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Updated: 25 मई, 2021 09:57 PM
अनुज शुक्ला
अनुज शुक्ला
  @anuj4media
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संजय लीला भंसाली की फिल्म बैजू बावरा में दीपिका पादुकोण को 'डकैत क्वीन' रूपमति का किरदार ऑफर हुआ है. दीपिका से पहले भी बॉलीवुड के दिग्गज मेल-फीमेल एक्टर्स ने फ़िल्मी पर्दे पर डकैतों के जीवन को जिया है. पिछले सात दशक में कई दर्जन फ़िल्में डकैतों पर आई हैं. लेकिन छाप छोड़ने में कुछ फ़िल्में ही कामयाब हुईं. महिला डकैतों की कहानियां तो नाममात्र हैं.

डकैतों के जीवन के बारे में दिलचस्पी बढ़ाने में बॉलीवुड शोमैन राजकपूर का बहुत बड़ा योगदान माना जा सकता है. संभवत: उन्होंने ही सबसे पहले साल 1951 में डाकू जग्गा (रोल में केएन सिंह) को लेकर आवारा बनाई थी. जिन्होंने आवारा देखी है वो जानते हैं कि जग्गा कैसे फिल्म की कहानी का बड़ा सूत्र है. वर्ल्ड क्लासिक "मदर इंडिया" (1957) में भी सुनील दत्त डाकू बने नजर आए थे.

लेकिन राजकपूर की जिस देश में गंगा बहती है (1960) डकैतों पर आधारित वो ट्रेंड सेटर फिल्म है जिसने बॉलीवुड को वो रास्ता दिखाया जो अबतक बॉक्स ऑफिस सक्सेस की गारंटी बना हुआ है. जिस देश में गंगा बहती है में प्राण ने डाकू राका की कालजयी भूमिका निभाई थी. शोले के गब्बर सिंह (अमजद खान) के बाद राका सर्वश्रेष्ठ किरदार है.

जिस देश में गंगा बहती है के बाद तो ग्रामीण पृष्ठभूमि पर बनने वाली ज्यादातर फिल्मों में एक्शन मसाले के तौर पर डकैत कहानी का अहम हिस्सा बनते गए. मल्टी स्टारर शोले की तूफानी सफलता ने तो इस ट्रेंड को मजबूती से स्थापित कर दिया. डकैतों की मुख्य कहानी पर आधारित अहम फिल्मों में मुझे जीने दो (1963), अंदाज (1955), सूरज (1966), मेरा गांव मेरा देश (1971), मेला (1971), समाधि (1972), हीरा (1973), प्राण जाए पर वचन ना जाए (1974), पत्थर और पायल (1974), गंगा की सौगंध (1978), भोला भाला (1978), धरम काँटा (1982), गंगा और सूरज (1980), ज्वाला डाकू (1981), डकैत (1987), जय विक्रांता (1995), पान सिंह तोमर( 2010) और सोनचिरैया (2019) जैसी कई फ़िल्में हैं.

दिलीप कुमार, राजेन्द्र कुमार, धर्मेन्द्र, विनोद खन्ना, अमिताभ बच्चन, राजेश खन्ना, सन्नी देओल, संजय दत्त, इरफान, मनोज वाजपेयी सुशांत सिंह राजपूत जैसे दिग्गजों ने भूमिका निभाई. ज्यादातर फ़िल्मी कहानियों का प्लाट जमीन पर कब्जे के खिलाफ सुनवाई नहीं होने पर हथियार उठा लेना, सामतों के अत्याचार का बदला लेने के लिए नायक का डाकू बन जाना रहा है. कुछ कहानियों में विलेन के रूप में डाकू ही होता था जो किसी पुलिस अफसर या फिर जज से बदला लेने के लिए उसके बच्चे को अगवा कर लेता था.

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बॉलीवुड की ये फ़िल्में पुरुष डकैतों की कहानियां भपूर हैं. फ़िल्मी कथानक का छोटा-मोटा हिस्सा रहे डकैतों सी ग्रेड फिल्मों को जोड़ दें तो ये लिस्ट बहुत लंबी चौड़ी है. लिस्ट अभी भी अपडेट की जा सकती है. इसमें अगले महीने रणबीर कपूर की पीरियड ड्रामा "शमशेरा" और एसएस राजमौली की एक्शन पीरियड ड्रामा "RRR" को जोड़ा जा सकता है जिसमें अजय देवगन डकैत की भूमिका में हैं.

खैर, ये फ़िल्में मुख्य रूप से पुरुष डकैतों पर है. जाहिर तौर पर चंबल के बीहड़ से महिला डकैत भी खूब निकलीं और उनसे प्रेरित होकर बॉलीवुड ने फ़िल्में भे बनाई. अगर मैं गलत नहीं हूं तो शायद "पुतलीबाई" फीमेल लीड में डकैतों की पहली फिल्म है. ये साल 1972 में रिलीज हुई थी. पुतलीबाई को चंबल की पहली महिला डकैत माना जाता है. वो नाचने गाने वाली थी जो इसी पेशे की वजह से डाकू सुल्ताना के संपर्क में आई थी और बाद में उससे प्यार करने लगी थी. पुतलीबाई का असली नाम गौहरबानो था. सुल्ताना पुलिस एनकाउंटर में मारा गया था. बाद में पुतलीबाई ने उसकी जगह गिरोह की कमान संभाली. चम्बल के इलाकों में आज भी पुतलीबाई की फंताशी है. अशोक रॉय के निर्देशन में बनी फिल्म में जया माला ने पुतलीबाई की भूमिका निभाई थी. साल 2000 से पहले इसी टाइटल पर एक बीग्रेड फिल्म भी आई थी.

दीपिका अगर डकैत का रोल कर रही हैं तो वो चुनौतीपूर्ण भूमिका निभाने के मामले में खुशनसीब हैं. दरअसल, बीग्रेड सिनेमा को छोड़ दें तो बॉलीवुड की मुख्यधारा ने फीमेल डकैतों पर नाममात्र की फ़िल्में बनाई हैं. श्रीदेवी, सीमा विश्वास और भूमि पेडणेकर के रूप में कुछ गिनी चुनी एक्टर्स को ही किरदार जीने का मौका मिला है. कुछ फिल्मों में छोटे-मोटे फीमेल एक्टर्स ने डकैतों के किरदार जरूर किए लेकिन वो दिखावे भर के लिए थे. वैसे फीमेल गैंगस्टर्स की दर्जनों यादगार भूमिकाएं हैं. लेकिन डकैत के बड़े किरदार की बात करें तो पुतलीबाई के बाद साल 1988 में आई श्रीदेवी स्टारर शेरनी अहम है.

शेरनी में श्रीदेवी ने बंजारन लड़की दुर्गा की भूमिका निभाई है जो गांव के ठाकुर के अत्याचार से तंग आकर बंदूक उठा लेती है और चुन चुनकर बदला लेती है. प्राण ने दुर्गा के बंजारा पिता की भूमिका निभाई है जबकि शत्रुघ्न सिन्हा पुलिस ईमानदार पुलिस अफसर की भूमिका में हैं. पूरी फिल्म श्रीदेवी अकले अपने कंधे पर ढोती दिखती हैं.

सिनेमा के इतिहास में बैंडिट क्वीन के अलावा किसी भी कहानी में बीहड़ की महिला डकैतों का जीवन और संघर्ष उभरकर सामने नहीं आ पाया. जबकि पुरुष कहानियों में कई अच्छी फ़िल्में और दर्जनभर यादगार किरदार मिल जाते हैं. महिला डकैत के रूप में सिनेमा इतिहास में अबतक का सबसे आइकानिक किरदार सीमा बिस्वास के हिस्से है. साल 1996 में शेखर कपूर ने बेहमई हत्याकांड की वजह से सुर्ख़ियों में आईं फूलन देवी के जीवन पर "बैंडिट क्वीन" बनाई थी. सीमा ने उत्पीड़न के खिलाफ प्रतिशोध लेने वाली फूलन देवी के किरदार को जीवंत कर दिया था. बैंडिट क्वीन कायदे से बायोग्राफिकल आर्ट फिल्म थी, लेकिन शेखर कपूर ने जिस तरह कहानी कही और कलाकारों ने अभिनय किया उसने बॉक्स ऑफिस पर रौनक ला दी. करीब 3 करोड़ 25 लाख के बजट में बनी फिल्म ने ज्यादातर गुमनाम कलाकारों के साथ बॉक्स ऑफिस पर 21 करोड़ से ज्यादा रुपये कमाए थे. उस समय ये कमाई नामचीन स्टारकास्ट और बड़े बैनर की फिल्मों के बराबर या ज्यादा है.

सीमा बिश्वास के अब तक के करियर में बैंडिट क्वीन सबसे बड़ा किरदार है. भूमिका के लिए उन्हें अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सराहा गया. उन्होंने सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी जीता. दो साल पहले चम्बल के डकैतों की कहानी पर आधारित सोन चिरैया में भी भूमि पेडणेकर ने डकैत का अच्छा किरदार निभाया था. हालांकि फिल्म बॉक्स ऑफिस पर बैठ गई इस वजह से उनके किरदार की ज्यादा चर्चा नहीं हुई.

शेरनी और बैंडिट क्वीन की देखा देखी 90 के दशक में दर्जनों सी ग्रेड फ़िल्में फीमेल लीड को केंद्र में रखकर बनाई गईं. बैंडिट क्वीन को छोड़ दें तो पुतलीबाई हो शेरनी या सी ग्रेड फ़िल्में- महिला डकैतों के बहाने मेकर्स सिर्फ मसालेदार कहानियों में ग्लैमर परोसते दिखे. घटिया कथानक, खराब प्रस्तुतीकरण ने शेरनी और दूसरी फिल्मों का हश्र बुरा किया.

अब अगर दीपिका बैजू बावरा करती हैं तो ये देखने वाली बात होगी कि वो डकैत के रूप में कैसा बेंचमार्क सेट करेंगी. सीमा बिश्वास तक पहुंच पाना ही उनके लिए बड़ी बात होगी.

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लेखक

अनुज शुक्ला अनुज शुक्ला @anuj4media

ना कनिष्ठ ना वरिष्ठ. अवस्थाएं ज्ञान का भ्रम हैं और पत्रकार ज्ञानी नहीं होता. केवल पत्रकार हूं और कहानियां लिखता हूं. ट्विटर हैंडल ये रहा- @AnujKIdunia

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