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Updated: 05 सितम्बर, 2022 01:01 PM
प्रकाश जैन
प्रकाश जैन
  @prakash.jain.5688
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एक परफेक्ट रियल क्राइम स्टोरी मेगा थीम्स लिए होती हैं और कह सकते हैं ऐसी ही दिल्ली क्राइम सीजन 2 है. दो सर्वविदित तथ्य हैं; एक सामाजिक और आर्थिक विषमता सर्वत्र है, दिल्ली भी अछूती नहीं है. दूसरा 'बड़ा पुलिसिया बनता है' नवाज कर पुलिस का मजाक उड़ाने वालों की कमी नहीं हैं. इन्हीं दो बातों का जवाब तलाशती 'दिल्ली क्राइम' की यात्रा का सार इन चंद शब्दों में छिपा हुआ है, ''दो दिल्ली, एक पुलिस'. अपराध क्यों होते हैं या कहें अपराध क्यों किया जाते हैं? अक्सर सामाजिक और आर्थिक विषमता ही अपराध की वजह बनती है या कहें कि लोगों को क्राइम करने के लिए उन्मुख करती है.

650x400_082722101304.jpgदिल्ली क्राइम सीजन 2 में पहले सीजन की तरह शेफाली शाह लीड रोल में हैं.

हां, कभी कभार दीगर वजहें भी होती हैं, लेकिन उन वजहों की जड़ में भी कहीं न कहीं यही विषमता होती है. कभी नेल्सन मंडेला ने कहा था, ''When a man is denied the right to live the life he believes in, he has no choice but to become an outlaw." उनका स्पष्ट विचार था कि ''No one is born criminal.'' यही डीसीपी वर्तिका सिंह (शेफाली शाह) मानती है और कहने से परहेज नहीं करती कि अमीर और गरीब के बीच चल रहा संघर्ष और भेदभाव ही वजह बनता है, जो गरीब को अपराध करने के लिए प्रेरित करता है. हालांकि शोधकर्ताओं ने कुछ मनोवैज्ञानिक कारण भी खोजे हैं. जैसे कि शोषण, अन्याय, अशांत बचपन आदि जिसने लोगों को अपराधी बनने के लिए प्रेरित किया है. हो सकता है कि इस सीरीज का तीसरा सीजन इनमें से किसी एक वजह पर आधारित रियल क्राइम स्टोरी पर आधारित हो. वैसे सीजन 2 के क्रिमिनल्स भी इन कारणों की झलक दिखला जाते हैं. मसलन गैंग की साइको फीमेल मेंबर करिश्मा उर्फ लता (तिलोत्तमा सोम).

इस सीरीज की कहानी की बात करें तो जहां पहला सीजन 2012 के निर्भया गैंगरेप मामले पर आधारित था, वहीं सीजन 2 कच्छा-बनिया गैंग द्वारा किए गए अपराधों और उसके बाद हुई पुलिस जांच का एक काल्पनिक संस्करण है. दरअसल 90 के दशक में एक डिनोटिफाइड ट्राइबल गैंग का खूब आतंक था. आखिरी बार 2003 में इस गैंग के तब भी होने के कुछ सुराग मिले थे. ये गैंग कच्छा-बनियान पहनकर डकैती किया करता था. पर यहां मामला है कि वर्तमान समय में ये दोबारा कैसे सक्रिय हो गया? अचानक दिल्ली में संपन्न सीनियर सिटीजन कैटेगरी के नागरिकों के घरों में आधी रात को घुसकर उनकी हत्या कर दी जा रही थी, कीमती सामान, रुपए-पैसे लूट लिए जा रहे थे.

मोडस ऑपरेंडी वही कच्छा बनियान गिरोह वाली है कि इसके सदस्य अंडरवियर में आते हैं. वे अपने शरीर पर तेल भी लगाते हैं, ताकि यदि पुलिस या पब्लिक से सामना हो जाए तो पीछा करने के दौरान उन्हें पकड़ना मुश्किल हो. क्या उसी ट्राइब की पैदाइश यंगर जेनेरेशन ऑफ कच्छा-बनियान गैंग है? एक के बाद एक अनेक वारदातें हो जाती हैं. डीजीपी वर्तिका चतुर्वेदी की नाक में दम हुआ पड़ा है. सूत्र बिखरे पड़े हैं. होम मिनिस्ट्री कमिश्नर को जवाब-तलब कर रहा है. कमिश्नर विजय (आदिल हुसैन) वर्तिका पर प्रेशर बनाए हुए है. जनता, मीडिया और प्रेस अलग पीछे पड़ी है. अपनी टीम के साथ वर्तिका, जिसमें ट्रेनी एसपी नीति सिंह (रसिका दुग्गल), इंस्पेक्टर भूपेंदर (राजेश तैलंग), जयराज (अनुराग अरोड़ा), सुधीर (गोपाल दत्त), सुभाष (सिद्धार्थ भारद्वाज) समेत और भी कई लोग हैं, जो कि 24 घंटे में अपने काम में लगे हुए हैं.

दिल्ली क्राइम सीजन 2 ने यूएसपी बरकरार रखी है. वर्तिका के नेतृत्व में शो क्रिमिनल्स की तलाश पर आधारित है. क्राइम से ज्यादा किरदारों को अहमियत है. क्राइम को बेवजह सनसनीखेज नहीं बनाता, नाटकीय नहीं बनाता, बल्कि किरदारों को दर्शक महसूस करते हैं. क्राइम में लूट, नृशंस हत्याएं शामिल हैं फिर भी ओटीटी कल्चर से परहेज रखा गया है. ना तो पुलिसकर्मी ना ही संदेह के घेरे में आए जरायम की दुनिया के लोग और ना ही रियल क्रिमिनल्स ओवर द टॉप लैंग्वेज बोलते हैं. गालियां, असभ्य भाषा, अश्लीलता आदि तमाम चीजें नदारद हैं. फिर भी शो दमदार है. कनेक्ट करता है. क्योंकि सिंपल कहानी का ट्रीटमेंट आला दर्जे का है. हर सिचुएशन टेंशन बढ़ाती जाती है जिसे कंट्रीब्यूट करते हैं छोटे-छोटे प्रतीक (मसलन स्ट्रीट डॉग्स से चौंकना), क्रिमिनल हंटिंग के लिए भागदौड़, तीन मेन किरदारों की प्रोफेशनल लाइफ बनाम पर्सनल लाइफ के दुविधा भरे पल, मीडिया ट्रायल, फिल्मांकन और कैमरा वर्क, बैकग्राउंड म्यूजिक आदि आदि.

इसके साथ ही छोटे बड़े सभी किरदारों के लिए कलाकारों का चयन तो कुछ ऐसा किया गया है कि कहावत याद आती है, ''देखन में छोटे लगत घाव करें गंभीर.'' हर किरदार का एक्सप्रेशन बोलता है. भाषाई पंच शालीन हैं. मसलन, ''कई बार बचने के लिए भागने से बेटर होता है कि छिपा जाए'', ''मशीन झूठ नहीं बोलती, आदमी झूठ बोलता है'', ''दिल्ली शहर है यहां मांग के नहीं मिलता न छीन के लेनी पड़ती है''. पुलिस टीम के आला अफसरों के बीच के संवाद अंग्रेजी में होते हुए भी सादगी से परे नहीं हैं, सो अखरते नहीं हैं. ये सीरीज पुलिस की "पुलिसिया" इमेज को तोड़ती है, परंतु एप्रोच वन साइडेड नहीं है. पुलिस का स्याह पक्ष भी दिखाती है, लेकिन विस्तार नहीं देती. पहला सीजन खूब भाया था, सराहा भी गया था. बड़ी वजह थी निर्भया मामले का ज्वलंत होना. लेकिन ईमानदारी से देखेंगे तो दूसरा सीजन भी अच्छा लगेगा. कह सकते हैं उन्नीस भर ही है.

एक्टिंग की बात क्यों करें? छंटे हुए कलाकार हैं तो अभिनय भी छंटा हुआ ही न करेंगे. किस किस की बात करें? सभी एक से बढ़कर एक हैं. शेफाली शाह की तो आंखें ही लैंग्वेज हैं. हां, सरप्राइजिंग एलिमेंट हैं, तिलोत्तमा शोम. गजब की साइको लगी हैं. अंततः शो अनुत्तरित छोड़ देता है, ''Unfortunately we seldom understand why people commit these types of crimes, Criminals can't explain it when we ask." हां, एक सस्पेंस रह जाता है जिसका अनसुलझा रहना ही नियति है. वह है कि सिस्टम के टॉप आर्डर का ईगो जिसे मातहत की उपलब्धि गंवारा नहीं होती. वर्तिका का प्रमोशन विथ ट्रांसफर होता है. किसी रिमोट जगह के लिए, चूंकि हिम्मत की कीमत तो चुकानी ही पड़ेगी.

लेखक

प्रकाश जैन प्रकाश जैन @prakash.jain.5688

सुनता सब की हूं लेकिन दिल से लिखता हूं, मेरे विचार व्यक्तिगत हैं.

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