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Updated: 02 मार्च, 2018 04:24 PM
खुशदीप सहगल
खुशदीप सहगल
  @khushdeepsehgal
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केंद्र में मोदी सरकार और दिल्ली में केजरीवाल सरकार, दोनों पर ही परफॉर्म करने का दबाव है. लोकसभा चुनाव एक साल और दिल्ली विधानसभा चुनाव महज दो साल ही दूर हैं. दिल्ली में परिस्थितियां एक बार फिर वैसी बनती दिखाई दे रही हैं जैसे कि 2014 में आम चुनाव से पहले के एक-दो साल में थीं और कांग्रेस को जनाक्रोश की वजह से केंद्र और दिल्ली, दोनों की सत्ता से बाहर होना पड़ा था.

उस वक्त 2जी समेत तमाम घोटालों का मुद्दा जनमानस पर छाया हुआ था. अन्ना हजारे की अगुआई में ‘इंडिया अगेन्स्ट करप्शन’ आंदोलन ने यूपीए सरकार की नाक में दम कर रखा था. एक बार फिर अब मामा-भांजे मेहुल चोकसी और नीरव मोदी से जुड़े पीएनबी महाघोटाले ने देश के लोगों को उद्वेलित कर रखा है. भ्रष्टाचार के खिलाफ लोकपाल का अलख जगाने के लिए अन्ना हजारे एक बार फिर दिल्ली में डेरा डालने के लिए तैयार हैं.

arvind kejriwal, CM, delhiये क्या कर रहे हैं केजरीवाल..?

2013 में लोकपाल एक्ट आने के बाद भी भ्रष्टाचार के खिलाफ इस सबसे बड़े वॉचडॉग की नियुक्ति अभी तक नहीं हो सकी है. मोदी सरकार लोकपाल की नियुक्ति को लेकर बीते 45 महीने से कानों में तेल डाले रही. सुप्रीम कोर्ट ने सख्त तेवर अपनाए तो मोदी सरकार ने लोकपाल की नियुक्ति के लिए चयन समिति की बैठक बुलाई. लेकिन कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मल्लिकार्जुन खड़गे को बैठक के लिए विशेष आमंत्रित सदस्य के नाते न्योता दिया विपक्ष के नेता के तौर पर नहीं. इससे खड़गे और कांग्रेस दोनों ही भड़क गए और बैठक का बहिष्कार कर दिया. साथ ही आरोप लगाया कि लोकपाल जैसी महत्वपूर्ण नियुक्ति के लिए सरकार विपक्ष को साथ लेकर चलने की इच्छुक नहीं है.

देखना दिलचस्प है कि लोकपाल के लिए जिस ‘इंडिया अगेंस्ट करप्शन’ के आंदोलन ने अरविंद केजरीवाल एंड कंपनी के लिए सत्ता की राजनीति के लिए जमीन तैयार की थी, उसके कई बड़े योद्धा केजरीवाल से किनारा कर चुके हैं. इनमें कर्नाटक के पूर्व लोकायुक्त संतोष हेगड़े, पुड्डुचेरी की मौजूदा लेफ्टिनेंट गवर्नर किरन बेदी, प्रसिद्ध वकील प्रशांत भूषण, सामाजिक वैज्ञानिक और चुनाव विश्लेषक से नेता बने योगेंद्र यादव आदि बड़े नाम शामिल हैं. केजरीवाल के बाल सखा रह चुके कुमार विश्वास भी आए दिन बगावत के तेवर दिखाते रहते हैं. सत्ता की राजनीति की विडंबना देखिए केजरीवाल को आज दिल्ली में अफसर लॉबी के ही विरोध का सामना करना पड़ रहा है. विज्ञापन के लिए पैसा रिलीज ना होने पर केजरीवाल के घर पर जो दिल्ली सरकार के मुख्य सचिव अंशु प्रकाश के साथ जो हुआ, वो राजनीतिक इतिहास के स्याह पन्नों का एक हिस्सा बन चुका है.

केजरीवाल की पार्टी AAP का आरोप है कि दिल्ली के लेफ्टिनेंट गवर्नर केंद्र सरकार की कठपुतली की तरह काम कर रहे हैं. ऐसे में केजरीवाल सरकार के लिए दिल्ली की जनता की भलाई के कामों को अंजाम देना मुश्किल हो रहा है.

AAP ने चुनावी राजनीति में आने के वक्त वादा किया था कि वो देश भर में लोगों को कांग्रेस और बीजेपी का सशक्त और ईमानदार विकल्प बन कर दिखाएगी. दिल्ली की जनता ने केजरीवाल एंड कंपनी की बातों पर भरोसा करते हुए उसे दिल्ली में शासन के लिए जनादेश भी दिया. पहली बार उसने कांग्रेस की बैसाखियों पर दिल्ली में सरकार बनाई जो डेढ़ महीना भी नहीं टिक सकी. दूसरी बार दिल्ली में विधानसभा चुनाव हुए तो केंद्र में मोदी सरकार आ चुकी थी. 2014 लोकसभा चुनाव में दिल्ली की सातों सीट बीजेपी के खाते में गईं और केजरीवाल की पार्टी को खाली हाथ मलते रहना पड़ा. लेकिन एक साल के भीतर ही दिल्ली विधानसभा के चुनाव दोबारा हुए तो AAP को प्रचंड बहुमत के साथ सरकार बनाने में कामयाबी मिली. कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया तो 70 सदस्यीय दिल्ली विधानसभा में बीजेपी को महज तीन सीटों से ही संतोष करना पड़ा. बाकी सभी 67 सीटों पर केजरीवाल की झाड़ू ने कमाल दिखाया.

केजरीवाल सरकार जब से दोबारा दिल्ली की सत्ता में आई तभी से उसे केंद्र से टकराव के चलते मुश्किल हालात का सामना करना पड़ता रहा है. इस साल के शुरू में ही ऑफिस ऑफ प्रॉफिट के मामले में केजरीवाल के 20 विधायकों को अयोग्य करार दिए जाने के बाद विधानसभा की सदस्यता से हाथ धोना पड़ा.

जैसा कि देखा जा रहा था कि केजरीवाल ने पिछले कुछ समय से मोदी सरकार पर जुबानी हमले बंद कर रखे थे. इसकी जगह AAP की कोशिश थी कि दिल्ली में लोगों की भलाई के लिए काम किए जाएं जिससे कि अगले चुनाव में उसे आसानी रहे. शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर दिल्ली में केजरीवाल सरकार का काम दिख भी रहा है. लेकिन मुख्य सचिव अंशु प्रकाश वाले प्रकरण ने फिर केजरीवाल को रणनीति बदलने के लिए मजबूर होना पड़ा है. केजरीवाल एक बार फिर पूरा राशन पानी लेकर मोदी सरकार पर चढ़ाई की तैयारी कर रहे हैं.

विश्वसनीय सूत्रों से पता चलता है कि 2019 में पहले लोकसभा चुनाव और फिर दिल्ली विधानसभा चुनाव को क्रैक करने के लिए केजरीवाल खास रणनीति पर काम कर रहे हैं. दक्षिण में चेन्नई जाकर एक्टर से नेता बने कमल हासन के साथ केजरीवाल के हाथ मिलाने के खास मायने हैं. पूर्व में भी ममता बनर्जी जैसी फायरब्रैंड नेता के साथ तालमेल के लिए केजरीवाल जोर लगा रहे हैं.

केजरीवाल का गेम-प्लान है कि 2019 में मोदी सरकार के खिलाफ विपक्ष एकजुट होता है तो उसमें केजरीवाल भी अहम भूमिका में लोगों को नज़र आएं. ऐसे में सवाल ये है कि क्या केजरीवाल दिल्ली में सरकार चलाने की जिम्मेदारी मनीष सिसोदिया पर छोड़ कर संसदीय राजनीति का रुख करने की तैयारी कर रहे हैं. राज्यसभा में उनके लेफ्टिनेंट संजय सिंह पहुंच चुके हैं और अपनी प्रभावी स्पीच से लोगों का ध्यान भी अपनी तरफ आकर्षित कर चुके हैं. ऐसा ही कुछ केजरीवाल चुनावी वर्ष में लोकसभा में भी AAP की आवाज बुलंद होते देखना चाहते हैं. इसके लिए क्या केजरीवाल खुद लोकसभा में उपचुनाव के रास्ते से जाना चाहते हैं. अगर ऐसा होता है तो पंजाब के संगरूर से पार्टी के सांसद भगवंत मान इस्तीफा देकर केजरीवाल के लिए लोकसभा में पहुंचने का रास्ता साफ कर सकते हैं.

manish sisodiya, arvind kejriwalक्या अब मनीष सिसोदिया के हवाले है पार्टी की कमान..?

केजरीवाल जानते हैं कि महज दिल्ली तक सीमित रहने से AAP का जनाधार देश में नहीं बढ़ सकता और इसके लिए उन्हें कुछ क्रांतिकारी कदम उठाने ही पड़ेंगे. पंजाब में बीते साल अकाली दल बादल जैसी खांटी पार्टी को पीछे धकेल कर AAP ने राज्य में मुख्य विपक्षी दल का दर्जा हासिल कर लिया था. ऐसे में केजरीवाल को भरोसा है कि अगर वो देश में और हिस्सों में भी अलख जगाएं तो पार्टी को राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा मिल सकता है.

दरअसल, केजरीवाल को सत्ता की राजनीति से कहीं ज्यादा विरोध की राजनीति सूट करती है. सड़कों पर गुरिल्ला स्टाइल में विरोध जताना केजरीवाल की यूएसपी है. लेकिन दिल्ली के मुख्यमंत्री होने के नाते वो ये सब खुल कर नहीं कर सकते. केजरीवाल को पता है कि लोगों में अपनी उम्मीदें पूरी ना होने की वजह से मोदी सरकार के खिलाफ नाराजगी आने वाले दिनों में बढ़ सकती है. और इस स्थिति को AAP के लिए कैश कराना है तो उन्हें इस बार संसद से लेकर सड़क तक बिगुल बजाते नजर आना होगा.

केजरीवाल की एक शिकायत ये भी रही है कि उनके अच्छे कामों को भी मीडिया तवज्जो नहीं देता है और उन्हें अपनी योजनाओं को जनता तक पहुंचाने के लिए विज्ञापनों का सहारा लेना पड़ता है. सूत्रों के मुताबिक ऐसी स्थिति में केजरीवाल एंड कंपनी अपना खुद का चैनल लाने पर भी गंभीरता से विचार कर रही है. पार्टी नेता आशुतोष हों या उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया दोनों की पृष्ठभूमि ही इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से है. ऐसे में चैनल को जमाने और पार्टी के प्रचार का सशक्त जरिया बनाने में भी AAP को किसी विशेष दिक्कत का सामना नहीं करना पड़ेगा.

बहरहाल, केजरीवाल में देश की राजनीति में नया कुछ क्रैक करने के लिए वैसा ही कुछ जज्बा है जैसे कि कभी छात्र रहते हुए उन्होंने IIT जैसे मुश्किल इम्तिहान को क्रैक करने में दिखाया था....

ये सब मेरे जेहन में पिक्चर की तरह चल ही रहा था कि अचानक मुझे सिर पर ठंडे पानी की बौछार का अनुभव हुआ. साथ ही पत्नीश्री की कड़क आवाज सुनाई दी. ‘ये होली पर भांग की तरंग में क्या बड़बड़ाए जा रहे हो, ठंडाई का नशा उतरा या नहीं...’

ओह तो केजरीवाल का ये सारा गेम-प्लान असलियत में नहीं, मैं भांग की मस्ती में ही सपने की तरह देख गया था.

(बुरा ना मानो होली है !)

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लेखक

खुशदीप सहगल खुशदीप सहगल @khushdeepsehgal

लेखक आजतक में न्यूज़ एडिटर हैं

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