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Updated: 15 अगस्त, 2022 02:25 PM
देवेश त्रिपाठी
देवेश त्रिपाठी
  @devesh.r.tripathi
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संसद के मानसून सत्र के दौरान बैंकों राज्यसभा में वित्त राज्यमंत्री भागवत के कराड ने एक प्रश्न का लिखित उत्तर देते हुए कहा था कि पिछले पांच वित्त वर्ष में लगभग 10 लाख करोड़ रुपये के ऋण यानी लोन को बट्टे खाते (loan write off) में डाला गया है. मोदी सरकार के इस जवाब के बाद विपक्षी सियासी दलों ने इसमें एक अवसर देखा. और, आम आदमी पार्टी सुप्रीमो अरविंद केजरीवाल से लेकर कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे तक ने एक सुर में दावा किया कि मोदी सरकार ने अपने दोस्तों के 10 लाख करोड़ रुपये माफ कर दिए हैं. वैसे, राहुल गांधी भी कई बार मोदी सरकार पर दोस्तों को फायदा पहुंचाने के लिए कर्जमाफी करने के दावे करते रहे हैं. इस स्थिति में सवाल उठना लाजिमी है कि कर्जमाफी के इन दावों में कितना झूठ और कितना सच है?

Narendra Modi Government has forgiven 10 lakh crores of its friends lie spread by opposition leaders in the name of loan write off and waive offकर्जमाफी और लोन राइट ऑफ में उतना ही अंतर है, जितना जमीन और आसमान में.

क्या होती है कर्जमाफी?

अगर कोई व्यक्ति बैंकों से लिया गया लोन नहीं चुका पाता है. और, लोन चुका पाने में असक्षम होता है. तो, ऐसे लोगों के ऋण सरकार की ओर से माफ कर दिया जाता है. लेकिन, इस कर्जमाफी (Waive Off) के दायरे में सभी लोग नहीं आते हैं. इस तरह की कर्जमाफी आमतौर पर किसानों की जाती है. वो भी चुनावों से पहले बाकायदा इसके लिए घोषणा की जाती है. आसान शब्दों में कहा जाए, तो किसानों को खराब फसल, बेमौसम बरसात या सूखा जैसी प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले आर्थिक संकट को खत्म करने के लिए कर्जमाफी का ऐलान किया जाता है. कर्जमाफी की इस योजना में किसी बड़ी कारोबारी कंपनी का लोन माफ नहीं किया जाता है.

राइट ऑफ क्या है?

जो कर्जदार सक्षम होने के बावजूद जानबूझकर अपना लोन नहीं चुकाते हैं. उन्हें विलफुल डिफॉल्टर कहा जाता है. जब इन विलफुल डिफॉल्टर से कर्ज वापसी की उम्मीदें पूरी तरह से खत्म हो जाती हैं. तब बैंक इन लोगों को दिए गए कर्ज को डूबा हुआ मानकर बट्टे खाते में डाल देती है यानी राइट ऑफ कर देती है. लेकिन, लोन राइट ऑफ करने का ये मतलब नहीं होता है कि यह कर्जमाफी है. बैंक केवल अपनी बैलेंस शीट को साफ-सुथरा रखने के लिए ऐसा करते हैं. इसकी भी एक प्रक्रिया है. आरबीआई (RBI) के नियमानुसार, बैंक पहले लोन को नॉन परफॉर्मिंग एसेट (NPA) में करार देते हैं. और, जब इसकी वसूली नहीं हो पाती है. तब इसे राइट ऑफ किया जाता है. वहीं, सरकार ने ऐसे भगोड़े आर्थिक अपराधियों से निपटने के लिए कानून भी बनाया है. जिसके तहत भगोड़े कारोबारियों को देश में वापस लाने की हरसंभव कोशिश की जाती है. और, कानूनी प्रक्रिया अपनाते हुए उसकी चल-अचल संपत्तियों को जब्त कर कर्ज वसूला जाता है.

8 साल में मोदी सरकार ने वसूले 6.4 लाख करोड़

मोदी सरकार के कार्यकाल में सरकारी बैंकों ने लोन दिए गए 6.42 लाख करोड़ रुपये की वसूली की है. एनपीए और बट्टे खाते में डाली गई ये रकम राइट ऑफ की गई थी. वहीं, मोदी सरकार ने लोन न चुकाने वाले 98.5 फीसदी लोगों के खिलाफ वसूली को भी तेज गति दी है. इसे लेकर भाजपा के आईटी इंजार्ज अमित मालवीय ने ट्विटर पर आंकड़े जारी किये थे. अमित मालवीय ने लिखा था कि बैंकों ने 5.17 लाख करोड़ रुपये के एनपीए और 1.24 लाख करोड़ रुपये के राइट ऑफ किए गए लोन की वसूली की है. 

डिफॉल्टरों की लिस्ट में शामिल कंपनियों को UPA सरकार के दौरान मिला था लोन

वैसे, राज्यसभा में वित्त राज्यमंत्री भागवत के कराड ने मार्च 2022 तक के शीर्ष 25 डिफॉल्टर की लिस्ट भी साझा की थी. इस लिस्ट में सबसे ऊपर मेहुल चोकसी की गीतांजलि जेम्स लिमिटेड है. जिसके ऊपर 7110 करोड़ रुपये का लोन बकाया है. इसके बाद एरा इंफ्रा इंजीनियरिंग पर 5879 करोड़ रुपये, कॉनकास्ट स्टील एंड पावर लिमिटेड पर 4107 करोड़ रुपये, आरईआई एग्रो लिमिटेड पर 3984 और एबीजी शिपयार्ड लिमिटेड पर 3708 करोड़ का बकाया है. भाजपा के तमाम नेताओं की ओर से कहा जाता रहा है कि ये सभी लोन यूपीए शासनकाल के दौरान दिए गए थे. तो, अरविंद केजरीवाल से लेकर राहुल गांधी तक के दोस्तों की कर्जमाफी के दावों में कोई दम नजर नहीं आता है. उलटा सच्चाई यही है कि मोदी सरकार ने भगोड़े आर्थिक अपराधियों पर अपना शिकंजा कसना शुरू कर दिया है. और, उनकी संपत्तियों को तेजी से जब्त भी कर रही है.

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लेखक

देवेश त्रिपाठी देवेश त्रिपाठी @devesh.r.tripathi

लेखक इंडिया टुडे डिजिटल में पत्रकार हैं. राजनीतिक और समसामयिक मुद्दों पर लिखने का शौक है.

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