New

होम -> इकोनॉमी

 |  6-मिनट में पढ़ें  |  
Updated: 22 मई, 2018 05:12 PM
आईचौक
आईचौक
  @iChowk
  • Total Shares

चार साल की राहत के बाद अंतर्राष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों के ऊपर चढ़ने के साथ ही पेट्रोल और डीजल की कीमतों में उछाल वाले दिन वापस आ गए. 2013 में तेल की कीमतों के 110 डॉलर प्रति बैरल के रिकॉर्ड ऊंच्चाई छू लेने के बाद से चार सालों में तेल की कीमत 25 डॉलर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंच गई थी. उपभोक्ताओं को अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतों के कम होने की खुशी होती अगर सरकार ने अपने करों में अंधाधुंध बढ़ोतरी करके सारा लाभ अपने पॉकेट में रखने का फैसला न किया होता. अब जबकि कीमतें 80 डॉलर प्रति बैरल को छू रही हैं और करों को कम नहीं किया गया है तो पेट्रोल और डीजल की कीमतों में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है.

चलिए तेल उत्पादों की कीमतों की संरचना को देखते हैं. पेट्रोल और डीजल को जीएसटी की सीमा से बाहर रखा गया है. केंद्र सरकार पेट्रोल और डीजल पर एक विशेष शुल्क लेती है. ये शुल्क पेट्रोल पर लगभग 19 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर लगभग 10 रुपये प्रति लीटर है. विशेष शुल्क का मतलब है कि ये रिफाइनरी की कीमतों पर निर्भर नहीं करेगा. फिर चाहे तेल की कीमत 25 डॉलर प्रति बैरल हो या फिर 80 डॉलर प्रति बैरल हो लेकिन इस पर लगने वाला शुल्क वही रहेगा.

अधिकांश राज्य सरकारें 20 से 30 प्रतिशत के बीच का वैल्यू एडेड टैक्स (वैट) चार्ज करती हैं जो यथामूल्य है. जिसका मतलब ये है कि इसमें रिफाइनरियों का शुल्क लिया जाता है. इसलिए ही कीमतें बढ़ने के साथ ही राज्यों का वैट चार्ज भी बढ़ जाता है. कुछ राज्यों में स्थानीय कर भी होते हैं जो कीमतों को और बढ़ा देते हैं. यही कारण है कि मुंबई में पेट्रोल की कीमत 84 रुपये प्रति लीटर है, जबकि गुजरात में 76 रुपये प्रति लीटर है. लेकिन सरकार पेट्रोल पर औसतन 33 रुपये से 38 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर औसतन 24 रुपये प्रति लीटर 30 रुपये प्रति लीटर जमा करती है.

तेल की कीमतों को बढ़ाने वाला दूसरा कारण रुपए का कमजोर होना है. लगभग 80 प्रतिशत तेल आयात किया जाता है और रुपये के कमजोर होने से आयात महंगा होता जा रहा है. 2014 में एक डॉलर की कीमत 58 रुपए थी, लेकिन आज वही रुपया 68 के स्तर पर पहुंच गया है. यह चार वर्षों में लगभग 17 प्रतिशत तक कमजोर हुआ है. मतलब प्रति वर्ष लगभग चार प्रतिशत तक की गिरावट है. इसलिए रुपये के कमजोर होने के कारण आयात की लागत भी लगभग चार प्रतिशत बढ़ी है.

तेल का सिरदर्द वापस आ गया है. सरकार ने अभी तक समाधान के रूप में टैक्स को कम करने से इंकार कर दिया है. राजकोषीय घाटा नियंत्रण से बाहर जा रहे हैं तो फिर आर्थिक तस्वीर खराब हो सकती है. दूसरी तरफ, आम चुनाव में अब सिर्फ एक साल बाकी रह गया है. और ईंधन की बढ़ी कीमतें मुद्रास्फीति को बढ़ावा देंगी जिससे मतदाता का व्यवहार भी प्रभावित हो सकता है.

petrol, diesel, priceतेल की कीमतों में आग लग रही है, सरकार को पानी डालना ही होगा

सरकार ने अब तक आर्थिक स्थिरता को नियंत्रण में रखा है, और इसे कच्चे तेल की कम कीमतों से सहायता मिलती थी. लेकिन अब वो आराम नहीं है. महत्वपूर्ण राज्य चुनावों के दौरान ईंधन की कीमतों को स्थिर रखा गया है. हमारे पास हाल ही में हुए गुजरात और कर्नाटक चुनाव इसके सटीक उदाहरण हैं. मतलब ये कि सरकार पिछले दरवाजे से तेल की कीमतों पर अपनी लगाम लगाए रखती है, ये और बात है कि सरकार दावा कुछ और ही करती है.

तो अब सरकार के सामने आखिर विकल्प क्या हैं? अगर तेल की कीमतें इसी तरह बढ़ती रहती हैं, तो तत्काल के लिए सबसे सटीक और नैतिक उपाय ये है कि टैक्स को कम कर दिया जाए. 2013 में जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमत 110 डॉलर प्रति बैरल थी तब उत्पाद शुल्क 9 रुपये प्रति लीटर था. आज यह 19 रुपये प्रति लीटर है. उत्पाद शुल्क में 5 रुपये की कमी करने से पेट्रोल की कीमतें 6 से 7 रुपये प्रति लीटर तक कम हो जाएगी क्योंकि राज्यों का वैट यथामूल्य रहेगा. पिछले चार सालों में जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें कम थीं तब उपभोक्ता को उसका फायदा नहीं मिला इसलिए तेल की कीमतें बढ़ने पर सरकार द्वारा उपभोक्ताओं की रक्षा करनी चाहिए. सरकार द्वारा राजस्व के नुकसान को या तो विनिवेश के माध्यम से या फिर खर्च को कम करके पूरा करना चाहिए.

सरकार को तेल से प्राप्त राजस्व पर अपनी निर्भरता कम करनी होगी. तेल उत्पादों को जीएसटी के दायरे में लाया जाना चाहिए और भारत में ईंधन की कीमतें अंतरराष्ट्रीय ईंधन की कीमतों से मेल खानी चाहिए. इससे कीमतों को तब सरकार द्वारा प्रशासित नहीं किए जाने की जरुरत नहीं रहेगी और तेल पर वोटबैंक की राजनीति भी खत्म हो जाएगी. क्योंकि तब लोग तेल को सिर्फ एक और वस्तु की तरह ही मानेंगे जो अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर निर्भर करता है.

तेल की कीमतों के कम होने का सबसे बड़ा फायदा ये होगा कि देश को निर्यात के मोर्चे पर काफी मदद मिलेगी. और निर्यात में बढ़ावा मिलेगा जिससे हमारे चालू खाता घाटे को कम करने में मिलेगी. इससे रुपया मजबूत होगा और आयात की कीमतें कम होंगी. इससे दूसरा बड़ा लाभ यह होगा कि सरकार अपनी घाटे वाली कंपनियों से छुटकारा पा सकती है, अपनी संपत्ति का सामरिक विनिवेश कर सकती है, गैर उत्पादक खर्च को कम कर सकती है.

लेकिन सच्चाई ये है कि सरकार कोई भी दूरगामी कदम उठाने के बजाय इस चुनावी साल में आसान विकल्पों को ही आजमाएगी. लेकिन तेल की आसमान छूती कीमतों का दबाव और चालू खाता घाटे के लगातार बढ़ने के बाद सरकार को संरचनात्मक बदलावों के लिए मजबूर होना ही पड़ेगा. अन्यथा इतिहास खुद को दोहराएगा और हम तेल की कमी वाले देश में वापस आ सकते हैं.

दूसरी बात ये कि आने वाले दस सालों में देश में इलेक्ट्रिक वाहनों का चलन ज्यादा हो जाएगा जिसके कारण उच्च करों के रूप में तेल से राजस्व कमाने का लाभ सरकार को मिलना बंद हो जाएगा. अब जागने का समय आ गया है. एक दूरगामी उपाय अपनाइए और अगले तीन से चार सालों में हम दुनिया के बाकी हिस्सों के  बराबर की तेल की कीमतों को बनाए रखने में कामयाब हो जाएंगे. संकट के आने और उसके बाद कदम उठाने की प्रतीक्षा न ही करें तो बेहतर होगा.

(ये लेख DailyO के लिए निशात शाह ने लिखा था)

ये भी पढ़ें-

डीजल-पेट्रोल के मामले में मोदी सरकार को 'मौकापरस्त' क्यों न कहा जाए?

इलेक्ट्रिक कार: क्यों इस सरकारी सपने पर आसानी से यकीन नहीं होता..

डीजल-पेट्रोल की कीमतों का चुनावी चक्कर: ये पब्लिक है जो सब जानती है

लेखक

आईचौक आईचौक @ichowk

इंडिया टुडे ग्रुप का ऑनलाइन ओपिनियन प्लेटफॉर्म.

iChowk का खास कंटेंट पाने के लिए फेसबुक पर लाइक करें.

आपकी राय