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Updated: 19 अप्रिल, 2022 08:27 PM
अनुज शुक्ला
अनुज शुक्ला
  @anuj4media
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बॉलीवुड को देखकर कभी-कभी लगता है कि उसके यहां की रचनात्मकता को संक्रमण खाए जा रहा. कभी 'गहराइयां' में वो अपने दौर से 25 साल आगे के भारत को दिखाने में कामयाब होता है और दूसरे ही क्षण जयेश भाई जोरदार में 25 साल पीछे चला जाता है. वैसे पीछे जाने में कोई बुराई नहीं है. वह जा सकता है, मगर उस कहानी में पीरियड ड्रामा के संदर्भ तो दिखने चाहिए. ट्रेलर में जो बैकड्राप दिखा है उससे अंदाजा लगना मुश्किल नहीं कि जयेश भाई कोई पीरियड ड्रामा नहीं है. ऐसे संदर्भ नहीं हैं- यानी भारतीय समाज को लेकर उसकी रिसर्च और समझ अभी भी पुरानी मान्यताओं से आगे बढ़ने को तैयार नहीं. या फिर वह भारत को लेकर इतना शर्मसार है कि उसके बारे में कुछ बेहतर सोच ही नहीं पा रहा.

अगले महीने 13 मई को जयेश भाई जोरदार की रिलीज से पहले यशराज फिल्म्स के नए प्रोजेक्ट का ट्रेलर आया है. यह फिल्म रणवीर सिंह, शालिनी पांडे और बोमन ईरानी की मुख्य भूमिकाओं से सजी है. फिल्म बड़े सामजिक मुद्दे की ओर ध्यान आकर्षित करने के लिए बनाई गई है. फिल्म का विषय कन्या भ्रूण हत्या है. इसमें समाज के तबके की गलत सोच को दिखाने का प्रयास नजर आता है. ट्रेलर के मुताबिक़ गांव के सरपंच और जयेश भाई के पिता (बोमन ईरानी) रहते तो नए जमाने में हैं लेकिन पुराने ख्यालों के हैं. उनका समाज भी पुराने ख्याल का है. उनका मानना है कि 'वंश' बेटों से ही पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बढ़ता है.

jayesh-bhai-jordaar-_041922020344.jpgजयेश भाई जोरदार का दृश्य.

जयेशभाई में फ्रेश जैसा कुछ दिख भी रहा है क्या?

जयेशभाई (रणवीर सिंह) की एक बेटी है. उसे बेटे-बेटी के फर्क में विश्वास नहीं है. और वह उस वैज्ञानिक प्रक्रिया को भी समझता है जिसमें बेटियों के जन्म की वजह महिलाएं नहीं बल्कि पुरुष होते हैं. जयेश की पत्नी दोबारा गर्भवती है. सरपंच और उनकी पत्नी (रत्ना पाठक शाह) पोते के आगमन की प्रतीक्षा में हैं. परिवार के साथ मनौतियां की जाती हैं और जयेश की पत्नी की भ्रूण जांच भी कराई जाती है. डॉक्टर की मदद से जयेश भ्रूण जांच के नतीजों को कुछ वक्त के लिए छिपा जाता है. लेकिन बाद में ऐसी घटनाएं होती हैं कि सरपंच को गर्भ में पल रहे कन्या भ्रूण का पता चल ही जाता है. जयेश चाहता है कि उसकी बेटी दुनिया में आए. इसके बाद कहानी में शुरू होती है कॉमिक भागमभाग. संभवत: फिल्म में मनोरंजक तरीके से यही दिखाने की कोशिश नजर आती है कि जयेश कैसे कन्याभ्रूण के खिलाफ बने विचार से संघर्ष करता है.

जयेशभाई की कहानी में नयापन जैसी कोई बात नहीं, सिवाय इसके कि संभवत: बॉलीवुड ने कन्याभ्रूण हत्या को "कॉमेडी ड्रामा" में परोसने की कोशिश की है. जबकि इसी विषय पर कई वैचारिक फिल्मों का निर्माण खुद बॉलीवुड ही पिछले तीन दशक से सही संदर्भों के साथ करता आया है. कन्याभ्रूण हत्या के खिलाफ पिछले कई दशकों में सरकार की कोशिशों, फिल्म समेत सभी संचार माध्यमों के अभियानों, सामजिक भागीदारी और दंडात्मक कार्रवाइयों का असर भी दिखा है और अब कन्याभ्रूण हत्या जैसे मामले नाममात्र बचे हैं. हां, शर्तों के साथ गर्भपात में छूट की आड़ के बहाने अभी भी इस तरह की गतिविधियां चोरी छिपे होती हैं. लेकिन कन्या भ्रूण हत्या के रूप में किसी भी समाज का सार्वजनिक विचार, अब गुजरे जमाने की चीज है. या फिर समाज में उस तरह नहीं दिखती जैसे जयेशभाई में दिखाने की कोशिश है.

नीचे ट्रेलर देख सकते हैं:-

भारत नए विचार के साथ आगे बढ़ चुका और बॉलीवुड दिमाग में कील गाड़े हुए है

अभी कुछ महीने पहले आई नुसरत भरूचा की छोरी में भी लगभग इसी विषय को अलग तरीके से कहने का प्रयास किया गया था. संदर्भ से भटका होने की वजह से वह कहानी भी समाज के साथ संवाद बनाने से चूक गई. क्यों चूक गई और जयेशभाई भी क्यों चूक सकती है- इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं. ट्रेलर में दिख रही सोच, व्यापक समाज की सोच में हूबहू या उसके आसपास नजर आती है? भले ही कन्या भ्रूण हत्या का एक मामूली विचार अभी भी मौजूद है जहां तहां, लेकिन वह उस तरह की स्वीकार्यता और व्यापकता लिए नहीं है- जैस फिल्म में दिखाया जा रहा है. समाज के हर वर्ग में धारणाएँ ज्यादा साफ़ हुई हैं और लोगों ने ऐसे कुविचार को त्याग कर आगे बढ़ने का फैसला लिया है. यह फैसला सामूहिक है.

भारत इस विचार के साथ आगे बढ़ रहा है कि संपत्तियों पर बेटों की तरह बेटियों का भी हक़ है. महिलाओं को सेना के फ्रंट पर भी जाने का हक़ है. उन्हें दुनिया के सभी बड़े मंचों पर भारत के प्रतिनिधित्व का हक़ है. उन्हें मनपसंद अंतरजातीय अंतर धार्मिक वर भी चुनने का हक़ है- अगर वे अपने भविष्य के लिए ऐसा ही फैसला लेना चाहें तो. हालांकि बेटियां अभी भी कई मोर्चों पर गैरबराबरी झेल रही हैं, बावजूद उनके जन्म लेने के मानवीय अधिकार की हत्या किसी भी रूप में अब जायज नहीं रही. कुछ लोग मध्ययुग में जी रहे, लेकिन यह उत्तर से दक्षिण तक भारतीय समाज का सार्वजनिक विचार नहीं. गिने चुने मध्ययुगीन लोगों के निजी विचार हो सकते हैं जो ज्यादा नहीं एक डेढ़ दशक में वक्त के साथ ध्वस्त हो जाएंगे. अब हम बेटियों के जन्म पर डीजे बजाते हैं. उनके जन्मदिन पर सालाना जश्न करते हैं.

गांधी के विचार को भी महिलाओं ने गलत साबित कर दिया

इसके नतीजे आसपास महसूस किए जा सकते हैं. लड़कियों की शिक्षा, उनके पहनावे, नवनिर्माण में उनकी भागीदारी. अब हमारी बेटियां हमारे वर्कफ़ोर्स का ताकतवर स्तंभ हैं. वे हमारे साथ हर मोर्चे पर कंधे से कंधा सटाकर खड़ी हैं और यह प्रमाण है कि कन्या भ्रूण हत्या और ऐसे अमानवीय विचारों पर हमने किस तरह निर्णायक विजय पाई है. महात्मा गांधी के दौर से अब तक का बदलाव ही देख लीजिए. ब्रिटिश दौर में गांधी नहीं चाहते थे कि महिलाओं को वोट का अधिकार मिले. और हमने पांच दशक पहले ही इंदिरा गांधी के रूप में देश का प्रधानमंत्री चुना. उनके कुलीन उच्चवर्गीय होने का तर्क देने वालों को याद रखना चाहिए आजादी के चार दशक बाद हमने अति शोषित समाज से मायावती को एक बार नहीं कई बार देश के सबसे बड़े राज्य का मुख्यमंत्री बनाया. और उच्च कुलीन लेकिन साधारण बैकग्राउंड से आने वाली ममता बनर्जी को भी मुख्यमंत्री बनाया. हमने लगभग सभी बड़े पदों पर महिलाओं का स्वागत किया.

बाहर क्यों ही देखना. बॉलीवुड में ही किसी भी पुरुष अभनेता के स्टारडम को चुनौती देने वाली रेखा, श्रीदेवी, कंगना रनौत और दीपिका पादुकोण को खड़ा किया. फिल्म मेकर्स के संदर्भ और प्रतीकों पर वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाना चाहिए. पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर बात करेंगे तो समाज के साथ संवाद नहीं कर पाएंगे. अपने समाज का फिर से अध्ययन करिए. वो या तो आगे निकल चुका है या अब कूढ़ मगजी को तैयार नहीं.

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लेखक

अनुज शुक्ला अनुज शुक्ला @anuj4media

ना कनिष्ठ ना वरिष्ठ. अवस्थाएं ज्ञान का भ्रम हैं और पत्रकार ज्ञानी नहीं होता. केवल पत्रकार हूं और कहानियां लिखता हूं. ट्विटर हैंडल ये रहा- @AnujKIdunia

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