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Updated: 08 अप्रिल, 2021 04:40 PM
अनुज शुक्ला
अनुज शुक्ला
  @anuj4media
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सालभर बाद कोरोना की दूसरी लहर ने सबको परेशान कर दिया है. पूरे देश में पुणे के साथ मुंबई और थाणे महामारी का केंद्र बिंदु बना हुआ है. रोज बेतहाशा मामले आ रहे हैं और मौते हो रही हैं. नतीजन उद्धव ठाकरे की सरकार को कोरोना महामारी का प्रसार रोकने के लिए सख्त नियम लगाने पड़े हैं. मुंबई देश की राजधानी के साथ ही मनोरंजन उद्योग का भी सबसे बड़ा उत्पादक और बाजार है. लाखों घरों में इसके जरिए ही रोजी-रोटी चल रही है. पिछली बार महीनों धंधा बंद पड़ा रहा और लाखों लोगों को भारी मुसीबतों का सामना करना पड़ा. धीरे-धीरे सिनेमा घर खुल रहे थे, धंधा जगमग करता भी नजर आने लगा था.

फिल्म इंडस्ट्री पिछले साल के संकट से उबर ठीक से उबर तो नहीं पाई थी. लेकिन कुछ हफ़्तों पहले तक कोरोना के मामलों में कमी और OTT प्लेटफॉर्म्स की वजह से इंडस्ट्री का धंधा चल रहा था. दूसरी लहर ने कोढ़ में खाज का काम कर दिया. ये अलग बात है कि दूसरी लहर के बाद पाबंदियां पिछले साल की तरह नहीं हैं मगर इस बार के हालात ज्यादा खराब हैं. मेहनत और प्रतिभा के आधार पर इंडस्ट्री में रोजी-रोटी कमा रहे लोगों के लिए तो ये ऐसी मुसीबत है जिसका कोई हल नहीं. कोरोना ने इंडस्ट्री में अमीर-गरीब की खाई को बढ़ा दिया. बड़ा बैनर और बड़े सितारों को भी नुकसान हो ही रहा है मगर जिनकी हैसियत मामूली है और जो रोज कुआं खोदकर पानी पीने वाले हैं दोहरी मार झेलने को विवश हो रहे हैं. एक तो उन्हें नया काम नहीं मिल रहा और जो कुछ किसी तरह चल रहा था कोरोना का साया एक बार फिर उसपर पड़ चुका है.

इनके पास पैसा है संसाधन है सबकुछ है, आपके पास क्या है?

अभी खबर आई कि सलमान खान के साथ टाइगर 3 में काम कर रही कटरीना कैफ को कोरोना हो गया. लेकिन इसका असर फिल्म निर्माण पर नहीं पड़ने जा रहा. फिल्म यशराज बैनर की है. जाहिर सी बात है बड़े बजट की फिल्म है. कोविड प्रोटोकाल के साथ यशराज स्टूडियो में सलमान के हिस्से की शूटिंग जारी है. यशराज स्टूडियो में शाहरुख की पठान जिसमें दीपिका पादुकोण और जॉन अब्राहम हैं उसकी हो रही है. शाहरुख-सलमान क्या अन्य जो भी बड़े सितारे हैं उनकी फिल्मों की शूटिंग जारी है. अक्षय कुमार ने तो पहली लहर के कमजोर पड़ने के साथ ही कई फ़िल्में पीट दीं.

पर ये तो इंडस्ट्री के नामचीन कलाकारों और बड़े बैनर्स  की फिल्मों का एक हिस्सा भर है. बस ये बड़ा है. इनके पास पैसा है, संसाधन है और कर्मचारी हैं. और जैक भी. सबकुछ है. भले ही थोड़ा खर्चीला है मगर काम तो चल ही जा रहा है. लेकिन इंडस्ट्री के दूसरे हिस्से को देखें तो उन्हें मुसीबतों से दो चार होना पड़ रहा है. भला किल्लत वाले ऐसे दौर में कितने संसाधनहीन हैं जो स्टूडियो और कोविड प्रोटोकाल के तामझाम अफोर्ड कर सकते हैं. जबकि पिछले दो दशक में ऐसे लोग अपनी प्रतिभा और काम से "क्रांति" करते नजर आए हैं.

नए लोगों का आना बंद पुराने इंडस्ट्री छोड़ रहे

स्टूडियो नहीं मिल रहा है. कलाकार नहीं मिल रहे. नए स्ट्रगलर नहीं आ रहे. इसलिए की कोरोना के प्रोटोकाल ने वो लिंक ही कमजोर कर दी जो हर रोज सैकड़ों कलाकारों को इंडस्ट्री के दरवाजे पर पहुंचा देती है. छोटे-मझोले प्रोजेक्ट बंद हो रहे. मजदूर नहीं मिल रहा. बड़ी संख्या में कोरोना की पहली लहर में ही मुंबई छोड़कर जा चुके हैं जो अब तक लौटे भी नहीं हैं. जो कुछ हो रहा है उस प्रक्रिया में अंदाजा लगाना मुश्किल है कि कितने हजार लोग भुखमरी की ओर आगे बढ़ रहे हैं. जिनके पास बचत है वो जद्दोजहद कर रहे हैं, लेकिन जिनकी अंटी में कुछ नहीं उनका भागना ही एकमात्र विकल्प है. कई को दूसरी लहर में निकलना पड़ रहा है.

महामारी से ज्यादा से खतरनाक है इंडस्ट्री में बेरोजगारी

दरअसल, जिस तरह की स्थिति बन गई है उसमें कोरोना प्रोटोकाल को फॉलो करते हुए मामूली बजट वालों का अपने प्रोजेक्ट पर काम करना मुश्किल है. छोटी एड फ़िल्में बना रहे और कुछ फिल्मों को असिस्ट कर चुके ऐसे ही स्ट्रगलर रूद्रभानू प्रताप सिंह ने लिखा- "लॉकडाउन की आशंका से बुरी तरह डरे प्रवासी मजदूरों ने फिर से मुम्बई से पलायन शुरू कर दिया है. शूटिंग यूनिट में भारी कटौती की जा रही है. फिर से वहीं सब शुरू हो रहा है जो साल भर पहले हुआ था. सरकार का एक फैसला करोड़ों लोगों का रोजगार एक झटके में छीन लेता है. लॉकडाउन की आशंका और बिन बुलाये आने वाली बोरोजगारी के डर से सहमे लोग पिछली बार की गलती नहीं करना चाहते. इसलिए अभी से निकलना शुरू हो गए हैं. ये बेरोजगारी...बेकारी...महामारी से ज्यादा खतरनाक है. सरकार बहादुर एक साल से थाली बजा रही है. न कोई रणनीति है न कोई इंतजाम. एक साल पहले जहां से चले थे आज फिर से वहीं पहुंच गए."

इंडस्ट्री का आँखों देखा अनुभव, दर्द छलक रहा है

ये आँखों देखी इंडस्ट्री के उस आदमी की है जिसके पास हुनर और हौसला दोनों है पर हालात के आगे विवश हो गया है. कुछ वेब सीरीज और अन्य पटकथाएं लिख चुके सर्वेश दीनानाथ उपाध्याय एक लम्बी फेसबुक में अपने अनुभव के आधार पर मुंबई के मौजूदा हालात को लेकर लिखते है- "सत्य ये है कि लोगों को कोरोना से मरने का भय नहीं है, क्योंकि उनके लिए सबसे बड़ी जंग है रोज़ कुआँ खोदना और रोज़ पानी पीना है. भौतिकवादी लाइफफस्टाइल और भागती हुई इस जिंदगी में कल क्या होगा इसकी परवाह अब आम नागरिक नहीं करना चाहता है. आम आदमी सिर्फ और सिर्फ इस जुगाड़ में लगा है कि आज पैसे कैसे आएंगे. नेताओं ने आम आदमी को इसी जुगत में फंसा दिया है. इसीलिए चुनाव में मुद्दे कभी रोजगार, बिजली, पानी, स्वास्थ्य आदि हावी नहीं हो पाते क्योंकि ये मुद्दे उठाने वाला आम आदमी सुबह निकल जाता है और दिनभर जूझने के बाद शाम को खाने का इंतजाम करके लौट आता है...."

फिल्म इंडस्ट्री से जुड़े अन्य लोग भी लगभग इसी तरह की पीड़ा से दो चार हो रहे हैं और सोशल मीडिया में उनका छलकता दिख रहा है. मौजूदा हालात में लग तो यही रहा हैं कि सुविधा संपन्न शाहरुख-सलमान और अक्षय कुमार जैसे सितारों का तो कुछ नहीं बिगड़ेगा, मगर कोरोना की दूसरी लहर इंडस्ट्री के लोप्रोफाइल मेहनतकशों की कमर तोड़ रही है.

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लेखक

अनुज शुक्ला अनुज शुक्ला @anuj4media

लेखक इंडिया टुडे ग्रुप डिजिटल में पत्रकार हैं.

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