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Updated: 19 सितम्बर, 2019 05:28 PM
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सऊदी अरब के साथ-साथ पूरी दुनिया के लिए 14 सितंबर का दिन हैरान कर देने वाला था. ईरान समर्थित यमन के एक विद्रोही ग्रुप हूती के लड़ाकों ने दर्जन भर ड्रोन्स के जरिए सऊदी की क्रूड ऑयल प्रोसेस करने वाली फैसिलिटी अबैक पर हमला कर दिया. ये क्रूड ऑयल प्रोसेसिंग की दुनिया की सबसे बड़ी फैसिलिटी है. इसके अलावा दूसरी सबसे बड़ी फैसिलिटी खुरैस पर भी हमला हुआ. सऊदी अरब की तेल उत्पादन वाली सरकारी कंपनी सऊदी अरैमको पर हुए इन हमलों ने दोनों ही रिफाइनरी का काम ठप कर दिया. उत्पादन रुकने से दुनिया में तेल की कीमतों में करीब 10 फीसदी की बढ़ोत्तरी हुई, जो पिछले 10 सालों की सबसे बड़ी बढ़ोत्तरी है. इसने वाशिंगटन से लेकर बीजिंग और नई दिल्ली तक दुनिया की बड़ी-बड़ी अर्थव्यवस्थाओं और निवेशकों के माथे पर शिकन लाने का काम किया है. चिंता ये है कि इस हमले का वैश्विक स्तर पर कितना बड़ा असर पड़ेगा.

सैन्य विशेषज्ञ काफी समय से हथियारों से लैस ड्रोन्स की बढ़ती तादात को लेकर भविष्य के युद्ध की चिंता व्यक्त कर रहे हैं. हथियारों से लैस ये ड्रोन न सिर्फ एयरक्राफ्ट्स, टैंक और सैनिकों पर हमला कर रहे हैं, बल्कि एयरबेस, सामान लाने-ले जाने के ठिकानों और यहां तक कि हथियारों को रखने की जगहों को भी अपना निशाना बना रहे हैं. दर्जन भर ड्रोन्स पर महज करीब 1.5 लाख डॉलर खर्च कर के हूती लड़कों द्वारा अरबों का नुकसान किया जा रहा है.

सऊदी अरब, ड्रोन हमला, युद्धअमेरिकी सरकार और डिजिटल ग्लोब द्वारा जारी की गई हमले से पहले की अबैक ऑयल प्रोसेसिंग फैसिलिटी की सैटैलाइट इमेज.

वैसे इस तरह का हमला पहली बार नहीं हुआ है. 6 जनवीर 2018 को भी अज्ञात जगह से आए हथियारों से लैस 13 ड्रोन्स ने सीरिया के हमेमिन एयरबेस और टार्टस नवल बेस पर हमला कर दिया था, जिनका इस्तेमाल रूस कर रहा था. ये हमला दुनिया का पहला ऐसा बड़ा हमला था, जिसे बहुत सारे ड्रोन्स के जरिए अंजाम दिया गया था. रूस की सेना ने पिछले साल अप्रैल, जून और अगस्त में भी ऐसे हमलों का सामना किया, जिनमें कुल 47 ड्रोन्स को मार गिराया गया. युद्ध में ड्रोन का इस्तेमाल करने की शुरुआत सीआईए ने की, जब अक्टूबर 2001 में उसने अफगानिस्तान में तालिबान पर टारगेट करते हुए हमला किया था. इसके बाद 15 सालों का कैंपेन शुरू हुआ, जिसके बाद अफगानिस्तान-पाकिस्तान इलाके में 400 से भी अधिक हमले किए गए.

अब सैन्य विशेषज्ञ सऊदी हमले की स्टडी करेंगे, क्योंकि अब और भी संगठन या देश ऐसा कर सकते हैं. जिस तरह से हूती लड़ाकों के ठिकाने से उड़े इन ड्रोन्स ने 1500 किलोमीटर दूर जाकर सऊदी अरब में हमला किया और सऊदी अरब का डिफेंस सिस्टम उन्हें डिटेक्ट तक नहीं कर सका, वह अभी तक एक रहस्य ही है.

हूती लड़ाके करीब 5 सालों से सऊदी अरब और यूएई की सेना के साथ लड़ रहे हैं. अब वह हमले के लिए ड्रोन्स का भी इस्तेमाल कर रहे हैं. 2018 में हूती लड़ाकों ने अबु धाबी एयरपोर्ट पर ड्रोन्स का इस्तेमाल करते हुए 3 हमले किए थे. पिछले कुछ महीनों में उन्होंने सऊदी अरब के शहरों पर मिसाइलों और ड्रोन्स की बारिश कर दी है. सऊदी अरब और यूएई दोनों ही यमन में मौजूद हूती लड़ाकों के खिलाफ चीन से सप्लाई किए गए ड्रोन्स का इस्तेमाल कर रहे हैं.

अमेरिका के विशेषज्ञों ने अबैक रिफाइनरी पर हमले के करीब 17 प्वाइंट्स की पहचान की है. सऊदी अरब के अधिकारियों के अनुसार इस हमले में 18 ड्रोन और 7 क्रूस मिसाइलों का इस्तेमाल किया गया था, जिनमें ईरान के डेल्टा ड्रोन भी थे.

सऊदी अरब, ड्रोन हमला, युद्धअमेरिका के विशेषज्ञों ने अबैक रिफाइनरी पर हमले के करीब 17 प्वाइंट्स की पहचान की है.

करीब 150 साल पहले कॉन्फेडरेट सबमरीन, एच एल हुनले ने हथियारों से लैस सबमरीन द टॉरपीडो के जरिए एक भयानक शुरुआत कर दी थी, जब इसने यूनियन वॉरशिप, यूएसएस हॉसेटोनिक पर अमेरिकन सिविल वॉरक के दौरान हमला कर के उसे डुबा दिया था.

14 सितंबर को ड्रोन्स के जरिए सऊदी अरब के तेल टैंकरों पर किया गया हमला भी वैसा भी भयानक हमला है. इसने कम खर्च वाले ड्रोन्स की मदद से भारी-भरकम नुकसान करने की शुरुआत कर दी है और अब इससे निपटने वाले सिस्टम पर एक नजर डालना जरूरी हो गया है. अप्रैल 2019 में एक ग्लोबल मार्केट रिसर्च एजेंसी ट्रांसपैरेंसी मार्केट रिसर्च ने अंदाजा लगाया था कि पूरी दुनिया में 2025 तक ड्रोन्स को काउंटर करने वाला सिस्टम 1.2 अरब डॉलर का हो जाएगा. अब ये मुमकिन दिख रहा है, क्योंकि पारंपरिक एयर डिफेंस सिस्टम ड्रोन्स से निपटने में नाकाम होता दिख रहा है.

सऊदी अरब में अमेरिका का पैट्रिओट-3 एयर डिफेंस मिसाइल सिस्टम लगा है, जो इन ड्रोन्स को डिटेक्ट करने में फेल हो गया. जब रूस से राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन ने रियाध मॉस्को के एस-400 एयर डिफेंस सिस्टम की पेशकश की थी, तो उन्होंने यही प्वाइंट उठाया था.

अब अगर भारत की बात करें तो गुजरात के जामनगर में रिलायंस इंडस्ट्रीज की दुनिया की सबसे बड़ी रिफाइनरी है, जो भारत-पाक सीमा से करीब 400 किलोमीटर ही दूर है. यहां हर रोज करीब 12.4 लाख बैरल तेल प्रोसेस किया जाता है. इसके अलावा भुज, नलिया और जामनगर में एयर फोर्स बेस भी हैं. अब यकीनन नेशनल सिक्योरिटी के लिए जिम्मेदार लोगों के मन में ये सवाल उठ रहे होंगे कि ये सारे ठिकाने ड्रोन हमलों से कितने सुरक्षित हैं?

अर्स्न्स्ट एंड यंग ने फिक्की (फेडरेशन ऑफ इंडियन चैंबर्स ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री) के साथ मिलकर बनाई एक रिपोर्ट को 1 अगस्त को जारी किया था. उसमें ड्रोन्स को काउंडर करने वाले सिस्टम को भारत में लगाए जाने की जरूरत की ओर इशारा किया गया था. रिपोर्ट में लिखा था कि ड्रोन्स का बाजार 2020 तक करीब 10 करोड़ डॉलर (लगभग 710 करोड़ रुपए) का होने की उम्मीद है कि इस तकनीक का कुछ शरारती तत्वों द्वारा दुरुपयोग भी किया जाए, जो सुरक्षा पर एक बड़ा खतरा साबित हो सकते हैं. इस रिपोर्ट ने प्राइवेसी, सिक्योरिटी और घुसपैठ के खतरे की ओर इशारा किया था.

पिछले साल अगस्त महीने में हथियारों से लैस ड्रोन का इस्तेमाल वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मदुरो पर हमला करने के लिए भी किया गया था. भले ही निकोलस इस हमले में बच गए, लेकिन इसने हथियारों से लैस ड्रोन्स के द्वारा सुरक्षा पर खतरे की घंटी बजा दी. अब दुनिया के कई नेताओं की सुरक्षा में ड्रोन गन और बजूका जैसी बंदूकें शामिल की गई हैं, जो ड्रोन के हमले से पहले ही उसे मार गिराएं. अब कंपनियां ड्रोन्स को काउंटर करने के सिस्टम पर काम कर रही हैं, जो ड्रोन को डिटेक्ट कर सकें, उनका हमला रोक सकें और जरूरत पड़ने पर उनका पीछा कर के उन पर हमल कर सकें. कुछ ऐसी भी तकनीकों पर काम हो रहा है, जिनके जरिए ड्रोन के कम्युनिकेशन नेटवर्क को हैक किया जा सके, उसे जाम किया जा सके और उसे न्यूट्रल किया जा सके. वैसे भी, ड्रोन्स से हमले का दौर आ चुका है और युद्ध हमेशा एक जैसा नहीं रहता.

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लेखक

संदीप उन्नीथन संदीप उन्नीथन @sandeepunnithanindiatoday

लेखक इंडिया टुडे में डिप्टी एडिटर हैं.

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