है. राहुल के चेहरे के पिंपल को डिंपल मानने वाले ये लोग भले ही मुहब्बत या हमदर्दी के नाते राहुल गांधी में देश का अगला प्रधानमंत्री देखें लेकिन आज जैसे हालात हैं, हमारा सुझाव बस इतना है कि इन्हें अपनी चॉइस पर पुनर्विचार करने की बहुत ज्यादा जरूरत है.

क्यों? अरे भइया जो आदमी बरसों बरस से पार्टी में रहने वाले 'गुलाम' को आजाद होने से नहीं रोक पाया वो इतना बड़ा देश संभाल ले डाउट की एक पतली सी रेखा तो है. गुलाम आज़ाद होकर भले ही जा चुके हैं. लेकिन ये जाना राहुल के साथ साथ कांग्रेस पार्टी को खलेगा.

ऐसा इसलिए होगा क्योंकि युवराज की ऐसी बेइज्जती तो खुद पीएम मोदी ने भी कभी नहीं की. याद करिये उन पलों को चाहे वो सदन हो या फिर रैलियां अगर पीएम मोदी ने राहुल गांधी की रेल बनाई तो पल कभी 5 या 7 मिनट से ज्यादा नहीं हुए. वहीं जब हम राहुल गांधी पर तमाम गंभीर आरोप लगाकर कांग्रेस पार्टी छोड़ने वाले गुलाम नबी की आज़ादी को देखते हैं तो उन्होंने 5 पेज का खत लिखा है.

कल्पना कीजिये उन शब्दों की संख्या की. उन भावों की जो गुलाम नबी के मन में तब आए होंगे जब वो राहुल गांधी को बेनकाब कर रहे थे. बहुत पहले किसी ने इस बात को कहा था कि यूं ही कोई बेवफा नहीं होता. ऐसे में अगर गुलाब नबी आज़ाद ने बेवफा बनकर राहुल गांधी से अपना पिंड छुड़ाया है तो ये कोई हल्की बात नहीं है.

खैर पार्टी के प्रति और पार्टी में भी राहुल गांधी के प्रति हमदर्दी रखने वाले अजीबो गरीब लॉजिक दे रहे हैं. कहा जा रहा है कि जैसे जैसे गुलाम नबी आजाद जैसे लोग पार्टी से जाएंगे वैसे वैसे पार्टी मजबूत बनेगी. क्या वाक़ई ऐसा है? इस बात में कोई संदेह नहीं है कि अगर मजाक घिनौना हो सकता है तो सिर्फ ये कथन ओछेपन की पराकाष्ठा है.

बहरहाल अब जबकि गुलाम नबी 'आज़ाद' हो चुके हैं. हम भी राहुल गांधी से बस ये कहते हुए अपनी बातों को विराम देंगे कि, किसी दिन वो अकेले में बैठे और अपना आत्मसात करें. यदि वो ऐसा कर ले गए तो उन्हें मिलेगा कि उनकी राजनीती में बड़ा टेक्निकल डिफ़ॉल्ट है. जो और कुछ नहीं बस पार्टी को खोखला कर रहा है. बाद बाकी ये है कि जिस तरह करीबी उन्हें प्रधानमंत्री पद के नाम पर चने के झाड़ पर चढ़ा रहे हैं. वो दिन दूर नहीं जब राहुल गांधी को न तो खुदा मिलेगा और न ही विसाल ए यार.

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बिलाल एम जाफ़री बिलाल एम जाफ़री @bilal.jafri.7

लेखक इंडिया टुडे डिजिटल में पत्रकार हैं.

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