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Updated: 10 जून, 2021 10:55 PM
अनुज शुक्ला
अनुज शुक्ला
  @anuj4media
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ख़ूबसूरत, शरारती, मैच्योर और मुस्कराहट बिखेरते हुए किसी भी तरह के किरदार में घुस जाने वाली अभिनेत्री का नाम विद्या बालन है. वैसे तो हर व्यक्ति की अपनी विशेषता होती है. मगर बात अगर विद्या की है तो समकालीन अभिनेत्रियां उनके सामने कहीं नहीं ठहरतीं. उनका अभिनय तो लाजवाब है ही, स्क्रीन प्रेजेंस भी बहुत ही ख़ूबसूरत है. उन्हें देखने से दर्शकों को एक अलग ही सुकून मिलता है.

विद्या बालन कितनी हुनरमंद अभिनेत्री हैं इसका सबूत देने की तो जरूरत ही नहीं है. बहुत दूर ना जाएं तो श्रीदेवी, रेखा और माधुरी दीक्षित को ही उनसे पहले इतनी फिल्मों में बड़े-बड़े किरदार मिले. जबकि फिल्म इंडस्ट्री में उनकी अब तक की यात्रा पर नजर जाती है तो पता चलता है कि श्रीदेवी, रेखा और माधुरी के मुकाबले विद्या को कुछ भी नहीं मिला. आज के दौर की दूसरी हीरोइनों को देखें तो विद्या कहीं ज्यादा की हकदार हैं. नाम गिनाना ठीक नहीं मगर, बहुत सारी औसत अभिनेत्रियों को उनके मुकाबले क्षमता से बहुत ज्यादा ही मिला. कहीं ऐसा तो नहीं कि विद्या का हुनर या उनका आउटसाइडर होना, उनपर भारी पड़ा?

दरअसल, 42 साल की अभिनेत्री ने अभिनय का सपना लेकर जब मनोरंजन की दुनिया में कदम रखा था तब उनकी उम्र 16 या 17 साल के आसपास थी. हीरोइन बनने तक के सफर में उन्हें काफी संघर्ष और मुश्किलों से गुजरना पड़ा. हिंदी में रास्ता नहीं मिला तो क्षेत्रीय सिनेमा का रुख किया. दक्षिण में ठोकरें खाई और अपमानित भी हुईं. विद्या को एक बात सीधे-सीधे पता थी- "मौका मिला तो सिर्फ एक्टिंग स्किल से ही उनको आगे का रास्ता मिलेगा." तमाम जगह घूम-फिरकर हाथ मार चुकी विद्या को वो मौका साल 2005 में परिणीता में ललिता के किरदार ने दिया.

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ललिता का किरदार सिर्फ विद्या के लिए ही था. ललिता बहुत खूबसूरत, थोड़ी शरारती, घरेलू मसलों और रिश्तों को लेकर मैच्योर और आत्म सम्मान के साथ जीने वाली लड़की थी. पीरियड ड्रामा में संजय-दत्त और सैफ अली खान भी थे. ये दूसरी बात है कि फिल्म चली नहीं, मगर गंभीर दर्शकों के मन को ये भा गई. फिल्म का हासिल कुल मिलाकर विद्या ही रहीं. क्रिटिक्स ने भी उनके अभिनय को लेकर खूब लिखा और पहली ही भूमिका के लिए उन्हें बेस्ट डेब्यूट एक्ट्रेस का अवार्ड भी मिल गया. थोडा देर ही सही लेकिन ये बहुत ठोस शुरुआत थी. हालांकि इससे पहले उन्होंने बांग्ला फिल्म भालो ठेको (2003) की थी जो लगों का ध्यान आकर्षित नहीं कर पाई.

विद्या की पहली फिल्म 27 साल की उम्र में आई थी. इंडस्ट्री परिवारों से आने वाली औसत हीरोइनें इस उम्र तक कई दर्जन फ़िल्में कर चुकी होती हैं. जबकि पहली ही भूमिका (ललिता) के लिए सुर्खियां बटोरने वाली एक्ट्रेस को अगली फिल्म के लिए इंतज़ार करना पड़ा. संजय दत्त के साथ ही उनकी दूसरी फिल्म आई- लगे रहो मुन्ना भाई. इसे विधु विनोद चोपड़ा ने प्रोड्यूस किया था. उन्होंने ही शरतचन्द्र की मूल कहानी पर बनी परिणीता का स्क्रीनप्ले लिखा था. संभवत: विद्या का हुनर उनकी नजर में रहा होगा. कॉमेडी ड्रामा लगे रहो मुन्ना भाई में विद्या के लिए बहुत स्पेस नहीं था. बावजूद रेडियो जॉकी की बढ़िया भूमिका निभाई और इस तरह एक सुपरहिट फिल्म उन्हें मिली.

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2007 और 2008 में उनकी कई फ़िल्में आईं. इसमें से पा और भूल-भूलैया ही कामयाब थीं. भूल-भूलैया में एक्ट्रेस ने अवनि चतुर्वेदी की यादगार भूमिका निभाई. हालांकि मल्टीस्टारर ड्रामा की सफलता की सारी मलाई अक्षय कुमार समेत इसके 'मेल कास्ट' को मिली. जबकि पा में अमिताभ बच्चन समूचा लाइम लाइट बटोर ले गए. इस दौरान- एकलव्य, हे बेबी, सलाम-ए-इश्क, हल्ला बोल किस्मत कनेक्शन जैसी मसालेदार फ़िल्में नाकाम रहीं. कई फ़िल्में मल्टी स्टारर थीं. इसी दूर में धारणा बनी कि विद्या ग्लैमरस भूमिकाओं के उपयुक्त नहीं हैं. जबकि 2011 में आई द डर्टी पिक्चर में सिल्क की भूमिका से उन्होंने समूची इंडस्ट्री को ग्लैमर और हुनर से हिलाकर रख दिया था. आज भी पार्टियों में विद्या के डांस नंबर बजाए जाते हैं. फिर वजह क्या है जो विद्या का करियर हमेशा एक फेज में अटका ही नजर आता है (अभी तक) जबकि उन्होंने दमदार भूमिकाओं के साथ कई ब्लॉकबस्टर फ़िल्में भी दी हैं? क्या विद्या की फिल्मों का सब्जेक्ट उनपर भारी पड़ा रहा है?

द डर्टी पिक्चर, कहानी, इश्किया के बाद अब किसी फिल्म में विद्या बालन के होने का सीधा मतलब फिल्म का महिला प्रधान हो जाना है. तुम्हारी सुलु तक विद्या के किरदारों को देखें तो उनका अभिनय होता ही ऐसा है. जिन फिल्मों का जिक्र हो रहा है और इसमें मिशन मंगल जैसी कहानियों को जोड़ दिया जाए तो सभी हिट रही हैं. समीक्षकों ने सराहा है. दर्शकों के एक वर्ग ने भी तारीफ़ की है. हालांकि व्यापक स्तर पर विद्या के फिल्मों की पहुंच वैसी नहीं रही जैसी बॉलीवुड ही मसालेदार कहानियों की होती है. इसकी दो बड़ी वजहें साफ़ नजर आती हैं. पहली ये कि महिला प्रधान फिल्मों के लिए हिंदी का ऑडियंस उतना परिपक्व नजर नहीं आता.

दूसरी वजह देखें तो महिला प्रधान फिल्मों को बनाने वाले भी मैच्योर नजर नहीं आते. द डर्टी पिक्चर, कहानी, इश्किया और तुम्हारी सुलु औरतों की कहानी है. लेकिन इन्हें बहुत ही खूबसूरती के साथ बनाया गया. सभी फ़िल्में दर्शकों पर प्रभाव छोड़ने में कामयाब रहीं. जबकि विद्या की इसी इमेज को भुनाने की कोशिश में बॉबी जासूस, कहानी 2 और बेगम जान जैसे हादसे नजर आते हैं. फ़िल्में काफी कमजोर थीं. दर्शकों पर असर छोड़ने में नाकामयाब रहीं. नतीजा ये रहा कि बॉक्स ऑफिस पर फ़िल्में बहुत बुरी तरह पीट गईं.

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विद्या के साथ जो भी हुआ. उनके लिए एक बेहतर चीज ये है कि सशक्त अभिनेत्री के तौर पर उनका करियर लंबा खींचने वाला है. तुम्हारी सुलु जैसी फिल्मों में अपनी उम्र के हिसाब से वो जिस तरह के रोल के साथ आगे बढ़ रही हैं, आगे ऐसी कहानियां बनेंगी तो विद्या के पास ही आएंगी. रेस में वो इकलौती होंगी, क्योंकि 35 से 40 साल की उम्र के बाद कई अभिनेत्रियों के लिए फ़िल्मी दरवाजे बंद हो जाते हैं या तो वो मां और बहन की भूमिका में आ जाती हैं या फिर मैदान से बाहर. महिला प्रधान कहानियों में आगे चलकर विद्या की वही भूमिका बनती जाएगी जैसे अमिताभ के लिए इस वक्त फिल्म इंडस्ट्री में है.

इसी महीने अमित मासुरकर के निर्देशन में विद्या की मुख्य भूमिका से सजी शेरनी आ रही है. न्यूटन जैसी फिल्म दे चुके अमित ये उम्मीद जगाते हैं कि शेरनी के जरिए विद्या एक बार फिर बेमिसाल अभिनय से लोगों को लाजवाब कर दें.

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लेखक

अनुज शुक्ला अनुज शुक्ला @anuj4media

लेखक इंडिया टुडे ग्रुप डिजिटल से जुड़े हैं.

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