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Updated: 26 जुलाई, 2022 05:00 PM
अनुज शुक्ला
अनुज शुक्ला
  @anuj4media
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पीरियड ड्रामा शमशेरा के फ्लॉप होने के बाद यशराज फिल्म्स अपने महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट 'पठान' में व्यस्त हो गया है. पठान असल में यशराज फिल्म्स के 'स्पाई यूनिवर्स' की चौथी फिल्म है. इससे पहले बैनर ने एक था टाइगर, टाइगर जिंदा है और वॉर बनाई थी. स्पाई यूनिवर्स की तीनों फ़िल्में टिकट खिड़की पर ब्लॉकबस्टर थीं. सिद्धार्थ आनंद के निर्देशन में बनी 'पठान' को अगले साल रिपब्लिकडे वीक पर 25 जनवरी को रिलीज करने की तैयारी है. अब फिल्म के प्रचार-प्रसार के तहत ही मुख्य फीमेल लीड दीपिका पादुकोण का भी पहला लुक साझा किया गया है. शाहरुख खान लुक पहले ही समाने आ चुका है. पठान अनाउंसमेंट के साथ ही चर्चा में है.

दीपिका पादुकोण के लुक को बैनर ने मोशन पोस्टर के साथ जारी किया है. पोस्टर में दीपिका टारगेट पर गन ताने नजर आती हैं. उनके माथे पर जख्म के निशान भी हैं. बताने की जरूरत नहीं कि पठान बैनर के अन्य स्पाई फिल्मों की तरह ही एक्शन मसाले से भरपूर है. शाहरुख, दीपिका के साथ फिल्म में जॉन अब्राहम भी अहम भूमिका में हैं. हिंदी बेल्ट में एक अदद क्लीन हिट के लिए तरस रहे यशराज फिल्म्स को पठान से बहुत उम्मीदें हैं. शाहरुख के लिए भी जो सालों से क्लीन हिट की तलाश में हैं. रणबीर कपूर और संजय दत्त स्टारर पीरियड ड्रामा 'शमशेरा' के सुपर फ्लॉप हो जाने के बाद यशराज फिल्म्स को भरोसा है कि शायद पठान ही वो फिल्म साबित हो जिसके सहारे बैनर बॉक्स ऑफिस पर अपने पुराने रुतबे को पा सकता है.

ऐतिहासिक हादसे रचने वाले यशराज फिल्म्स के लिए दक्षिण कितना दूर है?

पठान के लिए यशराज की अपेक्षाएं आसमान से भी बड़ी नजर आ रही हैं. निर्माताओं ने इसे बनाने के लिए पानी की तरह पैसा बढ़ाया है. भले शाहरुख और जॉन अब्राहम बॉक्स ऑफिस पर सफलता के लिए परेशान हों मगर इसमें कोई शक नहीं कि दीपिका समेत पठान की तीनों बड़े चेहरे बॉलीवुड के सबसे बड़े कलाकारों में शुमार किए जाते हैं और निश्चित ही हिंदी बेल्ट में किसी भी तरह का करिश्मा दिखाने में सक्षम हैं. मगर पठान के मेकर्स का इरादा दक्षिण में भी तूफ़ान मचाने का लग रहा है. और शायद इसी वजह से पठान को डब कर दक्षिण में भी रिलीज करने की योजना है. दीपिका के मोशन पोस्टर्स को दक्षिण की भाषाओं में भी जारी किया गया है जो इसे पुख्ता भी करता है. मगर सवाल है कि बंटी और बबली 2, जयेश भाई जोरदार, सम्राट पृथ्वीराज और शमशेरा जैसे ऐतिहासिक हादसे रचने के बाद बैनर किस आधार पर दक्षिण में सफलता की उम्मीद पाले बैठा है?

pathaanपठान में दीपिका और शाहरुख खान का लुक.

अभी फिल्म का ट्रेलर आना बाकी है. ट्रेलर के साथ ही पठान से जुड़ी तमाम बातें साफ हो पाएंगी. मगर पिछले कुछ सालों में बैनर की तमाम फिल्मों को देखें तो कई बड़े सवाल सामने खड़े हो जाते हैं. सबसे बड़ी समस्या तो यही है कि पठान के किसी भी एक्टर में दक्षिण के ऑडियंस को प्रभावित करने वाला स्टारडम तो नजर नहीं आता. यही कंडीशन हिंदी बेल्ट में साउथ के सितारों के साथ भी लागू होती है. लेकिन टीवी प्रीमियर के जरिए साउथ के तमाम सितारों के काम से हिंदी बेल्ट के दर्शक प्राय: परिचित रहे हैं और जब उनकी फ़िल्में हिंदी बेल्ट के सिनेमाघरों में लगी अच्छे कंटेंट ने दर्शकों को आकर्षित किया. अब तक जितनी भी पैन इंडिया फ़िल्में आईं, उसमें से ऐसी कोई फ़िल्में नहीं हैं जिसने दर्शकों पर प्रभाव ना छोड़ा हो. मगर बॉलीवुड की तमाम फ़िल्में भी डब करके दक्षिण में रिलीज की गईं हालांकि एक भी उल्लेखनीय सफलता हासिल करते नहीं दिखती. तो यहां बॉलीवुड नक़ल भर करते दिख रहा कि साउथ की तरह एक अलग टेरिटरी में फ़िल्में रिलीज कर सफलता हासिल कर लेगा.

दक्षिण की मेकिंग प्रोसेस के आसपास भी नजर नहीं आता बॉलीवुड, शमशेरा का उदाहरण ही देख लीजिए

दूसरी महत्वपूर्ण बात दोनों इंडस्ट्री के बीच फिल्म मेकिंग की प्रोसेस भी है. दक्षिण के फिल्म मेकर किसी प्रोजेक्ट पर काम करने से पहले ढेरों तैयारियां करते हैं. रिसर्च का काम बड़े स्तर पर होता है. उदाहरण के लिए केजीएफ़ के मेकर्स ने दूसरा पार्ट बनाने से पहले देश के अलग-अलग भाषा भाषी दर्शकों के बीच सर्वे कराया और उसमें से कॉमन सजेशन निकालकर काम किए गए. अन्य भाषाओं के स्टार्स की कास्टिंग भी इसमें की जाती है. बॉलीवुड की पैन इंडिया फिल्मों में यह कोशिश आंशिक दिखती है. मगर कल्चरली छोटी-छोटी चीजों को नजरअंदाज कर दिया जाता है. बॉलीवुड की शमशेरा और साउथ की आरआरआर के उदाहरण से इसे समझना मुश्किल नहीं हैं. दोनों फिल्मों की कहानियां अंग्रेजों के औपनिवेशिक संत्रांस से संघर्ष की है. मगर शमशेरा में औपनिवेशिक सवाल, जाति के सवाल और दूसरी तमाम चीजें घुसी नजर आती हैं. इसका नतीजा यह होता है कि फिल्म की कहानी फोकस से भटक जाती है.

शमशेरा और आरआरआर या दूसरी साउथ की फिल्मों में एक और फर्क नजर आता है. दोनों फिल्मों की कहानी लगभग एक जैसे पीरियड की हैं, दोनों में हीरोइन हैं- मगर दोनों का फोकस अलग है. आरआरआर में आलिया भट्ट कहीं एक्सपोजर करते नहीं दिखतीं, जबकि शमशेरा में वाणी कपूर गैरजरूरी देह प्रदर्शन करते नजर आती हैं. पुष्पा केजीएफ 2 में भी यह कहानी की डिमांड के हिसाब से ही दिखता है. यह भी देखना चाहिए साउथ सांस्कृतिक चीजों को बहुत प्रमुखता से दिखाता है. अनिवार्य तौर पर. मंदिर, मस्जिद, चर्च, स्थानीय त्योहार, स्थानीय साज-सज्जा और ड्रेसिंग आदि दक्षिण की फिल्मों में नजर आएगी ही आएगी भले ही उनका विषय कुछ भी हो. मगर बॉलीवुड की ज्यादातर कहानियों में यह कहीं होता ही नहीं है.

अब सवाल है कि क्या यशराज ने भी साउथ के फिल्म मेकर्स की तरह पठान के लिए कितनी तैयारियां की गई हैं? शमशेरा को देखने वाले तमाम दर्शक तो यही बता रहे कि फिल्म बाहुबली, आरआरआर और केजीएफ़ 2 की जबरदस्ती की नक़लभर है. क्या यशराज का बैनर पठान को 83 और सम्राट पृथ्वीराज की तरह दक्षिण के कुछ सिनेमाघरों में दिखाकर दक्षिण जैसी सफकता पा सकता है? पठान अगर दक्षिण में सफल हो जाती है तो यह बॉलीवुड के लिए एक उपलब्धि ही होगी जो लगभग असंभव है. यह जरूर है कि फिल्म हिंदी दर्शकों का भरपूर मनोरंजन करे.

लेखक

अनुज शुक्ला अनुज शुक्ला @anuj4media

ना कनिष्ठ ना वरिष्ठ. अवस्थाएं ज्ञान का भ्रम हैं और पत्रकार ज्ञानी नहीं होता. केवल पत्रकार हूं और कहानियां लिखता हूं. ट्विटर हैंडल ये रहा- @AnujKIdunia

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